Sunday, December 18, 2011

वो बिंदिया



उफ्फ्फ़ ....
वो  ऊँचे  ललाट पर
कमान सी भोंहों के
मर्म में,
सुर्ख तप्त गोलाईयां  लिए
असीमित परिधि का
विस्तार   लिए,   
मुझे बैचेन सी 
कर देती हैं
प्रलोभन सी लगती
निमंत्रित सी करती हुई
पास आने को
आमंत्रित  सी करती
अधरों को छू  लेने को.........
तेरे माथे की
वो बिंदिया !

नज़रों को मिलाते हुए
एक टक देखती हैं मुझे
तुम्हारे
सम्पूर्ण व्यक्तित्व पर
एक छत्र राज लिए
कुसुमित चेहरे को
अप्रतिम सौन्दर्य से
भर देती हैं
तेरे माथे की
वो बिंदिया !

जब तुम्हारा चेहरा
मेरी हथेलियों मैं होता हैं
उस कसमसाहट में
लरजते  होठों में
रक्तिम कपोलों में
सांसों के उतार चड़ाव में
पलकों के
उनीदेपन में
सुर्ख होते कर्ण फलकों में
ताम्बई होती त्वचा में
दीर्घ होते श्वाशकण
जब
चेहरे को छूने  लगते हैं
शरीर का सम्पूर्ण रक्त
जब चेहरे की तरफ दौड़ता
सा लगता हैं
तब भी
मुह चिड़ाती सी रहती हैं
तेरे माथे की
वो बिंदिया !

..वो पूनम का चाँद,
.....रात को खाने की थाली,
........घर का आइना,
...........गेंदे के फूल,
.............चाट वाले की टिक्की,
.................ऑफिस का पेपरवेट,
.........................ट्रेफिक सिंग्नल की लाइट,
सब तेरी
बिंदिया की
याद दिलाते  हैं मुझे !

उफ्फ्फ!!!!!!
आज फिर
मेरे काँधे से चिपक कर
आ गई हैं

तेरे माथे की
वो बिंदिया .........!!     

Wednesday, November 9, 2011

हरिद्वार त्रासदी ...क्या यही नियति हैं


रजा दक्ष का यज्ञस्थल .....जब रजा दक्ष ने भगवन शंकर की यग्य मैं अवहेलना की तब सटी ने यग्य मैं अपनी आहुति दे दी यह समाचार पा कर क्रुद्ध हो शिव ने प्रलयंकारी वीरभद्र का आह्वाहन किया अपने सर से जटा उखाड़ कर नील पर्वत पर पटक दी जटा के एक भाग से उत्पन्न हुए महाबली सहश्र भुजा धारी... वीरभद्र और दूसरे भाग से उत्पन्न हुई..... महाकाली खाप्परधारी रक्त पीने को आतुर  .....और राजा दक्ष के यग्य का संहार हुआ तब ...कनखल की उस धरती पर खड़े हो नंदी ने समस्त मायानगरी मायापुरी को जिसका विस्तार टिहरी से नारसन तक था शापित कर दिया तब से आज तक हरिद्वार की पवित्र भूमि ने कई बड़े यज्ञों की अपूर्णता देखि हैं संहार और दुर्घटनाये झेली हैं ...कुम्भ अर्धकुम्भ या सोमवती अमावास मृत्यु का प्रलय महाकाल की इस धरती पर तांडव करता ही हैं ..८-११-२०११ जब की पूरा राज्य अपनी स्थापना की पूर्वसंध्या  की तय्यारियों मैं जुटा था ...गायत्री महाकुम्भ मैं मची भगदड़ ने २० से अधिक शरीरों को लील लिया सेकड़ों  घायल और कई लापता ...और सरकारी आकडे और अखबार कहता हैं मामूली दुर्घटना .......वह पंडाल जहा वेदों की ऋचाये गूज रही थी कल तक पलक झपकते ही शमशान  भूमि मैं तब्दील हो गया ....
कथा चाहे कैसी भी रही हो शाप हो या न हो...पर कईयों के घर उजड़ गए कईयों ने अपने परिवार के सदस्य खो दिए ......आस्था का कैसा सैलाब हैं क्या इसे केवल बदइन्तजामी  कह कर टाल दिया जायेगा ...ऐसी घटनाये आस्था पर प्रश्नचिन्ह  लगाती ही हैं


 ये कैसी आस्था हैं ....???????????

Friday, October 7, 2011

रावण दहन

रावण दहन 


और उस दिन
रावण जलाया जाना था,
रंगीन कागजों से बना,
वीभत्स और
विकराल रावण!
दो महीनों के
अथक प्रयास से तैयार रावण
ससम्मान
रामलीला मैंदान
पहुचाया जाना था
उस दिन
रावण जलाया जाना था !

फिर धीरे धीरे
लोग इकठ्ठे होने लगे
रावण दहन का तमाशा
देखने को उत्सुक
चाट पकोड़ों की दुकाने
सजने लगी
मूंगफलियाँ भांजते हुए लोग
पानी बताशों से
गला तर करते लोग
इंतजार मैं हैं रावण दहन के
पोपकोर्न और चिप्स चबाते लोग
तमाशबीनों की तरह !

जाने क्यों ये लोग
अनंत में  विलीन
उस रावण को
हर साल जिन्दा करते हैं
और फिर उसका अग्निदाह कर
अपनी आस्था को
सालगिरह की तरह मानते हैं
लेकिन
हर पल
अपने अन्दर पैदा होने वाले
रावणों को
नजरंदाज करते जाते हैं
जो पहले से ही मृत हैं
उस पर
धोंस ज़माने के बजाय
अगर हम
एक भी जिन्दा रावण
को फूंक सकें
तो दशहरा मनाये
वरना
इन रावणों के
लम्बे होते कदों तक
फिर कोई ब्रह्मास्त्र
पहुच नहीं पायेगा !!!

बहरहाल ...,,,,
रामलीला मैंदान से लौटते हुए
शाम के धुधलके मैं
भीड़ में  परिवार से बिछुड़ी
एक बच्ची
अस्तव्यस्त
अर्धनग्न
लहूलुहान मिली हैं
सड़क से कुछ दूर
शिकार हुई हैं
किसी  वहशी रावण का
यहाँ भी भीड़ थी
तमाशबीनों की
में भी तो था इन्ही में कहीं !

लेकिन
उसकी पनियाली आँखों का
सामना, न कर पाया था मैं
झकझोर गया
अन्दर तक कोई मुझे
उसकी आँखों में
रावण दहन का
वो दृश्य भी रहा हो जैसे
पर कैसा रावण दहन
वह रावण तो जैसे
आस पास ही था
सबके बीच
घुस  कर बैठा हुआ  !

घर पहुच कर
कपकपाते हाथों से
बेटी को सीने से लगाते हुए
आत्मग्लानी से भर गया था मैं
तब वह कागज़ का रावण
विकराल  न लगा था मुझे
वास्तविक रावण भी
इतना वीभत्स न रहा हो शायद  !

सोचता हूँ
उस लड़की की आँखों का
वह रावण,
वास्तव में,
जाने कब दहित होगा ?
जाने कब ????

Tuesday, September 20, 2011

जख्मों को हरा रखना....


दुनिया बड़ी जालिम हैं,, ये होश जरा रखना
गिरने नहीं देना तुम, अश्कों को भरा रखना

पलकें भी उनीदीं हों,,, और चाक गरीबां हो
इतनी तो सनद रखना जख्मों को हरा रखना

कितना भी तक्कलुफ़ हो, कितनी भी बैचैनी
जलवों मैं न आना तुम, अंदाज खरा रखना

हर ईद दिवाली पर,, चाहे न मिलें फिर भी
याद आता हैं शिद्दत से, वो याद तेरा रखना

हाथों कि लकीरों मैं, कब उम्र बसी किसकी
मुश्किल तो नहीं होता यूं खुद को मरा रखना

आगाज से वाकिफ थे,, अंजाम भी था मालूम
आदत थी ये बस लेकिन नुक्तों में घिरा रखना

इंसानों कि बस्ती में, भगवान नहीं मिलते
खिड़की तो खुली रखना पर्दों को गिरा रखना

Monday, September 12, 2011

कोई तआल्लुक न वास्ता रखना

 
कोई तआल्लुक न वास्ता रखना
बस, गुजरने का रास्ता रखना !!

