Tuesday, May 29, 2018

तरही गजल .वो तुम्हारे हुस्न की रानाइयाँ

वो तुम्हारे हुस्न की, रानाइयाँ ।।
और ये जां सोखता, अंगड़ाइयाँ ।।

साथ में तुम चल सको, तो चलो ।
हैं खड़ी हर मोड़ पर, तन्हाईयाँ।।

इस कदर तन्हां रहा हूँ, रात में ।
दिन में मेरे साथ थी, परछाइयाँ ।।

मैँ किनारे पे खड़ा, तकता रहा ।
उनकी आँखों में रही, गहराइयाँ ।।

दोस्तों से दूर हो, जाओगे तुम  ।
इतनी भी अच्छी नही, ऊँचाइयाँ ।।

ये तुम्हारे इश्क़ का, ईनाम था ।
हर कदम पर मिली, रुसवाईयाँ ।।

जब तुम्हारी याद दुल्हन सी सजी ।
देर तक बजती रही,, शहनाइयाँ ।।

हरीश भट्ट

लघु कथा

लधु कथा
विषय -अनकहा सा कुछ

☆☆☆☆☆☆☆☆☆☆☆☆☆☆☆☆
"माँ में ऑफिस को निकल रही हूँ बाय....
सरिता ने बैग में जरूरी फाइल्स रक्खी और कंधे से टांगते हुए रसोई में खड़ी माँ से कहती हुए ओफ्फिस के लिए निकल पड़ी
सरिता...अपनी नॉकरी के लिए बहुत स्ट्रिक्ट थी पिता के जाने के बाद उसकी ही नॉकरी से घर चल रहा था वरना माँ की बीमारी घरखर्च बहन की पढ़ाई सब कैसे होता इन सब में कब उसकी शादी की उम्र निकल गई उसे पता ही न चला
"रुक तो सरु नाश्ता तो करती जा ले लगा दिया हैं टेबल पर..माँ ने पीछे से आवाज लगते हुए कहा
नही माँ देर हो जाएगी बस एक घूंट दूध दे दो एक ब्रेड का पीस उठाते हुए कहा था सरिता ने
"बात तो सुन आज शाम पांडे जी का परिवार आ रहा हैं घर पर तुझे देखने मैँ सब तैयारी करके रखूंगी बस तू 6 बजे तक आ जाना माँ ने हुलसते हुए कहा"
"माँ कितनी बार तो कहा हैं ये देखने दिखाने का प्रोग्राम मत बनाया करो मेरे पीछे मुझे अभी शादी नही करनी हैं"
सरिता ने मुह बनाते हुए कहा
"देख सरु अभी अभी नही के चक्कर में कई अच्छे रिश्ते हाथ से निकल गए भादों से तुझे 28वां लग गया हैं अब और कितना रुकेगी तेरे पीछे तरु भी बैठी हैं अभी तक"
""माँ यार तुम अब शुरू मत हो जाना अभी दिसंबर तक तो नही दिसंबर में प्रोमोशन डिउ हैं और मुझे यकीन हैं हल्द्वानी ब्रांच ऑफिस शुरू होते ही मुझे ही ब्रांच मैनेजर बना कर भेजा जाएगा प्लीज उन्हें मना कर देना आज तो नही हो पायेगा आज प्रेजेंटेशन भी हैं ""
""सरु सुन तो देख मेरा कोई भरोसा नही कब ऊपर का बुलावा आया जाए अपने सामने तुम दोनों बहनों का संसार बसता देख लू बस ...मान ले बेटा"
मां वैसे भी मेरी शादी की इच्छा नही जब उम्र थी तब जिम्मेदारी का बोझ था अब मन ही नही करता सरिता ने माँ का कंधा पकड़ते हुए कहा छोड़ ये रोज रोज की बात"
"सरु ऐसा मतबोल ऐसा भी नही की तरु की कर दें ब्राह्मण परिवार की बड़ी लड़की बिनब्याही राह जाए तो कैसे छोटी की हो"
"रहने दो माँ ईसे किसी की फिक्र नही ईसे तो बस अपनी नॉकरी प्यारी हैं ये न खुद करेगी न किसी की होने देगी" अंदर से तरु झुंझलाते हुए बोली थी
झक्क सा पढ़ गया था सरिता का चेहरा.. बहन का उलाहना सीधे दिल पर लगा
"ठीक हैं तरु में तैयार हूं बस इतना बता दो मेरे जाने के बाद माँ की दवाई घर का किराया तेरे खर्चे कहाँ से आएंगे ... मैने भी तो तुझसे कहा था मेरे ऑफिस में स्टेनो की नॉकरी हैं कर ले पर तुझे तब एमबीए करना था आज तेरी नॉकरी होती तो कर लेती मैं शादी" और बहन में तेरी शादी में रुकावट बनू ऐसा तो सोच भी नही सकती मैं"
"माँ किस लड़की का सपना नही होता कि वो शादी कर के अपना संसार बसाए पर माँ आपने ही कहा था न बाबू जी के जाने के बाद कि सरु अब तू ही हैं बाबू की जगह
बोलो माँ मेरे लिए शादी जरूरी हैं या जीना
भारी होती आवाज और आंखों में तैरते पानी को छुपाती हुए सरिता बस स्टैंड की तरफ निकल चुकी थी
तरु माँ की भर आईं आंखें देख रही थी कितना कुछ तो कह दिया था फिर भी कुछ तो अनकहा रह गया था सरु कि बातों में
हरीश भट्ट

