Tuesday, December 14, 2010

चक्रव्यूह ....


कौन तोड़ेगा यह चक्रव्यूह
युधिष्ठिर ने पूछा था
जब महारथियों से
सबके सर
नीचे मिले थे उन्हे
तो क्या
वे पराजय स्वीकार कर लेते
तभी घटित हुआ था वह वीर की तरह
अर्जुन नही
तो अर्जुन पुत्र तो हैं
"अभीमन्न्यु"
सोलह बरस का वह बालक
भेद तो गया था वह
पर प्राणो की बलि दे कर
कौन तोड़ेगा यह चक्रव्यूह
द्वापर मैं एक बार यह प्रश्न उठा था
ओर आज फिर यह प्रश्न उठा हैं
आज जबकि ना कोई अर्जुन हैं
न कोई अभिमन्न्यु
फिर कौन तोड़ेगा यह चक्रव्यूह
इस चक्रव्यूह के
पहले द्वार पर हैं "अशिक्षा"
दूसरे द्वार पर "छुआछूत"
तीसरे द्वार पर महारथी "दहेज"
चौथे द्वार पर "अंधविश्वास"
पाचवे द्वार का दारोमदार थामे हैं "महँगाई"
छटे द्वार पर महाबली "भ्रष्टाचार"
ओर सातवे द्वार पर रक्तपीपासु "ग़रीबी"
इस कलयुगी चक्रव्यूह को भेदने
अब कोई अभिमन्न्यु पैदा नही होता
द्वापर से कलयुग तक
इस व्यूह को भेदने वाला अभिमन्न्यु
तो शायद एक ही हुआ हैं
किंतु
व्यूह के निर्माता
कई द्रोणाचार्य
आज भी विध्यमान हैं
जो अपने निहित स्वार्थों के लिए
रच रहे हैं आज भी चक्रव्यूह
ओर आम जनता
आज के कुरुक्षेत्र मैं
इस व्यूह मैं फस कर
दम तो तोड़ देती हैं
पर निकल नही पाती
व्यूह के सातों महारथी
हर बार ओर भी
बलवान होते रहे हैं
ओर आज के अभिमन्न्यु
नितांत असहाय
हे कृष्ण
उठाना पड़ेगा
तुम्हे ही
"चक्र" अब