लब पे चाहे न आ सके फिर भी

दिल में छोटी सी, दास्तां रखना !


रोज़ एक चाँद सा मिले  छत पे

खुद को हमसे यूं, आशना रखना !


गर जमीनों से की मोहब्बत हो

दफ्न आखों में, आसमां  रखना !
 
हमसफ़र हो न हो मिले न मिले
साथ यादों का, कारवां रखना !!
 
रोज मिलने न आ सको तो भी
एक ख़त का
तो सिलसिला रखना !
 


Tuesday, August 23, 2011

रामलीला मैंदान में रावण दहन


धधक रहा मनस पटल धधक रहा ये ज्वार हैं
सूत्रपात हैं रक्त क्रांति का भभक रहा विचार हैं
लोटने लगे हैं काल सर्प, छातियों पे द्रोहियों के
छुपा रहा मलीन मुख, खड़ा स्तब्ध भ्रष्टाचार हैं

कदम कदम हैं चल रहे नवीन स्वर हैं मिल रहे
लोकपथ पे क्रांति के.. असंख्य चिराग जल रहे
आंधियां रुकेंगी क्या. मिटाए मिट सकेंगी क्या
नहीं ये भीड़ तमाशाइ की,.. स्पष्ट जनाधार हैं
छुपा रहा मलीन मुख, खड़ा स्तब्ध भ्रष्टाचार हैं

दो दो हाथ कर जरा, कर न तू भी बात कर जरा
ढहती इस दीवार पर जम के तूभी लात धर जरा
वक्त हैं यही संभल, क्रूर विषधरों के फन कुचल
हैं तू ही सुर्ख़ियों में पत्र की, तेरा ही समाचार हैं
छुपा रहा मलीन मुख, खड़ा स्तब्ध भ्रष्टाचार हैं

उठा धनुष उठा खड्ग न दिग्भ्रमित हो वार कर
सशश्त्र लोकपाल से..... सुसज्ज हो संहार कर
यही समय हैं रक्त मांगती..खड़ी कपाल मर्दनी
घृणित ग्रसित व्यवस्था पर ये. आखरी प्रहार हैं
छुपा रहा मलीन मुख, खड़ा स्तब्ध भ्रष्टाचार हैं

मिट न पायेगा तिमिर अगर जो सूर्य ढल गया
फिर न हाथ आएगा. अगर समय जो टल गया
संयुक्त हो प्रबुद्ध हो तू.... आज मरण युद्ध को
तप्त दिन गुजर गया निशा के बचे प्रहर चार हैं
छुपा रहा मलीन मुख, खड़ा स्तब्ध भ्रष्टाचार हैं

Tuesday, August 16, 2011

आजादी.......

दे दी इन्हें आजादी बिना खड्ग बिना ढाल !
साबरमती के संत तूने  कर दिया बबाल!!

क्यों थी ये  आजादी किसी को हैं क्या पड़ी !
निज स्वार्थ कामना  हो गई हैं देश से बड़ी !!
फिर डगमगाई कश्ती इनको जरा संभाल !
साबरमती के संत तूने कर दिया बबाल !!
रघुपति राघव राजा राम,.............

कोसेंगे रात दिन  तुझे रोएंगे भी तुझको !
बोएंगें रात  दिन तुझे काटेंगें  भी तुझको !!
फिर भी तो कम हुआ नहीं ये तेरा जमाल !
साबरमती के संत तूने कर दिया बबाल !!
रघुपति राघव राजा राम,.............

सब लूट के खायेंगे तुझे भी तो क्या पता !
क्यों गोलियां खाई थी  इन्ही से जरा बता !!
अब बच नहीं पाएंगे खड़ा सर पे महाकाल !
साबरमती के संत तूने कर दिया बबाल !!
रघुपति राघव राजा राम ..

पाने को आजादी जाने क्या-२ नहीं सोचा !
आजादी मिली तो हुआ जाने क्या ये लोचा!!  
हर रोज ही झुकता हैं भारत का यहाँ भाल !
साबरमती के संत तूने कर दिया बबाल !!
रघुपति राघव राजा राम,............. ............

Tuesday, August 9, 2011

निशदिन मैं तेरी आंख से


निशदिन मैं तेरी आंख से आंसू सा झर गया 
बस जिंदगी की चाह में,... हद से गुजर गया 

कहती थी दुनिया जिसको, ...दीवानगी मेरी
थी फब्तियों मैं हर दम,.... मजबूरियां  मेरी
पल भर के ही सुकून को क्या-२ न कर गया
निशदिन मैं तेरी आंख से आंसू सा झर गया
बस जिंदगी की चाह में,... हद से गुजर गया

दोनों जहाँ में जाने ..... ..किसकी तलाश थी
में खुद लिए था जिसको ....मेरी ही लाश थी
जो था  जमीर वो तो.....कबका था मर गया
निशदिन में तेरी आंख से आंसू सा झर गया
बस जिंदगी की चाह में ....हद से गुजर गया

यारों मुझे यकीन हैं.... क्यों  दोगे तुम  सदा
हंस  दोगे इस जुनून पे...... हो जाओगे जुदा
अब दूर ही चला जाऊंगा,  मैं भी अगर गया 
निशदिन में तेरी आंख से आंसू सा झर गया
बस जिंदगी की चाह मैं,... हद से गुजर गया

मत सोचना कि लौट के, यूं आऊंगा न कभी
आता रहूँगा याद मैं ऐसे तो जाऊंगा न कभी
क्या क्या संभालता पर, सब तो बिखर गया
निशदिन में तेरी आंख में आंसू सा झर गया
बस जिंदगी कि चाह में... हद से गुजर गया

Tuesday, June 28, 2011

इस देश की रानी 'सोनपरी',


अब कौन सुने सच की सरगम,कहना ही तो दरकार हो गया
इस देश की रानी 'सोनपरी', 'मन मोहन' भ्रष्टाचार हो गया

दफ्तर क्या दफ्तरवासी,,, क्या अफ्सर और क्या चपरासी
मंत्री से ले कर संतरी तक,, सब सौ की पत्ती के अभिलाषी
हर फाइल पे रखना हैं वजन, दफ्तर का शिष्टाचार हो गया
इस देश की रानी 'सोनपरी', 'मन मोहन' भ्रष्टाचार हो गया

अस्मत लुटती यहाँ थानों में, सौ पेंच हैं रपट लिखवाने मैं
दो बैल बिके एक खेत बिका,, मुजरिम साबित करवाने मैं
देश के सिपहसलारों से ही, संविधान का बलात्कार हो गया
इस देश की रानी 'सोनपरी', 'मन मोहन' भ्रष्टाचार हो गया

हाँ अब लोकपाल कि जय होगी, उसकी भी कीमत तय होगी
कुछ नए खाते खुल जायेंगे, जब देश-लक्ष्मी स्विसमय होगी
काला धन - काली करतूते ,,,उजले चेहरों का श्रृंगार हो गया
इस देश की रानी 'सोनपरी', 'मन मोहन' भ्रष्टाचार हो गया

Sunday, June 26, 2011

तुमसे तो बदतर नहीं हूँ


सहमा हूँ, कातर नहीं हूँ !
आसुओं से, तर नहीं हूँ !!

ठोकरों में, क्यों रहूँ मैं !
राह का, प्रस्तर नहीं हूँ !!

रोज रटते हो, मुझे क्यों !
प्रश्न का, उत्तर नहीं हूँ !!

खुद लहूँ में,, गर्त हैं जो !
दोगला, अस्तर नहीं हूँ !!

चीर दे जो,,, पृष्ठ पीछे !
छद्म वो,, नश्तर नहीं हूँ !!

मर गया हैं, तुममे इमां !
तुमसे तो, बदतर नहीं हूँ !!

