Friday, December 17, 2010

गुज़ारिश.. ......


एक ग़ज़ल कहने की कोशिश हैं... बेहर / मीटर की बंदिशो से इतर रखने की गुज़ारिश के साथ

सख़्त अंधेरा हैं ओर रात बहुत बांकी हैं
अपनी आँखो के चिरागो को जलाए रखना

कही एसा ना हो की ख्वाब पिघल जाए कहीं
अपने हाथो मेरी नींदों को सुलाए रखना

ये फलक पर जो सितारे हैं कही देख ना ले
मेरी आँखो मैं तुम खुद को छुपाए रखना

मैं बियाबा हूँ मेरे हमराह गुजर कोई नही
इस तरफ आना कभी मुझको बसाए रखना

बहुत आसां हैं मेरे दोस्त तेरी याद आना
सख़्त मुश्किल हैं मगर तुझको भुलाए रखना

उसकी संजीदा जफाओ का भरम रख ले हरीश
तेरी फ़ितरत ही नही उसको रुलाए रखना