Tuesday, December 14, 2010

ओ मेरे मनमीत बता...


दोस्तों एक ऐसा शख़्श जो मेरे आसपास ही हैं ओर शायद आपके भी अपनी जीवन की सांध्यवेला मैं क्या महसूस करता हैं यदि जीवन भर खरा न उतर पाया हो मापदंडो पर वही मेरी रचना का किरदार भी हैं

ओ मेरे मनमीत बता....
क्या जीवन मैं तूने खोया
अब आम कहाँ से काटेगा
जब खुद बबूल तूने बोया

ये जन्म तुझे दिया माँ ने
तू स्वयं इसे नही लाया
हर एक खिलोना दिया तुझे
तूने जब जब भी धमकाया
तेरे बचपन के हसाने को
वो पिता आँख भर भर रोया
ओ मेरे मनमीत बता क्या जीवन मैं तूने खोया

तू यौवन का दंभ लिए
गलियों मैं यूंही विचरता था
पर बिना गुरु के जीवन क्या
ये कभी संवर सकता था
परदेश गया जब नौकरी को
परिवार रात भर ना सोया
ओ मेरे मनमीत बता क्या जीवन मैं तूने खोया

शादी करके घर के बर्तन तक
पत्नी के घर से लाया
बंगला गाड़ी ओर खाट बिछौने
सब उधार ही मँगवाया
पिछले ही बरस जब बाप मरा
तब एक खेत हिस्से आया
ओ मेरे मनमीत बता क्या जीवन मैं तूने खोया

बचपन से ले कर यौवन तक
यौवन से लेकर पच्छपन तक
बस लिया हमेशा गैरों से
मुस्कान से लेकर क्रंदन तक
कैसा ये शोक कैसा कॅलेश
जब सबने किया पराया
ओ मेरे मनमीत बता क्या जीवन मैं तूने खोया

अब ६० बरस की देह तेरी
आँखो से भी कम दिखता हैं
घर के उस अँधियारे कोने मैं
निस्तेज दिए सा जलता हैं
अब दोष किसे दे किससे लड़े
ये दर्द तेरा ही हैं ज़ाया

ओ मेरे मनमीत नही कुछ
जीवन मैं तूने खोया
अब बबूल ही काटेगा
जब खुद बबूल तूने बोया