Friday, June 24, 2011

वो गज़ल मेरी तो थी पर ,,काफिया मेरा न था


किस कदर थी भीड़ लेकिन काफिला मेरा न था
वो गज़ल मेरी तो थी पर ,,काफिया मेरा न था

आपने भी सच कहूं तो,,आज ही ये तामील की
वक्त-ए-रुखसत साथ था जो बारहा मेरा न था

बज्म मैं वो कुछ कहें और ओर कुछ तन्हाई में
एक मुह और दो जबां का, फलसफा मेरा न था

तुम ही कहो कैसे में रहता चैन से उस बस्ती में
तुम पढ़ गए थे कब्र पर जो, फातिहा मेरा न था

मैं तो इन्सां भी न था, पर तुम  खुदा बनते गए
चाहत भले ही हो मगर ,,ये मशवरा मेरा न था

तुमने भी बस पढ़ के, मुजरिम मुझे  ठहरा दिया
सच कहूं उस तफसील पर वो, तब्सरा मेरा न था

कुछ अजब से  रंग देखे जिस्त के अब क्या कहें
हाँ..जमीं तक तो थी मेरी,पर आसमां मेरा न था

Sunday, June 19, 2011

जब ओढ़ लिया इंकार स्वयं में


तुम तो पल में, संक्षिप्त हो गए !
फिर मैं कैसे, विस्तृत हो जाता !!
जब ओढ़ लिया, इंकार स्वयं में !
फिर में कैसे, स्वीकृत हो जाता !!

मैं भोर की, अरुणाई सा हरपल !
भाल तिलक को, तत्पर था बस !!
छू उड़ा सकूं,, कुंतल ललाट पर !
पवन सदृश्य ही, प्रेरित था बस !!
तुम परधि,, लाँघ ना पाई स्वयं !
फिर मैं कैसे, समवृत हो जाता !!
जब ओढ़ लिया, इंकार स्वयं में !
फिर में कैसे, स्वीकृत हो जाता !!

कुछ भान मुझे,, अस्पष्ट सा हैं !
तुम आत्मसात सी,, थी मुझसे !!
हर कथ्य मेरा,, अंगीकृत ही था !
तुम पारिजात सी... थी मुझमे !!
पर प्यास ह्रदय की, दीर्घ न थी !
फिर मैं कैसे, अमृत हो जाता !!
जब ओढ़ लिया, इंकार स्वयं में !
फिर में कैसे, स्वीकृत हो जाता !!

मैं स्नेह सृजन का,, याचक था !
और प्रणय विरह का, संवाहक !!
मैं दिया सरीखा, मन मंदिर का !
और वेद वाक्य का,, अनुवाहक !!
तुम मौन निवेदन.... क्रमशः में !
फिर मैं कैसे,, झंकृत हो जाता !!
जब ओढ़ लिया, इंकार स्वयं में !
फिर में कैसे, स्वीकृत हो जाता !!

Saturday, June 18, 2011

सलवटे... चेहरे की


सलवटे... चेहरे की दिखाते हैं ज़माने वाले
क्या क्या... इल्जाम लगते हैं ज़माने वाले

शुमार तुम भी थे गैरों की अदावत में कहीं
कल से खुश खुश सा बताते हैं ज़माने वाले

कितनी तरकीबें लड़ाई थी, तेरी आमद को
रंजिशन बारिश भी, कराते हैं ज़माने वाले

आशिकों यूं  भी कभी.. बाज़ दफा होता हैं
इधर की उधर.. भी लगाते हैं ज़माने वाले

सोचने में तो कोई हर्ज नहीं.... क्या कीजे
बात.. बेबात भी बढ़ाते हैं .....ज़माने वाले

तू मुझसे दूर रहे.....बदगुमां रहने को तेरे 
नाज-ओ-अंदाज उठाते हैं.... ज़माने वाले

जो था मोहसिन. उसी पे क़त्ल का शुबहा
तो  रिश्ते ऐसे भी निभाते हैं. ज़माने वाले 

Friday, May 27, 2011

मैं प्रीत सौपता हूँ तुमको स्वीकार न हो तो कह देना


कुछ शब्द-सुमन उर अंजुरी में 
भरपूर नेह से........... लाया हूँ
दो पल तो पास तुम बैठो जरा 

मैं दूर देश से.......... आया हूँ
मैं रोज सोचता हूँ ....तुमको 

अधिकार न हो तो ,कह देना
मैं प्रीत सौपता हूँ तुमको 
स्वीकार न हो तो कह देना 

तुम चाहे न मुझसे बतियाना 

शर्माना न ........इठलाना ना
तुम द्वार से ही, लौटा देना 

मुस्काना न .....इतराना ना
मैं रोज मनाता हूँ.. तुमको 
मनुहार न हो तो.\, कह देना
मैं प्रीत सौपता हूँ तुमको स्वीकार न हो तो कह देना

कह तो दिया मत देना भले 

इन नैनों का.... संसर्ग प्रिये
न देना भले ,प्यासे मन को 

अंजुरी भर भी, अर्घ्य प्रिये
मैं रोज ही रचता हूँ, तुमको 

साकार न हो तो,, कह देना
मैं प्रीत सौपता हूँ तुमको स्वीकार न हो तो कह देना

""इन पंक्तियों मैं एक परिवर्तन के साथ भी पढ़ कर देखे  

की भाव मैं क्या परिवर्तन होता हैं ""

मैं रोज सोचता हूँ तुमको प्रतिकार न हो तो कह देना
मैं प्रीत सौपता हूँ तुमको...इन्कार न हो तो कह देना

मैं प्रीत सौपता हूँ तुमको स्वीकार न हो तो कह देना


कुछ शब्द-सुमन उर अंजुरी में 
भरपूर नेह से........... लाया हूँ
दो पल तो पास तुम बैठो जरा 

मैं दूर देश से.......... आया हूँ
मैं रोज सोचता हूँ ....तुमको 

अधिकार न हो तो ,कह देना
मैं प्रीत सौपता हूँ तुमको 
स्वीकार न हो तो कह देना 

तुम चाहे न मुझसे बतियाना 

शर्माना न ........इठलाना ना
तुम द्वार से ही, लौटा देना 

मुस्काना न .....इतराना ना
मैं रोज मनाता हूँ.. तुमको 
मनुहार न हो तो.\, कह देना
मैं प्रीत सौपता हूँ तुमको स्वीकार न हो तो कह देना

कह तो दिया मत देना भले 

इन नैनों का.... संसर्ग प्रिये
न देना भले ,प्यासे मन को 

अंजुरी भर भी, अर्घ्य प्रिये
मैं रोज ही रचता हूँ, तुमको 

साकार न हो तो,, कह देना
मैं प्रीत सौपता हूँ तुमको स्वीकार न हो तो कह देना

""इन पंक्तियों मैं एक परिवर्तन के साथ भी पढ़ कर देखे  

की भाव मैं क्या परिवर्तन होता हैं ""

मैं रोज सोचता हूँ तुमको प्रतिकार न हो तो कह देना
मैं प्रीत सौपता हूँ तुमको...इन्कार न हो तो कह देना

वार्डरोब

 
छोड़ आया हूँ
उम्र के कुछ साल
उस चूने-सुर्खी के मकान मैं
लकड़ी  के खूटे पे
टंगे रह गए वो दिन
पिता जी का गमछा,
सूत का थैला
काली तिल्ली वाली
छतरी  के साथ
अलसाये आंगन मैं
माँ के गठियाए नुस्खे
सिल बट्टे  और
आचार के मर्तबानों के साथ
धूप सेकती
साबूदाने की कचरी  के साथ
हमेशा ही तो
कहती थी ..माँ
इधर मत आना अभी लीपा हैं
छूत लग जाएगी  रसोई बनानी हैं
क्या पता था उसे
की अब
कभी नहीं आऊंगा मैं
उसकी रसोई से
पुए और बड़ों
की  छ्स्स्स .....
अब नहीं सुनाई देती 
परके साल से
लाल अमरूदों  मैं
वो स्वाद भी नहीं रह गया
पिछवाड़े का लंगड़े का पेड़
अब भरभराने  को हैं
पड़ोसियों के पत्थरों से लहूलुहान
छत पे  टीवी का एंटीना
मौन खड़ा हैं
बातचीत बंद हैं उसकी गौरैय्यों से
सोचता हूँ उतार लाऊ
उस खूटे से
वो दिन
पिताजी का गमछा,सूत का थैला
माँ की गठीयन
पर मेरे वार्डरोब मैं
कोई हेंगर
खाली ही नहीं अब

