Sunday, May 8, 2011

मेरा हर दर्द सो जाता हैं....



आज मातृ दिवस हैं पर मेरे लिए तो हर दिन ही माँ का दिया हुआ हैं  सो कुछ पंक्तियाँ उनको समर्पित करता हूँ .

मेरे छोटे से घर से ही मेरी दुनियां अयाँ होती हैं
मैं इक कमरे मैं होता हूँ  पूरे घर मैं माँ होती हैं

मेरी दुश्वारियां भी उसकी दुआओं  से डरती हैं
मेरा हर दर्द सो जाता हैं तब जा के माँ सोती हैं

सुब्ह उठते ही सूरज टांक देती हैं छतभर तक
धुधलका हो नहीं पाता कि ..तारे से पिरोती हैं

बच्चों सा नहलाती हैं अब भी  धूप मैं अक्सर
संचित पुन्य से घिस कर मेरे पापों को धोती हैं

ग़मों से टूट कर रोते हुए तो.... देखा हैं लोगो को
वो खुश हो तबभी रोती हैं ओ गुस्से मेंभी रोती हैं

वो उसको याद हैं अब भी.प्रसव की वेदना शायद
वो घर के सामने क्यारी मैं कुछ सपने से बोती हैं