Thursday, July 6, 2017

वट सावित्री व्रत

वट सावित्री 

सुनो  
ये जो सितारों जड़े  
आसमान को 
झिलमिल साडी बना 
ममत्व का 
प्रदीप्त दुप्पट्टा खींच  
कुमकुम की  
सिन्दूरी  आभा 
सजाई   हैं तुमने 
उन्नत ललाट पर 
सदा सुहागन सा ये 
मांग टीका   
अधरों तक बलखाती 
दूज का चाद सी 
तुम्हारी ये नथ
कर्ण फलकों को छूते 
कुंडल 
देव सुता सी तुम  
अवर्णनीय सी 
लगती हो  
मैं 
ये तो नहीं जनता 
की वजह  
निर्जल उपवास 
हैं या तुम्हारा अडिग 
 विश्वास 
ये भी नहीं की 
एक जन्म का हैं ये 
या जन्म जन्मान्तर का साथ 
पर वो चौथ  का चाँद 
आज फीका जरूर हैं 
इस पूनम के चाँद के आगे 
तुम्हारा विश्वास बहुत बड़ा हैं 
किसी भी उपवास 
या नियमबद्धता से 
कहने को तो 
उपवास 
मैंने भी तो रक्खा हैं