Tuesday, May 29, 2018

चट्टान का वो छोर

सुनो
याद हैं तुम्हें
उस चट्टान का
वो स्वप्निल सा छोर
न जाने कितने पल
साथ गुजरे थे हमने
याद हैं तुम्हें

तुम हमेशा
एक हाथ के फासले पे
बैठते थे
वो पहली बार
जब हम बैठे थे
उस दिन
सामने देखते हुए
क्या कुछ नहीं कहा था
तुमने न
मैंने तब, बस
कनखियों से देखा था
तुम्हें इतने करीब
तुमने तो
देखा भी नहीं

याद हैं
तुमने उकेर दिया था
मेरा नाम
उस किनारे पर
कितनी शिद्दत से
तुम्हारी बनाई पेंटिंग हो
या पहली कविता
यही तो सुनाई थी
तुमने मुझे
और में सोचती थी
की कब
ढाल लिया तुमने
कविता में
और स्वयं में
मुझे

सुनो
क्या कहते थे तुम
लवर्स पॉइंट न
हसीं आती हैं आज भी
जब तुम कहते थे
पाकीजा का वो डाइलोग
"ये पैर
जमीन पे मत रखना
मैले हो जायेंगे"
सच में
प्रेम था न तुम्हें
बेइंतेहा मुझसे
और उस जगह से भी
कितना तो शरमाते थे तुम
मुझसे भी जियादा
सब कुछ तो
कहते थे तुम
काश की कहा होता
तुमने
वह
जो मैं
हमेशा सुनना चाहती थी
हमेशा
पर...

आज में वहीँ हूँ
उसी जगह
उसी छोर पे
जहाँ बैठते थे
तुम और में
वो एक हाथ का फासला
अब
सदियों का हो चला हैं
अंतहीन सा

तुम कभी
लौटे होंगे शायद
कभी तो आये होंगे
और बैठे होंगे
इसी जगह पर
जहाँ बैठते थे कभी
हम अपने
सपनों के पंख फैलाये
आकाश छूने की
लालसा में
मेरा नाम
अब मिट सा गया हैं
तुम्हारी आस की तरह
वक्त की धुंध
गहरा गई हैं
उस पर
इन्तजार हैं मगर
उस छोर को
लौटने का तुम्हारा
तुम आओगे न
किसी दिन
बोलो ....!!!

हरीश भट्ट

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