वेदना



वेदना
कोई  दोफांक किया हुआ
अमचूर  और पोदीना
मिलाया हुवा
तेज मसालों के साथ
खट्टी अम्बियों का
आचार   नहीं
की मुह में स्वाद
आ  ही जाये तुम्हारे
विचार हैं ...
उसके लिए
रसना  में..कसैला 
अन्तस्थ करने का
हौसला  भी तो हो
उबकाई
वेदना  को  शब्दों में
उड़ेलने   की हो
या अन्तस्थ करने की
भभकती
बहुत हैं

तुम चलो , बेवफा तो हुए


पत्थरों से सनम रह गए
बेबसी के सितम रह गए 

दर्द चेहरा, छुपा ना  सका
उनके माथे पे ख़म रह गए

चाहने को, जहाँ था मगर   
बस जनाजे को हम रह गए

रो न पाया, तुझे  रात भर
अश्क आँखों में कम रह गए

साँस लेने की फुर्सत न थी
इसलिए हमकदम रह गए

आदतन मुस्कुराये थे वो
कैसे कैसे , वहम रह गए

जब्त करता रहा उम्र भर
जाने कैसे ये गम रह गए


तुम चलो , बेवफा तो हुए

आशिकी के भरम रह गए

Sunday, May 22, 2011

मैं तो दुनिया से अलग था



इस शहर मैं भी रकीबों का ठिकाना निकला
मेरी बरबादी का, अच्छा ये बहाना निकला

मेरी कमनसीबी  की, पूछों न तुम दुश्वारियां
तुम न  थी तो ये, मौसम भी सुहाना निकला

किस यकीं से कहता मैं हाल-ए-दिल उसको
जिसकी बातों में नया रोज  फ़साना निकला

मैं तो दुनिया से अलग था ही पता था मुझको
नाज-ओ-अंदाज से तू भी तो शाहाना निकला

कैसे करता मैं गुजारिश, की मुझे याद न कर
तुझे भुलाने मैं, मुझे  भी तो जमाना निकला

फिर न कहना की ये अंदाज-ए-गुफ्तगू क्या हैं
जबभी निकला हैं तेरे होठों से दीवाना निकला

तेरी जफ़ाओं के किस्से सुनाये सारी रात जिसे
वो भी आशिक तेरा कमबख्त पुराना निकला






Thursday, May 19, 2011

धूप ....हो न तुम






 धूप की गर्माहट
**************
सुनो
हाँ ...तुमसे ही कह रहा हूँ ...
तुम यूं सुबह-सुबह
किरन सी
मत आया करो
द्वार छिद्रों से
दनदनाती हुई
अतिक्रमण सा लगता हैं !

दिन तक आते आते
पसर जाती हो
खिडकियों के पल्लों से
सीधे मेरी आरामकुर्सी तक
छीनती हुई
मेरी निजता को
प्रत्यर्पण सा लगता हैं !

सामने के गुलमोहर
पर इतराती चिढाती
मुझे
घूरा करती हो न तुम..
चिलचिलाती हुई सी
आक्रमण सा लगता हैं !

भावों का वाष्पीकरण
तिलमिलाहट भर देती हैं
गर्माहट इतनी मत बढाओ
तलवों में
पसीना सूख नहीं पाता
संक्रमण सा लगता हैं !

लो.. अब जब
तुम्हारी तपिश का
आदी होने लगा हूँ
तो खीचने लगी हो तुम
अपने पाँव
मेरे आँगन से
क्षरण सा लगता हैं !

सुनो
रुक जाओ
शाम के धुधलके
अस्पष्ट कर देते हैं मुझे
हाथ को हाथ
सुझाई नहीं देगा
अकर्मण्य सा लगता हैं !

लौटा लो खुद को
रात तुमसे
अजनबी कर देती हैं मुझे
सुबह तक
अपरिचित हो जाओगी
तुम फिर मुझसे
ग्रहण सा लगता हैं !

तुमसे
दोबारा मुलाकात तक
कैसे जी पाउँगा
इस,,
क्रमशः ,,
में !!!!

Thursday, May 12, 2011

खुद में सिमटा झील सा मैं...


दोस्तों एक नज्म की कुछ पंक्तियाँ आपकी नजर करता हूँ ...

रात भर कोई मुझे.. याद आता आता रह गया
नज़्म थी या थी गजल मैं गुनगुनाता रह गया

कल ढूंढते थे वो मुझे शिद्दत से कूच-ए-यार में
मैं रकीबों की गली मैं बस आता जाता रह गया

बेसबब ही पूछ बैठा मैं भी उससे यारों का पता
जाने क्यों गुस्सा हुआवो तिलमिलाता रह गया

आज फिर बाजार मैं ...,.लुटती रही वो आबरू
और मैं कमजर्फ खुदसे ,छिपछिपाता रह गया

जाने कितनी बार उससे., हालेदिल पूछा मगर
दर्द आँखों मैं छुपा कर..... मुस्कुराता रह गया

वो तो दरिया था बहा भी तो,, समन्दर हो गया
खुदमें सिमटा झीलसा मैं झिलमिलाता रह गया

रौनक-ए-महफ़िल थी तेरी रौशनी हर सिम्त थी
बस मेरी ही गली में अँधेरा ,सरसराता रह गया

Tuesday, May 10, 2011

देखता हूँ रोज तुमको.. ध्यान मैं धर लूं जरा!


"  शाम सवेरे तेरे तट पर नित्य जन्म लेता हूँ
शाम सवेरे तेरे तट पर ....शब्द बीज बोता हूँ
कोटि काल से कोटि कंठ जब तेरा नाम हैं लेते
मैं भी कुछ शब्द कलम से युग महिमा कहता हूँ "

दोस्तों
आज पतितपावनी..सिद्धिदात्री,पापहरनी ,सदानीरा, मकरवाहिनी,
ब्रह्मकमंडलवासिनी,सुरसरी,पितृ तारिणी ,माँ गंगा का उद्भव दिवस यानि
प्रकटोत्सव दिवस हैं ...आज ही के दिन भागीरथी प्रयास से माँ का आगमन इस
भूमंडल पर हुआ था.एक गीत की कुछ पंक्तियाँ माँ के चरणों मैं रखता हूँ ...


क्षीर पावन स्वर्ग से आंचल मैं भर कर लाइ हैं!
ये धारा सीधे ही चल कर शिव- जटा से आई हैं !!

भागीरथ ने तप किया तब पुन्य संचित हो गए!
वेग को थमा था सर पर शिव भी गंगित हो गए!
धन्य ऐसी भेंट निर्मल.. तुमने जो भिजवाई हैं !
ये धारा सीधे ही चल कर शिव- जटा से आई हैं !!

देखता हूँ रोज तुमको.. ध्यान मैं धर लूं जरा!
पूजता हूँ रोज तुमको ...आचमन कर लूं जरा!
जाने कितने पुन्य थे जो.. देह तुम तक आई हैं!
ये धारा सीधे ही चल कर शिव- जटा से आई हैं!!

माँ तुम्हारे आस पर यह देश सिंचित हो रहा !
पाप धो देती हो सबके .. पुन्य अर्जित हो रहा !
मोक्ष दायिनी इस धरा पर.. कष्ट हरने आई हैं!
ये धारा सीधे ही चल कर शिव- जटा से आई हैं!!

क्षीर पावन स्वर्ग से आंचल मैं भर कर लाइ हैं!
ये धारा सीधे ही चल कर शिव- जटा से आई हैं !!

Sunday, May 8, 2011

मेरा हर दर्द सो जाता हैं....



