Friday, April 15, 2011

यहाँ हमदर्द कम हैं,


ये दुनिया किसको, रास आई बहुत हैं
यहाँ हमदर्द कम हैं, तमाशाई बहुत हैं

निगाहें अब भी, झुक जाती हैं अक्सर
वो बचपन से मुझसे, शरमाई बहुत हैं

न माना वो जरा सी बात पर लड़ बैठा
बात उसको किसी ने समझाई बहुत हैं

जला दिल किसका, फिर पूछो न यारों
जबां खुश्क पेशानी पे, गरमाई बहुत हैं

जिसकी दुआओं से, घर मेरा रोशन हैं
उस की मोहब्बत, मैंने ठुकराई बहुत हैं

तुझे हर शक्ल में... पहचान सकता हूँ
खुदा मेरे मुझे इतनी भी बीनाई बहुत हैं

सलीके से यहाँ पर..... कौन मिलता हैं
जहाँ भी भीड़ हैं देखो वो तन्हाई बहुत हैं

मैं अब खामोश हूँ तो ,तुम क्यों हैरां हो
मुझे चुप करके दुनिया, पछताई बहुत हैं