Friday, June 24, 2011

वो गज़ल मेरी तो थी पर ,,काफिया मेरा न था


किस कदर थी भीड़ लेकिन काफिला मेरा न था
वो गज़ल मेरी तो थी पर ,,काफिया मेरा न था

आपने भी सच कहूं तो,,आज ही ये तामील की
वक्त-ए-रुखसत साथ था जो बारहा मेरा न था

बज्म मैं वो कुछ कहें और ओर कुछ तन्हाई में
एक मुह और दो जबां का, फलसफा मेरा न था

तुम ही कहो कैसे में रहता चैन से उस बस्ती में
तुम पढ़ गए थे कब्र पर जो, फातिहा मेरा न था

मैं तो इन्सां भी न था, पर तुम  खुदा बनते गए
चाहत भले ही हो मगर ,,ये मशवरा मेरा न था

तुमने भी बस पढ़ के, मुजरिम मुझे  ठहरा दिया
सच कहूं उस तफसील पर वो, तब्सरा मेरा न था

कुछ अजब से  रंग देखे जिस्त के अब क्या कहें
हाँ..जमीं तक तो थी मेरी,पर आसमां मेरा न था