आज मातृ दिवस हैं पर मेरे लिए तो हर दिन ही माँ का दिया हुआ हैं  सो कुछ पंक्तियाँ उनको समर्पित करता हूँ .

मेरे छोटे से घर से ही मेरी दुनियां अयाँ होती हैं
मैं इक कमरे मैं होता हूँ  पूरे घर मैं माँ होती हैं

मेरी दुश्वारियां भी उसकी दुआओं  से डरती हैं
मेरा हर दर्द सो जाता हैं तब जा के माँ सोती हैं

सुब्ह उठते ही सूरज टांक देती हैं छतभर तक
धुधलका हो नहीं पाता कि ..तारे से पिरोती हैं

बच्चों सा नहलाती हैं अब भी  धूप मैं अक्सर
संचित पुन्य से घिस कर मेरे पापों को धोती हैं

ग़मों से टूट कर रोते हुए तो.... देखा हैं लोगो को
वो खुश हो तबभी रोती हैं ओ गुस्से मेंभी रोती हैं

वो उसको याद हैं अब भी.प्रसव की वेदना शायद
वो घर के सामने क्यारी मैं कुछ सपने से बोती हैं

Thursday, May 5, 2011

ना जाने कौन सा पन्ना....


चलो की आपकी ,आँखों का भी गिला निकले
कोई तो शख्श हो आखिर हिला मिला निकले

वो मुस्कुराये तो हैं, आज अपनी ज़ानिब से
किसी बहाने तो, बातों का सिलसिला निकले

मैं तेज तेज से क़दमों को.. रक्ख के लौटा हूँ
तुम भी रुक के चलो कुछ तो फासला निकले

अकेला हूँ तो बहुत फिर भी.... छुपा लेता हूँ
तेरी तस्वीर से भी कोई ना आशना निकले

न बैठ पहलू मैं उसके.. न बात कर जालिम
जबान खुश्क हैं उसकी, न दिलजला निकले

मैं चला भी जाता चलो अकेला शौकबाज़ी मैं
तेरे मकान से हो कर कोई तो रास्ता निकले

मैं जिंदगी की किताबों को.. खोलता ही नहीं
ना जाने कौन सा पन्ना,, मुड़ा हुआ निकले

Wednesday, May 4, 2011

खो दिया हैं मीत मैंने ...



आज फिर इक चाह ने देखो नमित सा कर दिया !
तुमने यूं देखा पलट मुझको चकित सा कर दिया !!

फूल रजनीगंधा के.. चहु ओर विस्मृत हो गए थे !
कल्पना के सब रंग बिखरे धूल धूसित हो गए थे !!
कौन सा सन्दर्भ हैं ..जिसने भ्रमित सा कर दिया !
तुमने यूं देखा पलट मुझको चकित सा कर दिया !!

खो दिया हैं मीत मैंने ..गीतिका के सब सुरों को !
दिग्भ्रमित बैठे हुए ...परिकल्पना के अक्षरों को !!
ओस बूंदों ने सुमन-आनन 
द्रवित  सा कर दिया !
तुमने यूं देखा पलट मुझको चकित सा कर दिया !!

सोचता हूँ कैसे शंशय इन  नैनों से प्रेषित हो गए !
शब्द क्या कहने थे मुझको क्या समर्पित हो गए !!
सामने बैठा था मेरे.. क्यों क्षितिज सा कर दिया !
तुमने यूं देखा पलट मुझको चकित सा कर दिया !!

आज फिर इक चाह ने देखो नमित  सा कर दिया !
तुमने यूं देखा पलट मुझको चकित सा कर दिया !!

Saturday, April 30, 2011

अब भी वो ख़त दराज में हो कहीं..


आहटें चुप मंजर उदास हैं शायद
कोई फिर ....आस पास हैं शायद

अपनी पलकों को गिराओ तो सही
राह तकती........तलाश हैं शायद

अब भी वो ख़त दराज में हो कहीं
यकीं नहीं हैं .....क़यास हैं शायद

उसको पैमाना-ए-जिंदगी मत दो
उसको सागर सी प्यास हैं शायद

अब वो किसी से वफ़ा नहीं करता
उसी बेवफा की ...आस हैं शायद


कितने रोये तड़पे थे उसके जानेपे
आदमी हैं की....... लाश हैं शायद

Friday, April 15, 2011

यहाँ हमदर्द कम हैं,


ये दुनिया किसको, रास आई बहुत हैं
यहाँ हमदर्द कम हैं, तमाशाई बहुत हैं

निगाहें अब भी, झुक जाती हैं अक्सर
वो बचपन से मुझसे, शरमाई बहुत हैं

न माना वो जरा सी बात पर लड़ बैठा
बात उसको किसी ने समझाई बहुत हैं

जला दिल किसका, फिर पूछो न यारों
जबां खुश्क पेशानी पे, गरमाई बहुत हैं

जिसकी दुआओं से, घर मेरा रोशन हैं
उस की मोहब्बत, मैंने ठुकराई बहुत हैं

तुझे हर शक्ल में... पहचान सकता हूँ
खुदा मेरे मुझे इतनी भी बीनाई बहुत हैं

सलीके से यहाँ पर..... कौन मिलता हैं
जहाँ भी भीड़ हैं देखो वो तन्हाई बहुत हैं

मैं अब खामोश हूँ तो ,तुम क्यों हैरां हो
मुझे चुप करके दुनिया, पछताई बहुत हैं

Thursday, April 14, 2011

तुम मुझे पहले भी ... मिली हो शायद


तुम मुझे पहले भी ... मिली हो शायद !!
काचनार की कलि सी खिला करती थी !
उदास शाम गजलों में मिला करती थी !!
नंगे पांव, रेत पे, बिखराती, आंचल को !
लरजती, सिमटती, सी चला करती थी !!
तुम मेरे साथ कुछ दूर..चली हो शायद !
तुम मुझे पहले भी ....मिली हो शायद !!

तुम कुहासों को ओढती थी अनमनी सी !
तुम्हारी जुल्फ लिपटी सी कुछ घनी सी !!
सुरमई सी नज़रों के.. कोर तक काजल !
मंदिर की सादा मूरत सी संवरी बनी सी !!
सौधीं मिट्टी के सांचे में... ढली हो शायद !
तुम मुझे पहले भी ..... मिली हो शायद !!

तुम भी क्या रंग चुराती थी शोख फूलों से !
तुम भी झुंझलाती थी .. हवा के झोंकों से !!
दूर परिंदों को...... हसरत से देखती होंगी !
तुम भी लहराई तो होगी तीज के झूलों से !!
मेरे शहर की बिसरी सी ..गली हो शायद !
तुम मुझे पहले भी ..... मिली हो शायद !!

चलो माना की ये मेरा वहम ही हो शायद !
फिर क्यों ये चाँद तुमको तकता रहता हैं !!
सजदे करती हैं क्यों ये ....शाम-ओ-सहर !
तेरा वजूद मेरी सांसों में..अटका रहता हैं !!
कुछ यादें मेरे अश्कों से, सिली हों शायद !
तुम मुझे पहले भी ...... मिली हो शायद !!

Friday, April 8, 2011

चलो ऐसा करें...


दोस्तों हलके फुल्के अंदाज मैं एक नज्म आपकी नजर ...

चलो ऐसा करें दिल की लगी को.....छोड़ देते हैं!
कोई रस्ता ना हो तो, मंजिलें ही....मोड़ लेते हैं!!

मुझे अबभी मोहब्बत हैं तुम्हारी शोख आँखों से!
सितारे क्या अभी तक भी उन्ही से..होड़ लेते हैं!!

तुम्हे ही हिचकिचाहट थी हमेशा दिल लगाने से!
हमारा क्या हैं हम तो यूं ही रिश्ता...जोड़ लेते हैं!!

ये माना तुमसे नामिलने की कस्में हैं ज़माने से!
गर तुम हाँ जो कह दो तो कसम भी तोड़ लेते हैं!!

वो रूठे हैं मगर उनको मानना फिर भी आसां हैं!
बहुत मुश्किल हैं उनको जो उदासी .ओड़ लेते हैं!!

