Saturday, May 5, 2012

अंतस तक प्यासी हैं धरती

देहरादून के गडवाल विकास निगम का वह कांफ्रेंस हॉल तालियों की गडगडाहट से गूँज रहा था मंच पर राज्य के सांस्कृतिक विकास मंत्री श्री परमार जी ने अपना उद्बोधन देना शुरू किया ...."मुझे ख़ुशी हैं और गर्व भी,.. इस साल का संस्कृति रत्न पुरुस्कार श्री अनिरुद्ध डबराल जी को देते हुए ...आज  इनके काव्य संग्रह "अंतस " का विमोचन करते हुए मुझे अत्यंत हर्ष हो रहा हैं...इतनी कम उम्र में ऐसा प्रखर सृजन......... ""....और हाल एक बार फिर तालियों की गडगडाहट से भर गया....
अनिरुद्ध की आंखे स्टेज पर खड़े खड़े डबडबा आई थी ....आज उसका सपना जो साकार हो रहा था ...चिर प्रतीक्षित सपना ...उसकी पिता जी कि आँखों में चमक बड़ गई थी... बढ़ा आयोजन था...सब दोस्तों कि नजरें  आज अनिरुद्ध पर ही थी ...और जब अनिरुद्ध ने अपनी पुस्तक से कविता के  कुछ अंश पढने शुरू किये...
अंतस तक प्यासी हैं धरती
आओ अम्बर को बतलाये ....

तब वहीँ तो थी कादम्बिनी  हॉल के दूसरे दरवाजे कि ओट  में ....हजारों बार सुनी थी उसने यह कविता अनि के मुह से ...तब उसे लगता था जैसे धरती कि नहीं यह उसकी स्वयं कि बात हो...."अंतस तक प्यासी हैं धरती.....
कुछ दिन पहले  कि ही तो बात हैं .....
 
""अनिरुद्ध ""....बहुत दिन से तुमने कुछ नया नहीं लिखा...... पूछा था कादम्बनी ने...एक सकून भरी मुस्कराहट के साथ कहा था अनिरुद्ध ने...नहीं कादम्बनी कुछ नया लिखने का मन नहीं ...मेरे अन्दर से तब कुछ उत्सर्जित होता   हैं  ..जब में अकेला  होता हूँ ...दर्द और बेचैनी निकल ही आती हैं वर्कों पर ...लेकिन ...तुमसे मिलने के बाद सब कुछ पा लिया लगता हैं मेरी तलाश ख़त्म हुई...
"लेकिन अनिरुद्ध तुम्हारे सपने...तुम चाहते थे न कि तुम्हारा काव्यसंग्रह....."" ...
ओहो....कादम्बिनी ...तुम हो ना मेरा काव्य संग्रह...आओ कहीं काफी पीते हैं

पर अनिरुद्ध तुम्हारा सपना मेरा भी तो हैं ..में तुम्हे आगे बढ़ते देखना चाहती हूँ जरूरी तो नहीं केवल मिलन और विछोह के ही गीत लिखे जाये...खुशियों के पल भी तो हैं सामाजिकता ..संस्कृति...
प्लीज़ कादम्बनी ...सुबह सुबह ..क्यों मूड ख़राब कर रही हो ..तुम्हारी दोस्ती मुझसे हैं या मेरी रचनाओं से..कसक कर कहा अनिरुद्ध ने
 नहीं अनि ..तुमसे तो हैं पर ..तुम्हारी रचनाओं  में  मेरा जीवन बसता  हैं....  तुम्हारी रचनाओं कि नायिकाओं में मैं खुद को तलाशती हूँ ...रख के देखती हूँ खुद को ...
हहहहहः ....क्या कादम्बनी ...तुम भी न...अरे कल्पनाओं कि नायिका और तुममे बहुत फर्क हैं ..
.हँसते हुए कहा था अनिरुद्ध ने
वो तो अतीत हो जाती हैं ...पल में ओझल ..पर..पर तुम तो मेरा वर्तमान हो...तुम से तो मैंने जीना सीखा हैं ....अच्छा  ..सुनो...प्लाजा में नई फिल्म लगी हैं ...शाम को चलते हैं ...वहीँ कैंटीन में कुछ खा लेंगे..
नहीं अनि...आज मुझे कुछ काम हैं में चलती हूँ ...बाय ..

