Monday, December 27, 2010

नव वर्ष की पूर्व संध्या पर

हैं  कौन किसी के. साथ खड़ा
हा समय का ये अन्याय बड़ा
ये मित्र तो शोभित दिन के हैं
जब साँझ हुई ,तब जान पड़ा

कल तक जो साथ मैं थे मेरे
निशदिन थे ,, चार प्रहर  घेरे
पर अब विरक्त, वो मुझसे हैं
क्या  अजब समय के हैं फेरे

कितनों परथा  विश्वास किया
ओरों  का विष भी स्वयं पिया
जब चोट लगी तब भान हुआ
व्यर्थ ही सब कुछ दिया लिया

ये साथ तेरा भी  का क्या देंगे
सब दोष ही  तुझ पर धर देंगे
सेकेंगे आग.. लगा के स्वयम
और साँस न तब तक ये लेंगे

हे मित्र  ये जग  की रीत  नयी
जब रात गयी  सब बीत गयी
सब चेहरे हैं..... हलकान यहाँ
और चेहरों पे...... चहरे हैं कई

ये देश हैं... मक्खन बाजों  का
इन्के अभिशिप्त  रिवाजों का
ओकात तेरी क्या कुछ कहदे
सिक्का हैं धान्धले  बाजों  का 

तुम कौन विषय के साधक हो
तुम कौन..... देव आराधक हो
क्यों इतर तुम्हारा, दृष्टि कोण
क्यों भाव सृजन मैं बाधक हो

पर शक्ति नहीं ,अब लड़ पाऊँ
एकल प्रयास मैं....भिड़  पाऊँ
कोई तो  साथ  नहीं ..पग भर
अब क्षमता नहींकी अड़ जाऊं

फिर क्यों मैं तुम्हारी आस करूं
फिर क्यों तुमपे, विश्वास धरूं
तुम कौन सखा बचपन के मेरे
क्या पड़ी तुम्हे किस ठौर मरूं

अब  साल  की अंतिम बेला हैं
नववर्ष का अद्भुत...... मेला हैं
हो जश्न रहा चहु और.. मगर
मन चातक  निपट अकेला हैं

तो आओ चलो इतना कर लो
जो रूठे  हैं उनको उर  भर लो 
क्या रोष करे जब दिन कम हैं
सब राग द्वेष ,,हिय से हर लो