Tuesday, December 14, 2010

२ अक्तूबर पर एक चिट्ठी


बापू के नाम

नही बापू..
तुम्हारा युग बीत चुका हैं अब
तुम अब सिर्फ़
श्रधांजलि समारोह आयोजित करने
ओर इन श्रधांजलि समारोहो की आड़ मैं
पैसा बटोरने
ओर खुद को राष्ट्रीयता से जुड़े रहने का
वहम पालने भर के लिए रह गये हो
तुम्हे दुख हुवा ना बापू....
मुझे भी हुवा, हाँ बापू...
जिनके लिए तुमने
अंग्रेज़ो से असहयोग किया
वे आज तुमसे ही असहयोग कर रहे हैं
तुम्हारा शुरू किया सविनय अविग्या आंदोलन
तुम्हारे ही खिलाफ अविग्यित हो रहा हैं
बापू तुम्हारे चरखे की जगह
अब बंदूक ने ले ली हैं
तुम्हारी घड़ी मैं अब समय
अच्छा नही रह गया हैं बापू
तुम्हारे चश्मे को वक्त की कालिख ने
धुँधला कर दिया हैं
नही बापू, तुम नही देख पाओगे इस धुध्ले चश्मे से
होते हुए अपनी अहिंसा का बलात्कार
बापू, तुम्हारे वो तीन बंदर
अकर्मण्यता का लबादा ओडे
अब कुछ भी नही देखते
कुछ भी नही सुनते
ओर तुम्हारे सपनो को धराशाई होते देख
कुछ भी नही बोलते हैं
बापू, तुमने तो अकेले भूख हड़ताल की थी
कई बार की थी
पर आज हर भारत वासी हड़ताल पर हैं
क्योंकि वह अनाज नही
सभ्यताए खाने का आदि हो गया हैं
तुम्हारा हर बच्चा बेरोज़गार हैं बापू
क्योंकि बंदूक चलाना
अब चरखा चलाने से आसान हैं
देख लो बापू, क्या छोड़ गये थे तुम
ऑर क्या हो गये हैं हम
तुम्हारा विश्वास ही ,अब हमे उबार पाएगा
हमे उबार लो बापू
हाँ बापू, तुम जल्दी आना बहुत जल्दी
क्योंकि गाँधी पर गोडसे का ग्रहण
बहुत गहरा हो गया हैं
बहुत गहरा

तुम्हारा हरीश