Thursday, May 19, 2011

धूप ....हो न तुम






 धूप की गर्माहट
**************
सुनो
हाँ ...तुमसे ही कह रहा हूँ ...
तुम यूं सुबह-सुबह
किरन सी
मत आया करो
द्वार छिद्रों से
दनदनाती हुई
अतिक्रमण सा लगता हैं !

दिन तक आते आते
पसर जाती हो
खिडकियों के पल्लों से
सीधे मेरी आरामकुर्सी तक
छीनती हुई
मेरी निजता को
प्रत्यर्पण सा लगता हैं !

सामने के गुलमोहर
पर इतराती चिढाती
मुझे
घूरा करती हो न तुम..
चिलचिलाती हुई सी
आक्रमण सा लगता हैं !

भावों का वाष्पीकरण
तिलमिलाहट भर देती हैं
गर्माहट इतनी मत बढाओ
तलवों में
पसीना सूख नहीं पाता
संक्रमण सा लगता हैं !

लो.. अब जब
तुम्हारी तपिश का
आदी होने लगा हूँ
तो खीचने लगी हो तुम
अपने पाँव
मेरे आँगन से
क्षरण सा लगता हैं !

सुनो
रुक जाओ
शाम के धुधलके
अस्पष्ट कर देते हैं मुझे
हाथ को हाथ
सुझाई नहीं देगा
अकर्मण्य सा लगता हैं !

लौटा लो खुद को
रात तुमसे
अजनबी कर देती हैं मुझे
सुबह तक
अपरिचित हो जाओगी
तुम फिर मुझसे
ग्रहण सा लगता हैं !

तुमसे
दोबारा मुलाकात तक
कैसे जी पाउँगा
इस,,
क्रमशः ,,
में !!!!