इसे मेरा जुनूं कह दो या कहलो तुम दिवानापन!
इशारा तुम जो करती हो वहीँ को ....दौड़ लेते हैं!!

Thursday, April 7, 2011

कैक्टस होना

 
कथ्य का

आडम्बरहीन  होना,


कौन देखता हैं


आत्मसात करने को !


परिष्कृत हो जाना,


नीतिगत तो हैं,


पर व्यावहारिक नहीं!


इसलिए


उखाड़ ही देते हो तुम


पिछली दिवार पे


उग आया पीपल


कैक्टस होना ,


अनुवांशिक नहीं होता ,


पर उस पर खिला ,


बैगनी फूल,


गंध विहीन 


ही तो रहता हैं !!

आस का दिया


दूर  तक ,
जाते देखा करता हूँ ,
उस दिए को मैं ,
गंगा की लहरों  पर ,
अपनी तमाम ,
श्रद्धेयता  के साथ !
विसर्जित किया था जिसे मैंने, 
अठखेलियाँ  करता वो ,
हिचकोले खाता,
रुकता रुकाता ,
लड़ता  रहता हैं ,
तेज हवा और ,
पावन लहरों से भी  !

उसके साथ तैर जाती हैं ,
मेरी 
कुछ  हसरते,
कुछ  सपने ,
कुछ  उम्मीदे ,
कुछ  मन्नते भी ,
अठखेलियाँ करती ,
हिचकोले खाती ,
नियति से लडती !
और वो ,
ओझल हो जाता हैं ,
कुछ दूर बाद ,
आँखों से,

मेरा मन ,
मानता नहीं
मेरी श्रद्धा ,
टूटती नहीं 
की,
गंगा की पावन ,
और उदार,
पर तीक्ष्ण लहरों ने,,
लील ही लिया होगा उसे,
मेरी तमाम ,
हसरतों , संभावनाओ, उम्मीदों, 
और मन्नतों के साथ !!!
क्या पता  पार हुआ हो वो 
या नहीं,  क्या पता ....
श्रद्धा की भी 
कोई लक्ष्मण  रेखा होती  हैं क्या  ??
क्या पता ​!!??

Wednesday, April 6, 2011

माँ शक्ति स्वरूपा..


नव रात्र की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ समर्पित

माँ शक्ति स्वरूपा.. अष्ट भुजा
भैरव संग में... हनुमान ध्वजा
हों कष्ट निवारित जन जन के
नवरात्र फलित.. नव भोर सदा

शैल पुत्री तुम ..ब्रह्मचारिणी
गौरी तुम चन्द्रघंट कात्यायनी
स्कंदमात भी .तुम ही हो माँ
कूष्मांडा काली. सिद्धिदायनी
हैं दिव्य रूप... पावन मईय्या
जयकारा लगे ..जब जोर सदा
हों कष्ट निवारित जन जन के
नवरात्र फलित.नव भोर सदा

तुम शत्रु मर्दनी... जग पालक
मैं दीन.......सरीखा हूँ बालक
तम आच्छादित मन पर मेरे
दुष्कृत्यों का...... हूँ संचालक
अब यत्न करो ...हे दया निधे
ज्योतिर्मय हो ..हर छोर सदा
हों कष्ट निवारित जन जन के
नवरात्र फलित. नव भोर सदा

तुम कल्याणी जग जननी तुम
तुम रोद्र्रूप.. दुःख हरनी तुम
मैं क्रोध मोह का .....सागर हूँ
इस भवसागर की ..तरनी तुम
तुम थामे रहो....पतवार मेरी
ये विनती हैं.... कर जोर सदा
हों कष्ट निवारित जन जन के
नवरात्र फलित..नव भोर सदा

तुमने किस किस को उबारा हैं
कितनों को उस पार, उतारा हैं
माँ लाज मेरी भी ..रख लेना
माया का खेल .. जग सारा हैं
तुमसे ही नेह की....गांठ बधि
तुमसे जीवन की.... डोर सदा
हों कष्ट निवारित जन जन के
नवरात्र फलित. नव भोर सदा



Sunday, March 27, 2011

मेरे ही फैसलों ने ....

थी हसरत-ए-परवाज़ मगर हौसला न था !
या यूं भी था की सर पे मेरे आस्मा  न था !!


सारे शहर मैं सबने जिसे आम कर दिया !

महफ़िल मैं तेरी यार मेरा तज़करा न था !!

बेगाने इस  शहर  की, तनहाइयाँ न पूछ !

अपना कहें किसे कोई अपने सिवा न था !!

मैं  भी रह गया उन्ही काँटों मैं उलझ कर !

इसमें खता क्या मेरी अगर रास्ता न था !!

चेहरे पे जम गई थी, ख्यालों की सलवटें !

ऐसे तो हमसफ़र था मगर बोलता न था !!

मेरे ही फैसलों ने मुझे बरबाद कर दिया !

यूं  शक्ल पर उसकी कुछ भी खुदा न था  !!

Friday, March 25, 2011

हादसा


हादसा,, हर पल रहा हैं !
साथ ही तो, चल रहा हैं !!

धूप सर तक आ रही हैं !
मोम जैसा गल रहा हैं !!

आज भी गुजरा हैं, ऐसे !
जैसे पिछला कल रहा हैं !!

कश्तियाँ लौटेंगी अब तो !!
फिर से सूरज ढल रहा हैं !!

दोस्तों मुह फेर कर वो  !
हाथ ही तो, मल रहा हैं !!

दफ्न करदो अबतो यारों !
अब ना कोई, हल रहा हैं !










Saturday, March 12, 2011

कुछ शब्द तुम्हारे अधरों पर...


कुछ शब्द तुम्हारे अधरों पर, आ-आ के यूंही रुक जाते हैं ! ज्यूं गीत कोई प्यासे मन के,.. हर साँझ मुझे तरसाते हैं !! तुम काम सुता बासंती सी, यौवन की सहज अंगड़ाई तुम ! अतृप्त सलोने दिन ये मेरे, और अलसाई- अलसाई तुम !! रोके से रुका कब नेह प्रिये,, रोके न रुकी मन की सरगम ! मैं तप्त मरू के बीहड़ सा,, शीतल सुरभित अमराई तुम !! कितना भी धरूं मैं धीर मगर,,,उनिग्ध मुझे कर जाते हैं ! कुछ शब्द तुम्हारे अधरों पर, आ-आ के यूंही रुक जाते हैं !! तुम सप्त सुरों में झंकृत सी, भावों की प्रबलता हैं तुममे ! रचना में गुथा आलंबन हैं, व्यंजक सी चपलता हैं तुममे !! गीत कोई क्या लिखेगा,, तुमको न अगर वो जान सका ! वो चिराग मंदिर का अगर, उसकी उज्ज्वलता हैं तुममे !! क्यों नीर सदा इन नयनों के ,,जलप्रपात से झर जाते हैं ! कुछ शब्द तुम्हारे अधरों पर, आ-आ के यूंही रुक जाते हैं !! तुमसे ही मेरा ये जीवन हैं, इस जीवन का आधार तुम्ही ! तुम शब्द हो मेरी रचना के,, इन शब्दों का संसार तुम्ही !! जितना भी तुम्हे मैं कह पाऊ,, गीतों मैं तुम्हे पा लेता हूँ ! भावों का समर्पण तुमसे हैं, और रस छंदों की धार तुम्ही !! फिर भी विश्वास नहीं तुमको, ये नयन सदा झुक जाते हैं ! कुछ शब्द तुम्हारे अधरों पर, आ-आ के यूंही रुक जाते हैं !! ज्यूँ गीत कोई प्यासे मन के.... हर सांझ मुझे तरसाते हैं, !!!
......हरीश भट्ट....

Wednesday, March 2, 2011

क्यों न मैं शंकर हो जाऊं



महाशिवरात्रि की शुभकामनाओं के साथ समर्पित

ईश्वर,, ऐसा वर दे मुझको ! 
क्यों न मैं, शंकर हो जाऊं !!
विष पिलूं मैं, जग का सारा ! 
नीलकंठ, जग में कहलाऊँ !!

