Friday, December 17, 2010

कौन हो तुम ओर क्या हो तुम


दोस्तो एक समय था जब प्रणय गीत का चलन था जो पत्र के माध्यम से संचारित होता था एसा ही एक प्रणय गीत कुछ वर्ष पहले किसी को लिखा था जो सौभाग्य से आज मेरी अर्धान्ग्नी भी हैं आज सभा मैं रख रहा हूँ

सुबह यूँही क्यों बीत जाती हैं
शाम यूँही क्यों जाती
रात हुई जब सोना चाहू
नीद नही हैं आती
एक यही शन्शय रहता हैं
कौन हो तुम ओर क्या हो तुम

बहुत दीनो से हृदय पुष्प मैं
तुम परिमल सी संचित हो
बहुत दीनो से सलिल स्वप्न मैं
तुम वीणा सी झंकृत हो
नयनो मैं दो विश्व सजाए
तुम कुसुमित सी लगती हो
होठो पर दो कमल खिलाए
ललित रति सी लगती हो

प्रिय तुम्हारे रूप सिंधु की
थाह बहुत हैं गहरी
सकल सुधामय रूप तुम्हारा
सूर्य चंद्र हैं प्रहरी
एक अनंत सिंधु हो जैसे
तुम बिन विभावरी यूं कटती हैं
कालकूट से लिप्त हो जैसे
सर्पमयी सी लगती हैं

तुम अनूप्मित अद्वितीय तुम
हर युग मैं मृग तृष्णा
तुम अवर्णनीय अनीयवर्च्निय
ज्यों ओस कणो की प्रतिमा
चित्र तुम्हारा मेरे हृदय पर
ऐसे है रेखांकित
इंद्रधनुष के रंग हो जैसे
व्योम देह पर अंकित

ज्योतिपुंज तुम ज्योतिशिखा तुम
ज्योतिर्मय नख शिख हो
स्वप्न सुंदरी स्वप्न जनित तुम
स्वप्न रूप स्वप्निल हो
मुख शुक्ल पक्ष का चंद्र हो जैसे
नयन भोर का तारा
शयाह रंग कुन्तल ललाट पर
विश्व भ्रमित हैं सारा
हे प्रिय मेरी रचनाओ का
सार तुम्ही हो केवल
तुम बिन ये स्वर अर्थ हीन हैं
अर्थहीन हैं जीवन

तुम्हे मैं अपना बना चुका हूं
किंतु नही हूं जाना
तुम्हे कविता बना चुका हूं
किंतु नही हूं जाना
की कौन हो तुम ओर क्या हो तुम