लघु कथा अनकहा सा कुछ

लधु कथा
विषय -अनकहा सा कुछ

☆☆☆☆☆☆☆☆☆☆☆☆☆☆☆☆
रोहन ने मोबाइल को ऐसे देखा जैसे कोई दुश्मन हो... हद हैं सुबह से उसकी प्रोफ़ाइल पर लगातार नोटिफिकेशन आ रहे थे पर ...पर जिसका इन्तजार था उसका अभी तक भी नहीं परसो शाम से न तो शीतल ने उसे कोई मेस्सेज किया था न उसकी प्रोफ़ाइल पर ही आई थी
रोहन ने शीतल की प्रोफाइल चेक की ...नहीं अभी तक तो हैं प्रोफाइल में उनफ़्रेंड भी नहीं किया फिर उसका मैसेज क्यों नहीं...परसो से अब तक एक भी नही.... ऐसा तो कभी नही हुआ
तीन साल हो गए थे रोहन और शीतल को इस आभासी दुनिया में बिना इक दुसरे को जाने बिना देखें इक ऐसा अनकहा अनबूझा रिश्ता हो गया था दोनों के बीच की जब तक एक दुसरे को मेस्सेज न कर लें सांस नहीं आती थी... सुबह की गुड मोर्निंग हो... या रात की गुड नाईट दिन भर क्या खाया.. क्या पिया ...क्या पहना... कहाँ हो ...कैसी लग रही हूँ ...मिस कर रही हूँ कब मिलोगे ...इन्हीं सब में बीत जाता था
फिर ऐसा क्या हुआ की कल शाम से कोई तवज्जो ही नहीं
परसो शाम तो मेसेज किया था उसे ...रोहन ने मेसेजर ओन किया आखरी मेसेज शीतल का ही था....."ओके जब घर आ जाओ मेसेज कर देना बाय टेक केयर स्वीट ड्रीम्स लव यु डियर ""

रोहन परसो दोपहर से हॉस्पिटल में ही था डेंगू हुआ था उसे लगातार बिगड़ती हालत ने उसे भर्ती करवा ही दिया ...कमजोरी इतनी की टॉयलेट तक जाना मुश्किल शायद बैड पर ही करवाया था रीमा ने ..ओह रीमा से तो मिलवाना ही भूल गया ...रीमा उसकी पत्नी थी
पूरी रात रीमा उसके सरहाने बैठी रही रात अपने हाथ से खाना खिलाया दो बार तो कपड़े भी उसी ने बदले उल्टी के कारण ....रात पता नही कब तक तो सर पर ठंडी पट्टियां रखने में बीती याद नही उसे... हाँ परसो शाम जब रीमा दो मिनट के लिए दवाई लेने नीचे मेडिकल स्टोर पर गई तब मेसेज किया था उसने शीतल को की वह हॉस्पिटल में हैं प्लेटलेट्स 30000 आ चुके हैं कमजोरी बहुत हैं पता नही क्या होगा
साथ ही यह भी लिख दिया था की रीमा मेरे साथ ही हैं मेसेज देख के करना जरा
और फिर डेटा कनेक्शन आफ कर दिया था मेसेज डिलीट करके तब से कल का दिन तो उसे होश ही नही था और आज अभी तक तो कोई मेसेज नही शीतल का