 
घर लौटते हुए कादम्बिनी  के चेहरे पे उदासी थी ...वह सोच रही थी ...कि कैसे अनिरुद्ध को बताये कि उसकी बातों में उसकी रचनाओं में एक अलग बात हैं ...वह अच्छा लिख सकता हैं ...इतना कि दुनिया उसे पढ़े ...और उसे सर आँखों पे बिठाये
 
कादम्बिनी अनिरुद्ध को बचपन से जानती थी दोनों  एक दूसरे कि चाहत थे पर कादम्बनी कि नज़रों में प्यार के मायने अलग थे वो जब अनिरुद्ध कि आँखों में आगे बढ़ने का सपना देखती थी..जब उसके चेहरे पर भविष्य कि ख़ुशी कि झलक महसूस करती थी तो उसे लगता था कि शायद यही चाहत हैं उस खुशी उस सपने को पूरा करने में ही उसके प्यार का हक अदा हो जाये शायद

शाम गहरा गई थी सोचते सोचते ...घर भी नजदीक ही था...
 
सुबह ही अनिरुद्ध का फोन आ गया ...."कादम्बिनी याद हैं ना तुम्हे आज तुम आपने घरवालों से मेरे बारे में बात करोगी ""
""क्या बकवास कर रहे हो अनिरुद्ध ..एक दो बार तुम्हारे साथ घूम क्या ली तुमने मुझसे रिश्ता जोड़ लिया ...तुमने सोच भी कैसे लिया कि में तुमसे शादी करूंगी ....आगे से कभी मुझे फ़ोन मत करना""
 
और...फोन काट दिया कादम्बनी ने ....उसकी आँखों में खारापन बड़ गया था ....हाँ यही तो सोचा था उसने कल शाम घर वापस आते हुए गहराते अंधियारे में.............
और अनिरुद्ध जड़ होगया था ..सुन कर...उसने कादम्बिनी को मिलने की कोशिश की तो पता चला वह आपने मामा के यहाँ चली गई हैं ..हल्द्वानी ..कोई कोर्स के लिए...
छः माह बीत गए शायद....
 
कांफ्रेंस हाल से निकलते हुए बुक स्टाल से कादम्बिनी ने  अनिरुद्ध की कविताओं का संकलन खरीदा ..प्रथम पेज पर ही "दो शब्द .."पढ़ कर उसकी आंखे फिर से नम हो गई वह दौड़ रही थी पूरे वेग से घर की और ....
लिखा था ....
""एक स्नेहिल मित्र के अंतस को समर्पित.... ""
 
कौन जान सकेगा की ..क्यों घुमड़ कर आये मेघ कभी कभी धरती को प्यासा छोड़ कर रुख बदल लेते हैं जबकि उनकी तृप्ति भी धरती को अंतस  तक भिगोने    की हैं ...
कौन जान सकेगा...??

Saturday, April 21, 2012

क्षितिज की
लालिमा
कोरी सी
लगेगी,
सपाट
हो जायेंगे,
देवस्थलों के
उतुंग
शिखर!
बाढ़ सी
छितरा देंगे,
गंगा के
ये उर्वरा मैंदान,
अगर तुमने
माथे से
ये बिंदी
बदल ली
तो... !!!!!
में हर रिश्ते को  शिद्दत से सर-ए-तस्लीम  करता हूँ
वो मुझ पर फर्ज था उसका बेइरादतन  मुस्कुरा देना

मंदिर कि सीडियां चड़ते हुए


मंदिर कि सीडियां चड़ते  हुए
साथ साथ 
श्वास दर श्वास
देखता हूँ उसे

दोनों हाथों में
पूजा का थाल लिए
सर पर
उम्मीदों का पल्लू रक्खे
कजराई आँखों में
सम्पूर्ण विश्व का
वात्सल्य समेटे
कुसुमित   से होठों पर
प्रार्थना  के स्वर   लिए
कदम दर कदम
निर्भीक और प्रफुल्लित

लगता हैं कई कई बार
अलग अलग समयांतर पर
कई कई युगों  में
चड़ी होंगी से सीडियां हमने
यूंही साथ साथ
नयनों से करबद्धता  का
भाव प्रेषित करते हुए

सोचता हूँ
कुछ भी तो नहीं बदला
साल दर साल
आज भी वही प्रतिबद्धता
वही विश्वास
जब पहली बार
इन सीड़ियों पे
कदम रक्खा था

मैं जानता हूँ
हर बार
वह "माँ "से
कुछ नहीं मांगती
अपने लिए
प्रत्यक्षतः तो बिलकुल नहीं
उसकी थाली से अर्पित होते पुष्प
दीपक कि ज्योति
रससिक्त  नारियल
स्वयं ही प्रेषित कर देते है मंतव्य