हो प्रदीप्त ये... छाया मेरी !
दोष विहीन हो, काया मेरी !!
आदर्शों की, भस्म रमा कर !
ओरों को, सत्पथ पर लाऊं  !!
ईश्वर,, ऐसा वर दे मुझको ! क्यों न में, शंकर हो जाऊं !!

हो त्रिशूल वो, कर में ऐसा !
श्रीहरी के हो, वज्र के जैसा !!
दुष्कर्मों का, नाश करे जो !
पाशुपास्त्र, तुरीण मैं ऐसा !!
दुष्टों का, संहार कर सकूं !
नभ में, धर्मध्वजा लहराऊँ !!
ईश्वर,, ऐसा वर दे मुझको ! क्यों न में, शंकर हो जाऊं !!

शैल सुता, हिम्मत हो मेरी !
क्रोधाग्नि,, ताकत हो मेरी !!
तम मेरा,, सहचर हो जाये !
तिमिर संग, संगत हो मेरी !!
अवगुण मेरे, गुण बन जाये !
अपने में ....परिवर्तन लाऊं !!
ईश्वर,, ऐसा वर दे मुझको ! क्यों न में, शंकर हो जाऊं !!

संहारक, शिवदूत भी मैं हूँ !
दुख्भंजक अवधूत भी मैं हूँ !!
नीलेश्वर कालेश्वर भी मैं !
सोमनाथ औ' भूत भी मैं हूँ !!
पार्वती अर्धांग हो.... केवल !
सति को ही हर रूप मैं पाऊँ !!
ईश्वर,, ऐसा वर दे मुझको ! क्यों न में, शंकर हो जाऊं !!

Saturday, February 26, 2011

उसने फिर से,.. गजल सुनाई हैं

जख्म अश्कों से, धो गया कोई !
ख्वाब आँखों  में , बो गया कोई !!

उसके हाथों मैं,.. कारसाज़ी थी !
थपकियों में ही,.. सो गया कोई !!

दिलकी खिड़की तो बंद कर लेते !
फिर न कहना कि लो, गया कोई !!

उसकी कोशिश तो थी हँसाने की !
कम नसीबी में..... रो गया कोई !!

फिर न आया पलटके.. आइन्दा !
मुह फुला करके... जो गया कोई !!

ऐसी दिल की लगी, अदावत में !
जिंदगी भर का.... हो गया कोई !!

उसने फिर से,.. गजल सुनाई हैं !
फिर तलाशो कि.. खो गया कोई !!

जख्म अश्कों से, .धो गया कोई !
ख्वाब आँखों मैं,....बो गया कोई !!

Friday, February 25, 2011

Happy and Safe HOLI

Happy and Safe HOLI with Organic Colors!!!

Holi is the festival of freedom from social norms. It knows no bars, no color, no creed. Everybody feels it is his right to enjoy. Songs, dance, drinks & food everything goes in excess. It can be said, Life turns Colorful when it is time for Holi. It is not just children, but the young and the old alike who take delight in this joyous festival of colors and demand every color in loads. Whatever be the choice of color, nobody remains in his original texture. Faces smeared with color look adorable at the end of the play. Really, the other name of the festival is FUN.

Are you aware of the Harmful Effects of Synthetic Colors?

* Synthetic colors are a cause of many health hazards. Desire of darker and more long-lasting colors led us to the use of these skin-unfriendly colors.
* Oxidized metals or industrial dyes mixed with engine oil are often used in such colors and can lead to a number of skin-diseases and are harmful for our eyes.
* Synthetic colors are particularly harmful for skin and can produce any kind of skin rash, itching and pimples i.e. allergic reaction.
* The Red color comes from mercury sulphate, Green from copper sulphate, Silver from aluminium bromide and Black from lead oxide which are really harmful for us.
* These dangerous side effects of Synthetic colors can make the festival of colors colorless rather than colorful.

Are you aware of the Health Benefits of Organic Herbal Gulal?

* Use of Gulals and colors in Holi is not just for mythological reasons but for its health benefits known to ancient physicians.
* At the commencement of spring when Holi is celebrated, the change of weather brings with it germs of diseases and playful throwing of colors made of medicinal herbs like Tulsi, Turmeric(Haldi), Neem etc. keep the germs under control.
* It is inherent medicinal properties of concerned herbs which provide these health benefits along with many more.
* They protect our skin from harmful micro-organisms without any harmful effect and provide other health benefits too.
* They are non-irritant and do not produce any kind of skin rash, itching and pimples.
* Improve skin texture
* Relieve inflammation
* Improve healing of wounds

Monday, February 14, 2011

१४ फ़रवरी यानि वेलेंटाइन डे



१४  फ़रवरी यानि वेलेंटाइन डे
ओर वो कहते हैं की प्यार के इजहार का दिन हैं, इकरार का दिन हैं ओर कहीं कहीं तकरार का दिन हैं. ये ठीक रहा वैसे की एक दिन फिक्स कर लिया की आज सुबह सुबह प्यार का इजहार कर लिया जाये अगर चूक गए तो जैसे कल तो फिर ये दिन आएगा नहीं... मानो इजहार न हुआ चुनाव का मतदान हो गया की ५ साल में एक दिन फिक्स... वैसे भी आजकल पंचायती चुनावों की बयार बह रही हैं
अपने लक्की जी को ही ले लो कल से परेशां हैं की भैय्ये वेलेंटाइन डे आने वाला हैं गिफ्ट शिफ्ट खरीद ले कुछ दो तीन तरह के पर्फियूम     दो-चार  डियो..इअरिंग्स .... musical कार्ड्स ओर न जाने क्या क्या.. अब आप पूछेंगे..... इतने क्यों भाई........ तो भईय्ये महिला मित्र भी तो हैं इतनी सारी.........तो क्या सबसे वेलेंटाइन  डे मनाओगे......... लो अब करो बात ..........भाई सभी को खुश करना जरूरी हैं ना .........अब टीना  को पर्फियूम.......  तो लीना को डियो .........शीला को इयरिंग  ...........तो रीना को कार्ड.. ऐसे ही तो हैं ये डे मानाने का रिवाज
रात से ही मोबाइल पे मेसेज आने लगे हैं एक को रिप्लाई  दिया......... दुसरे को प्रोपोस किया......... इटावा वाली कम्मो(कमलेश) को ग़ालिब का शेर तो............... करनाल वाली अन्नु को बुले शाह की रुबाई................ भाई मोबाइल न हुआ नुक्कड़ का कलवा नाइ  हो गया की इस गाँव की उस गाव तक पंहुचा दे .....हद तो तब हुई की बनारस वाली रितिका  को जो रिश्ते में कजन लगती थी जम्मू वाली रिद्धिमा  समझ के प्रपोस  कर दिया तब दिमाग झंनाया जब दो गालिया सुनी ओर तब ख्याल आया की मोबाइल में नंबर केसाथ नाम ओर पता लिखना कितना जरूरी हैं
सुबह पिछली गाली की शम्मो(शमिता) को महंगा वाल पर्फियूम ओर डियो का सेट देते समय भावुक हो गए थे अपने लकी  भाई अब उन्हें क्या पता की शम्मो के पर्स में आलरेडी  ४ पर्फियूम ऐसी ही पहले से पढ़े हैं
अब इन्टरनेट का जमाना  हैं तो ऑनलाइन इजहार भी जरूरी ही हैं फेसबुक .. ट्विटर ..ऑरकुट.. १००- १५० लोगो की फ्रेंड लिस्ट में अब ३० -४० प्रेमिकाए तो निकल ही आती हैं वैसे भी अपने लक्की भाई रंगीन मिजाज शख्श  हैं सो रेडीमेड स्क्रेप्स का पूरा बंच दे मारा छाट- छाट कर कोई ना कोई तो एक्सेप्ट कर ही लेगी...  ऐसे ही हैं अपने लकी  भाई  अब ऑरकुट पे आये ओर चेट न हो..!! कैसे हो सकता हैं ओर कमाल हैं लकी भाई का भी एक समय में ४- ४ से चेटिंग....... मजाल हैं जो एक भी  ऑनलाइन फ्रेंड छूट  जाये हाँ. ये अलग बात हैं की किसी की लाइन किसी में लिखी जाये गलती से याद नहीं रहता ना की किसको पहले प्रोपोसे कर चुके हैं गलती से दोबारा कर दो तो सामने वाले को शक होना लाजमी ही हैं ओर हाँ जब तक मेल के प्रोफाइल में ८०% फिमेल  ओर फिमेल  की प्रोफाइल में ८०% मेल फ्रेंड्स ना हो दोस्तों के आगे नाक ही ऊँची नहीं होती
प्रेमिकाय न हुई स्टेटस  सिम्बल हो गया

