Tuesday, May 29, 2018

जब तुम होते हो साथ

सुनो
जब तुम
होते हो साथ
ये आकाश
क़दमों के नीचे लगता हैं
दूर तक पसरा हो जैसे
सुरमई नीलिमा लिए
उन्मुक्त सागर
आतुर हो जैसे
छूने को
तलवों को मेरे

संभावनाओं का विस्तार
अनंत को
पा ही लेता हैं
समय का बंधन
न किसी पल की
व्यस्तता
एकाकार हो जैसे
इस श्रृष्टि से
और उस के
प्रतिबंधों से
आजाद होने को मेरे

तुम्हारा यूं होना
ऐसे ही सुखद हैं
जैसे बारिश के बाद
की सुनहरी धूप
जैसे सुबह की
मखमली ओस
जैसे दूज की
चांदनी की चंचल फुहार
तुम्हारी खुशबू से
ओत प्रोत
ये कमसिन हवाएं
छूनेको आतुर
हो जैसे
रक्तिम गालों को मेरे

सुनो
रहोगे न ऐसे ही
साथ मेरे '
चाहे आकाश पैरों तले हो
या की विसंगतियों
सा सर पर
सपनीला सागर हो
या की तपती रेत सा
मरुस्थल
मुझे और
कुछ नहीं चाहिए
तुम्हारे पास होने का
एहसास ही बहुत हैं
साँस लेने के लिए
ताजिंदगी ...!!!!

हरीश भट्ट