फिर भी हर बार कि तरह
पूछ लेता हूँ में
क्या माँगा आज "माँ" से

और हर बार कि तरह
मुस्कुराते हुए
कहती हैं वो

"वही...
जो तुमने"

हैरान हूँ
उपलब्ध  संभाव्य विकल्पों मैं से
इतना सटीक चुनाव
कैसे कर लेती हैं वो
माँ से मांगते समय भी

Sunday, April 15, 2012

सुना हैं रंग तुझे



सुना हैं रंग तुझे खुद--ब--खुद  सजाते हैं
और बेसाख्ता ही तुझपे बिखर जाते हैं 

सुना हैं शाम गुजरती हैं तेरी जुल्फों से
सितारे डूब के जाने को मुकर जाते हैं 

सुना हैं गजलें भी तुझपे आह भरती हैं 
तुझ तक आके नगमे भी ठहर जाते हैं

Friday, March 23, 2012

संबंधों कि परिभाषाएं


संबंधों कि परिभाषाएं कुछ रस्मी सी लगती हैं अब तो !
मित्र तुम्हारी कामनाएं.. फर्जी सी लगती हैं अब तो !!
बेमन कि ये प्रार्थनाएं,. अब मुझको रास नहीं आती !
प्रिय तुम्हारा प्रेम पत्र भी अर्जी सी लगती हैं अब तो !!
संबंधों कि परिभाषाएं कुछ रस्मी सी लगती हैं अब तो !

रिश्तों में अपनत्व कहाँ अब पहले सा अधिकार कहाँ !
तिनकों सा बिखरा बिखरा हैं संबल और आधार कहाँ !!
दोमुहेपन कि ये बातें अब अंतस विचलित कर जाती हैं !
शत्रु ह्रदय भी विजय करे जो अब ऐसा व्यवहार कहाँ !!
करुण दया का भाव भी खुदगर्जी सी लगती हैं अब तो !
संबंधों कि परिभाषाएं कुछ रस्मी सी लगती हैं अब तो !!

राग और विद्वेष की भाषा प्रियवाचन पर प्रथ्मांकित हैं !
ह्रदय शूल से वेधित हैं और चित्त भी भय से शंकित हैं !!
मित्र तुम्हारे बाहुपाश में, अपनापन अब निस्तेज हुआ !
कृतिघ्न्ताओं  से भरी शिराएँ...धवल रक्त से रंजित हैं !!
कभी जो थी सहयोगितायें मनमर्जी सी लगती हैं अब तो!
संबंधों कि परिभाषाएं कुछ रस्मी सी लगती हैं अब तो !!

अविरल संबंधों कि पूँजी को क्या पल भर मैं ठुकरा दोगे !
अतरंग क्षणों के प्रतिवेदन, क्या तत्क्षण ही बिखरा दोगे !!
पलभर का भी विचलन तुमको प्रिय कभी स्वीकार नथा !
अब कैसा  ब्रजपात की मुझको ह्रदय से ही बिसरा दोगे !!
साधारण नयनों की भाषा अपवर्जी सी लगती हैं अब तो !
संबंधों कि परिभाषाएं कुछ रस्मी सी लगती हैं अब तो !!

Tuesday, March 20, 2012

आइनों का सच

 
खुद तो रोये थे मुझे भी, तो रुलाया तुमने ,
मुझको कल रात भी बेवक्त जगाया तुमने !

कोरे कागज पे न मजमून न पता था मेरा ,
कितनी शिद्दत से ये रिश्ता निभाया तुमने !

आइनों का सच तो यूँभी मुझे मंजूर न था  ,
टूट कर बिखरा हैं, जब भी दिखाया तुमने !

शाम रुक सी गई, मंजर वो  ठहर सा गया,

ऐसे मुस्का के जो पलकों को गिराया तुमने!


हाँ ये सच हैं कि मैं भी था तेरे तलबगारों मैं ,

जब्त करता ही रहा परदा ना  हटाया तुमने !


बेवफा था मैं खुदगर्ज भी  था नज़रों मैं तेरी ,

सिर्फ मुझसे न कहा दुनियां को बताया तुमने!!