ऐसा ही हैं आज का इजहार-ए-मोहब्बत तेज लाइफ हैं तो पार्टनर भी तेजी से बदलना ही पढ़ेगा  महीना ख़त्म होते होते नई प्रेमिका के नाम की तख्ती लगाना जरूरी हैं......... वरना कालेज ओर दोस्तों  में ख्वामखाह बेकवार्ड  की संज्ञा में आ जायेंगे........ अब वो दिन तो हवा हुए जब फखरू मियां फाख्ता उड़ाया  करते थे मेरा मतलब की २० साल पहले के ज़माने की बात करूं तो तो मेरे एक मित्र थे उनका कालेज का फर्स्ट इयर तो देखने दिखाने ओर इंतजार करने में ही निकल गया  सेकेंड इयर में कहीं नजर  चार हो पाई  थी ओर थर्ड  इयर के अंतिम कुछ दिनों में ही इजहार   हो पाया  था वो भी पेसेंजर  ट्रेन की तरह जो न  जाने कितनी बार अटक अटक के पहुचती हैं
अब कहाँ वो पहले सी रवायत की अम्मा ने दही लेने भी भेजा तो ३ कोस दूर महबूब की गली की दुकान से इस उम्मीद में की वो भी मिल जाये कहीं समोसे खरीदती हुई .....
दोस्तों प्यार क्या किसी एक दिन का मोहताज हैं ? या केवल महेंगे गिफ्ट्स का ? प्यार का ऐसा बाजारीकरण देखता हूँ तो शर्म आती हैं....क्षमा कीजियेगा ....शायद आपको बुरा लगे .... ऐसे प्यार पर तारिख ओर टाइम देख के होने वाला प्यार तो शायद केलेंडर बदलते ही खुद को भी बदल ले
पर अपने लकी भाई मस्त हैं ५ प्रपोजल  तो असेप्ट हो भी गए उनके  ............
बधाई सबको .....

Saturday, February 5, 2011

कथा मधुलता की

दोस्तों ऊतराखंड में चंद वंश  के काल की लोक गाथाओं मैं प्रचलित एक प्रणय कथा के अंतिम कुछ पन्नो की व्यग्रता सुनाता हूँ  आपको, कथा बहुत लम्बी हैं पर अंत सभी प्रणय कथाओ  की तरह  ही होता हैं जब रानी मधुलता अपने प्रियतम सूर्यशेखर  से मिलने जाती हैं पर इसका पता रानी मधुलता के भाइयों को लग जाता हैं ओर वो रस्ते में सूर्यशेखर  को  घेर लेते हैं ओर इस लड़ाई में सूर्यशेखर  की विजय होती हैं ओर वह ३६  सैनिको को मौत की नींद सुला कर भी सरयू के तट पर पहुचता हैं जहां मधुलता उससे मिलने आने वाली थी किन्तु प्राणों की बलि दे कर,, लोकोक्ति कहती हैं की रानी मधुलता ने वही अपने हाथों से सरयू  के किनारे चिता बनाई  ओर अपने प्रियतम के साथ ही अग्निसमाधि ले ली   


अर्द्धरात्रि  में ....स्वप्न सजाये !
निकली थी इक.. नार अकेली !!
दुग्ध वर्ण.. .. परिकल्प सुंदरी !
मृगलोचन, मृगसम अलबेली !!

अधर सुधामय, चक्षु कांतिमय !
मन में इक......... संकल्प लिए !!
तन व्याकुल, पर दृण निश्चय से ! 
पिया मिलन की .....आस लिए !!

मार्ग कठिन पर निश्चल मन था !
रोके रोक नहीं ........पाई बाधाए !!
रुक रुक कर ...सजदे करती थी !
चारू चन्द्र की .........चंचलताए !!

दूर कहीं ...........तारों के आगे !
पगडण्डी हैं ..............गई जहां !!
वहीँ कहीं ... प्रियतम हैं उसका !
वही कही ......मंजिल के निशाँ !!

कदम तीव्रतर...... होते जाते !
ज्यों ज्यों मंजिल .पास आती !!
विरहाग्नि ........सीने में ऐसी !
अन्तकरण तक... .धधकाती !!

कदम दोकदम चार कदम अब !
कोई फासला.......... दूर न था !!
किन्तु देवहठ, उनका मिलन  !
अब विधना को ....मंजूर न था !!

दूर क्षितिज अभि अरुण नहीं था !
अभी रात्रि का..... प्रहर  शेष था !!
छूट रही......... तारों की शाला !
दूर हो रहा ......तम  विशेष था !!

वहां पार्श्व में ........रण भूमि में !
वीर अकेला........ डटा हुआ था !!
कई विरोधी............ नरमुंडों में !
काल दूत सा...... अड़ा  हुआ था !!

वीर हिमालय पुत्र...... सूर्य सम !
ऐसे वीर को ........क्या ही कहें  !!
ऐसे अकेला लड़ा.... .वो अरि से !
सर छत्तिस  धड पर ....नहीं रहे !!

लो पहुँच गई वो नाव घाट पर !
जहां मिलन की.. बात हुई थी !!
यही तो वो प्रतिक्षण हैं जिसमे !
प्रणय की वो शुरुआत हुई थी !!
 
वहीँ वीर वह..... खड़ा हुआ था !
धीर अचल .......मेरु पर्वत सा !!
रक्त रचित सा..... खड्ग लिए !
ओर शत्रु ह्रास को वो तत्पर सा !!

अश्रु झर गए ..श्वाश रुक गया !
उसकी छिद्रित .....देह देख कर !!
रक्त धार.... उन्नत ललाट पर !
कवच को बेधित  बाण देख कर !!

आह की  अंतिम श्वाश शेष था !
प्राण तो बस ..मृतप्राय हो गया !!
हाय ये निष्ठुरता... विधना की !
मिलन विरह ... पर्याय हो गया!!

शोक ! ये कैसा दृश्य .विदारक !
शोक ! ये कैसा...... क्लेश हुआ !!
एक सूर्य...... अरुणिम होता था !
एक सूर्य........... निश्तेज हुआ !!

Saturday, January 29, 2011

न जाने कौन गुनाहों की सजा


बुजुर्गो में कई दिन से जो रोटी बाँट रहा हैं
न जाने कौन गुनाहों की सजा काट  रहा हैं

मुहअँधेरे ही चली आती हैं आवाजे पड़ोस से
वो बेक़सूर हैं उसको क्यों इतना डांट रहा हैं

तू आसमा हैं... सरपरस्त हैं... वफादारी का
वो दिलफरेब हैं फिरभी ये रिश्ता गांठ रहा हैं

वो जिसने उम्र गुजारी.... हर एक जनाजे में
कल से बिछड़े हुए बेटे की मिटटी छाँट  रहा हैं

बुझा दिया हैं जिन्हें...... जिस्त  के थपेड़ों ने
सुना हैं उनका भी बरसों ही बड़ा  ठाट रहा हैं 

ख्वाब सा बोने लगा हूँ


ख्वाब सा बोने लगा हूँ
बज्म में सोने लगा हूँ

दोस्तों की बेरुखी को
अश्कों से धोने लगा हूँ

दरमियाँ आये वो जबसे
में तो बस कोने लगा हूँ

अब तो पीछे से पुकारों
गुम शुदा होने लगा हूँ

तुमभी हस दो बेकसी पे
में तो अब रोने लगा हूँ

जिंदगी भर की कमाई
इश्क में.. खोने लगा हूँ