Tuesday, May 29, 2018

लघु कथा

लधु कथा
विषय -अनकहा सा कुछ

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"माँ में ऑफिस को निकल रही हूँ बाय....
सरिता ने बैग में जरूरी फाइल्स रक्खी और कंधे से टांगते हुए रसोई में खड़ी माँ से कहती हुए ओफ्फिस के लिए निकल पड़ी
सरिता...अपनी नॉकरी के लिए बहुत स्ट्रिक्ट थी पिता के जाने के बाद उसकी ही नॉकरी से घर चल रहा था वरना माँ की बीमारी घरखर्च बहन की पढ़ाई सब कैसे होता इन सब में कब उसकी शादी की उम्र निकल गई उसे पता ही न चला
"रुक तो सरु नाश्ता तो करती जा ले लगा दिया हैं टेबल पर..माँ ने पीछे से आवाज लगते हुए कहा
नही माँ देर हो जाएगी बस एक घूंट दूध दे दो एक ब्रेड का पीस उठाते हुए कहा था सरिता ने
"बात तो सुन आज शाम पांडे जी का परिवार आ रहा हैं घर पर तुझे देखने मैँ सब तैयारी करके रखूंगी बस तू 6 बजे तक आ जाना माँ ने हुलसते हुए कहा"
"माँ कितनी बार तो कहा हैं ये देखने दिखाने का प्रोग्राम मत बनाया करो मेरे पीछे मुझे अभी शादी नही करनी हैं"
सरिता ने मुह बनाते हुए कहा
"देख सरु अभी अभी नही के चक्कर में कई अच्छे रिश्ते हाथ से निकल गए भादों से तुझे 28वां लग गया हैं अब और कितना रुकेगी तेरे पीछे तरु भी बैठी हैं अभी तक"
""माँ यार तुम अब शुरू मत हो जाना अभी दिसंबर तक तो नही दिसंबर में प्रोमोशन डिउ हैं और मुझे यकीन हैं हल्द्वानी ब्रांच ऑफिस शुरू होते ही मुझे ही ब्रांच मैनेजर बना कर भेजा जाएगा प्लीज उन्हें मना कर देना आज तो नही हो पायेगा आज प्रेजेंटेशन भी हैं ""
""सरु सुन तो देख मेरा कोई भरोसा नही कब ऊपर का बुलावा आया जाए अपने सामने तुम दोनों बहनों का संसार बसता देख लू बस ...मान ले बेटा"
मां वैसे भी मेरी शादी की इच्छा नही जब उम्र थी तब जिम्मेदारी का बोझ था अब मन ही नही करता सरिता ने माँ का कंधा पकड़ते हुए कहा छोड़ ये रोज रोज की बात"
"सरु ऐसा मतबोल ऐसा भी नही की तरु की कर दें ब्राह्मण परिवार की बड़ी लड़की बिनब्याही राह जाए तो कैसे छोटी की हो"
"रहने दो माँ ईसे किसी की फिक्र नही ईसे तो बस अपनी नॉकरी प्यारी हैं ये न खुद करेगी न किसी की होने देगी" अंदर से तरु झुंझलाते हुए बोली थी
झक्क सा पढ़ गया था सरिता का चेहरा.. बहन का उलाहना सीधे दिल पर लगा
"ठीक हैं तरु में तैयार हूं बस इतना बता दो मेरे जाने के बाद माँ की दवाई घर का किराया तेरे खर्चे कहाँ से आएंगे ... मैने भी तो तुझसे कहा था मेरे ऑफिस में स्टेनो की नॉकरी हैं कर ले पर तुझे तब एमबीए करना था आज तेरी नॉकरी होती तो कर लेती मैं शादी" और बहन में तेरी शादी में रुकावट बनू ऐसा तो सोच भी नही सकती मैं"
"माँ किस लड़की का सपना नही होता कि वो शादी कर के अपना संसार बसाए पर माँ आपने ही कहा था न बाबू जी के जाने के बाद कि सरु अब तू ही हैं बाबू की जगह
बोलो माँ मेरे लिए शादी जरूरी हैं या जीना
भारी होती आवाज और आंखों में तैरते पानी को छुपाती हुए सरिता बस स्टैंड की तरफ निकल चुकी थी
तरु माँ की भर आईं आंखें देख रही थी कितना कुछ तो कह दिया था फिर भी कुछ तो अनकहा रह गया था सरु कि बातों में
हरीश भट्ट