Tuesday, December 14, 2010

बबूल सा कुछ.....



दोस्तों इन पंक्तियाँ का तानाबाना सुदूर सीमावर्ती क्षेत्र मैं तेनात मेरे कुछ मित्रों से हुई बातचीत के आधार पर बुना गया हैं की एक आतंकवाद ग्रस्त शहर का जीवन किस प्रकार परिवर्तित होता होगा........


उसका शहर
अब आतंकवाद ग्रस्त
घोषित हो चुका हैं
मैं
उसकी आँखों मैं
कुछ दहशत सी पाने लगा हूँ
हर वक़्त
एक बिना सिर वाले राक्षश की तरह
कोई उसे
अंधेरे मैं टटोलता रहता हैं
वह अब
रोशनी मैं लंबे होते
अपने साए को देख कर
छुपने लगा हैं
उसके अंदर
बबूल सा कुछ उग गया हैं

उसकी माँ
अब देर तक
उसके घर से बाहर रहने पर
झुझलाने लगी हैं
उसके पिता अब उसे
देर से लौटने पर
ज़्यादा ज़ोर से डाटने लगे हैं
उसकी माँ की पूजा के साथ साथ
उसके पिता की बातों मैं
कड़वाहट भी बढ़ने लगी हैं
उसकी शाम की टीयूशन
बंद कर दी गई हैं
वह
अपने अंदर उग आए बाबूलो को
अब महसूस करने लगा हैं
उसका शहर
अब आतंकवाद ग्रस्त घोषित हो चुका हैं

उसका शहर
अब सांझ होते ही
कंबल ओड लेता हैं
डरावनेपन की
रात मैं जब किसी
मोटरसाइकिल की चीख सुनाई देती हैं
तो उसे अपने दरवाजे पर
खून से तर हथेलियों की दस्तक
महसूस होने लगती हैं
उसके अंदर अब
बबूल की चुभन बढ़ने लगी हैं

वो रोज आने लगे हैं
उससे मिलने के लिए
व्यवस्था बदलने का गुरुमंत्र लिए हुए
उसे सुनाते हैं किस्से
गोली, बंदूक, पैसा, बेफिक्री,
ओर अययाशी के
कुरेदते हैं उसमे
अपनी क़ौम के लिए हिस्सेदारी
ओर बेकौम के लिए नफ़रत को
वह भी उकताने लगा हैं
रोज रोज की दहशत,
माँ की झुझलाहट,
ओर पिता की डाट से
व्यवस्था को
बदल देने का
छूत रोग उसमे भी
पूरी तरह लग गया हैं
अंततः
वो उनमे से एक हैं
उसके अंदर का बबूल
अब फल देने लगा हैं