Monday, March 19, 2012

एक मरता हुआ शहर


मेरा घर .....
बूढा हो चुका हैं
चुने सुर्खी की दीवारे
पनियाने लगी हैं...
उदास अकडू सा...
बैठ गया हैं
नीव का गीलापन
....
खड़ा हैं मुह बाये....
चूना चूना टपकती
दीवारों के साथ ........
और ये शहर ....
सारा शहर
धड़धडाता  सा
निकल गया हैं आगे को...
कंक्रीट छितरा दिया हो जैसे
गुल्ली डंडे के मैदान में.....
गुलमोहर के वो पेड़
अब नहीं हैं
उनकी जगह
होर्डिंग खड़े हैं..
कॉर्पोरेट दफ्तरों के.
सारा दिन
भांय भांय करती मोटरों का शोर
और आते जाते लोगों की
रेलमपेल ..
इक्का  दुक्का
पनियाले रंग के पंछी को छोड़
कोई नहीं फुदकता
घर आंगन में....
दूर पहाड़ों से आती
आवारा हवाए
आंचल बिंध के चलती हैं अब....
सिम्बल के वो उड़ते
पुछल्लेदार बीज
जाने कहाँ कहाँ तैरा करते थे ....
शाम को गंगा का
हरा हरा पानी
और उसपर तेरते उम्मीदों के दिए.....
लगता था जैसे
सतरंगी आसमान
समूचा तैर रहा हो सामने ही  .....
पांच  रुपये का
चने  की दाल का पत्ता 
और उबले मकई के दाने का स्वाद....
जाने कहाँ रह गया अब
कन्कव्वों से भरा रहने वाला आकाश
नग्न सा दीखता हैं
कोरा सा ..
दूर तक भुतहा हो जैसे...
और सड़कों पर
अनमने से चेहरे
एक दूसरे को घूरते...
लड़ने को बेताब ...
मुह फेर के कन्नी काटना
शगल हो जैसे  ....
सुबह और शाम
एक हाथ में बैत  
दूसरे में
परदेसी से 
दुग्गले कुत्ते की जंजीर थामे
सरसराते हुए लोग
भभकती सांसों को
हलक में धकियाते हुए
दूसरे मोहल्ले के
आँख मटक्के पे  खिसयाते हुए
एक दूसरे को
अपने कमर 
और ब्लड प्रेशर का नाप बताते हुए  .....
शहर की आवारा हवाओं
और राजनीती को कोसते हुए ...
बस...
इतनी सी मोहल्लेदारी
हाँ ....
एक  मरते हुए शहर को देखने का
शायद यही अंदाज हैं

Saturday, March 17, 2012

उस ख़त के कुछ पन्ने,..


बस यूं ही झिलमिल आँखों से हँसता हूँ
उस ख़त के कुछ पन्ने जब भी पढता हूँ....

बोझिल से दिन तन्हां रातों को लिखती थी
बचकानी सी कुछ बातें जो तुम लिखती थी
सपनीले ख्वाबों  कि बातें, लिखती थी तुम
जागी आँखों के सपने भी, तुम लिखती थी 
अब तक इन आँखों में उनको ही घढ़ता हूँ
उस ख़त के कुछ पन्ने, जब भी पढता हूँ....

अपना नाम कहीं कहीं पर कम लिखती थी
मेरा  नाम बढ़ा सा लेकिन तुम लिखती थी
कविताये और नज्में भी,, लिखती थी तुम
गालीब, मीर, मजाज भी, तुम लिखती थी
कैसे  थे सपनीले दिन अब सोचा करता हूँ
उस ख़त के कुछ पन्ने,.. जब भी पढता हूँ....

चिड़ियों कि बाते चटकीली तुम लिखती थी
तितली कि इतराहट पर भी तुम लिखती थी 
बीते कल कि सब बातें भी,लिखती थी तुम
आज नहीं आओगी  ये भी तुम लिखती थी
याद न जाने तुम्हे आज भी.. क्यों करता हूँ
उस ख़त के कुछ पन्ने,.. जब भी पढता हूँ....

कब रूठे कब मान गए ये भी लिखती थी
पल पल के झगड़ों को भी तुम लिखती थी
कल क्या पहनू ये लिख के पूछा करती थी
मैंने क्या पहना था ये भी तुम लिखती थी 
मन का खाली सूनापन अब यूंही भरता हूँ 
उस ख़त के कुछ पन्ने,.. जब भी पढता हूँ.

जीने और मरने कि कसमे तुम लिखती थी 
राधा कि भी प्रीत कि रस्मे तुम लिखती थी
शायद हम ना मिल  पाएंगे लिखती थी तुम
शीरी और फरहद के किस्से तुम लिखती थी
अन्धियाले सन्नाटों से मैं ..अब भी डरता हूँ
उस ख़त के कुछ पन्ने,.... जब भी पढता हूँ.