Sunday, May 22, 2011

मैं तो दुनिया से अलग था



इस शहर मैं भी रकीबों का ठिकाना निकला
मेरी बरबादी का, अच्छा ये बहाना निकला

मेरी कमनसीबी  की, पूछों न तुम दुश्वारियां
तुम न  थी तो ये, मौसम भी सुहाना निकला

किस यकीं से कहता मैं हाल-ए-दिल उसको
जिसकी बातों में नया रोज  फ़साना निकला

मैं तो दुनिया से अलग था ही पता था मुझको
नाज-ओ-अंदाज से तू भी तो शाहाना निकला

कैसे करता मैं गुजारिश, की मुझे याद न कर
तुझे भुलाने मैं, मुझे  भी तो जमाना निकला

फिर न कहना की ये अंदाज-ए-गुफ्तगू क्या हैं
जबभी निकला हैं तेरे होठों से दीवाना निकला

तेरी जफ़ाओं के किस्से सुनाये सारी रात जिसे
वो भी आशिक तेरा कमबख्त पुराना निकला