तभी रीमा आ गई शायद चाय नाश्ता लाने गई थी
"उठ गए आप लीजिये चाय पी लीजिये"
"और सुनो आज की रिपोर्ट ठीक हैं प्लेटलेट्स बढ़ रहे हैं ठीक हो जाओगे आप मैने माँ भगवती से मन्नत मांगी थी जब आप ठीक हो जाओगे तो हम चलेंगे चुन्नी चढ़ाने"
मुस्कुरा दिया था रोहन
लाइये मोबाइल मुझे दीजिये में पढ़ के सुना देती हूँ आपके मेसेज अरे ...आप तो सारा दिन मोबाइल पे रहते थे किसी ने पूछा नही मेसेज में की कैसी तबियत हैं कहाँ गई आपकी वो गर्ल फ्रेंड्स जो रोज मेसेज करती थी सुबह शाम.... रीमा ने विजयी भाव से मुस्कुरा कर रोहन की तरफ देखा था
और रोहन को उसकी आँखों में बहुत कुछ दिखा था कहा अनकहा सा ....उसे शीतल का मैसेज याद आ गया ओके मेसेज कर देना जब घर आ जाओ टेक केयर लव यू .....
उसने रीमा का हाथ कस के पकड़ लिया और भर्राये गले से कहा ....नही रीमा मेरी सच्ची गर्लफ्रेंड तो तुम हो
सिर्फ तुम
रिश्तों की परिभाषा समझ गया था वह शायद

हरीश भट्ट

दाग दामन में लगे हैं

मिसरा -ए-तरह- "ढूँडने उस को चला हूँ जिसे पा भी न सकूँ"
एक टूटी फूटी कोशिश मेरी भी बेबहर

दाग दामन में लगे हैं की मिटा भी न सकूँ !
और उसपे सितम ये की दिखा भी न सकूँ !!

ऐसे रूठा हैं वो मुझसे की, मना भी न सकूँ !
ढूँढने उसको चला हूँ, जिसे पा भी न सकूँ !!

जब्त ने इश्क में बहरहाल,, मुझे रोका हैं !
हाल-ए-दिल अपना मैं, सुना भी न सकूं !!

कुछ तो तूने भी दिल से, पुकारा नहीं होगा !
वर्ना ऐसा भी नहीं था की में आ भी न सकूं !!

मैंने पहलू में उसे सीने से, लगा रक्खा था !
वो भी सोया था ऐसे की, जगा भी न सकूँ !!

तेरे ही इश्क के इलज़ाम,, बहुत थे वरना !
वर्ना ऐसा भी नहीं सर को उठा भी न सकूँ !!

हरीश भट्ट

जब तुम होते हो साथ

सुनो
जब तुम
होते हो साथ
ये आकाश
क़दमों के नीचे लगता हैं
दूर तक पसरा हो जैसे
सुरमई नीलिमा लिए
उन्मुक्त सागर
आतुर हो जैसे
छूने को
तलवों को मेरे

संभावनाओं का विस्तार
अनंत को
पा ही लेता हैं
समय का बंधन
न किसी पल की
व्यस्तता
एकाकार हो जैसे
इस श्रृष्टि से
और उस के
प्रतिबंधों से
आजाद होने को मेरे

तुम्हारा यूं होना
ऐसे ही सुखद हैं
जैसे बारिश के बाद
की सुनहरी धूप
जैसे सुबह की
मखमली ओस
जैसे दूज की
चांदनी की चंचल फुहार
तुम्हारी खुशबू से
ओत प्रोत
ये कमसिन हवाएं
छूनेको आतुर
हो जैसे
रक्तिम गालों को मेरे

सुनो
रहोगे न ऐसे ही
साथ मेरे '
चाहे आकाश पैरों तले हो
या की विसंगतियों
सा सर पर
सपनीला सागर हो
या की तपती रेत सा
मरुस्थल
मुझे और
कुछ नहीं चाहिए
तुम्हारे पास होने का
एहसास ही बहुत हैं
साँस लेने के लिए
ताजिंदगी ...!!!!

हरीश भट्ट

चट्टान का वो छोर

सुनो
याद हैं तुम्हें
उस चट्टान का
वो स्वप्निल सा छोर
न जाने कितने पल
साथ गुजरे थे हमने
याद हैं तुम्हें

तुम हमेशा
एक हाथ के फासले पे
बैठते थे
वो पहली बार
जब हम बैठे थे
उस दिन
सामने देखते हुए
क्या कुछ नहीं कहा था
तुमने न
मैंने तब, बस
कनखियों से देखा था
तुम्हें इतने करीब
तुमने तो
देखा भी नहीं

याद हैं
तुमने उकेर दिया था
मेरा नाम
उस किनारे पर
कितनी शिद्दत से
तुम्हारी बनाई पेंटिंग हो
या पहली कविता
यही तो सुनाई थी
तुमने मुझे
और में सोचती थी
की कब
ढाल लिया तुमने
कविता में
और स्वयं में
मुझे

सुनो
क्या कहते थे तुम
लवर्स पॉइंट न
हसीं आती हैं आज भी
जब तुम कहते थे
पाकीजा का वो डाइलोग
"ये पैर
जमीन पे मत रखना
मैले हो जायेंगे"
सच में
प्रेम था न तुम्हें
बेइंतेहा मुझसे
और उस जगह से भी
कितना तो शरमाते थे तुम
मुझसे भी जियादा
सब कुछ तो
कहते थे तुम
काश की कहा होता
तुमने
वह
जो मैं
हमेशा सुनना चाहती थी
हमेशा
पर...

आज में वहीँ हूँ
उसी जगह
उसी छोर पे
जहाँ बैठते थे
तुम और में
वो एक हाथ का फासला
अब
सदियों का हो चला हैं
अंतहीन सा

तुम कभी
लौटे होंगे शायद
कभी तो आये होंगे
और बैठे होंगे
इसी जगह पर
जहाँ बैठते थे कभी
हम अपने
सपनों के पंख फैलाये
आकाश छूने की
लालसा में
मेरा नाम
अब मिट सा गया हैं
तुम्हारी आस की तरह
वक्त की धुंध
गहरा गई हैं
उस पर
इन्तजार हैं मगर
उस छोर को
लौटने का तुम्हारा
तुम आओगे न
किसी दिन
बोलो ....!!!

हरीश भट्ट

यूं तो वो मेरी टीचर थी

यूं तो वो मेरी टीचर थी

काटन की ग्रे शेड की साड़ी
और फिरोजी रूमाल
उन्हें पसंद था शायद
मुझे भी
सुबह की अटेंडेंस
और उनकी मुस्कराहट में
'यस मेम' कहना
भूल जाता था कई बार
मैं उनका फेवरेट स्टूडेंट था
और पूरे स्कूल में मेरी
वो सबसे फेवरेट थी
यूं तो वो मेरी टीचर थी
.
कापी घर भूल आने पर भी
कभी कुछ कहती न थी
मेरे छुट्टी के झूठे बहानों पर
वो बस
चश्में के पीछे से देख कर
मुस्कुरा देती थी
वैसे कोई नया बहाना
नहीं होता था मेरे पास
पूछती वो मगर अक्सर थी
यूं तो वो मेरी टीचर थी
.
कई बार लगा की
मेरी टेस्ट कापी पर
कुछ नंबर
यूं ही मिल गए मुझे
वैरी गुड और एक्सीलेंट
सबसे जियादा
मिला करते थे मुझे
उनके पढ़ने का अंदाज
सबसे जुदा था
अपनी यूनिवर्सिटी की
वो टापर थी
यूं तो वो मेरी टीचर थी
.
मैंने कभी
उन्हें नाराज नहीं देखा
आँखें बदलने का
अंदाज नहीं देखा
मुश्किल सवालों का हल
कभी मुझसे नहीं पूछा होगा
हालाँकि
होमवर्क पूरा न करने पर
डांटती वो मुझे
जी भर थी
यूं तो वो मेरी टीचर थी
.
किताबों के अलावा भी
चेहरे पढना
सिखाया था उन्होंने
धैर्य स्नेह विश्वास का
दीपक भी
जलाया था उन्होंने
व्यावहारिकता क्या होती हैं
यूं ही तो बताया था उन्होंने
रिसेस तक
मुरझा जाते थे हम
तरोताजा वो मगर
दिन भर थीं
यूं तो वो मेरी टीचर थी

हरीश भट्ट