Tuesday, July 4, 2017

चिर प्रतीक्षित यामिनी थी

चिर प्रतीक्षित यामिनी थी !
रात्रि का अंतिम  प्रहर था ​!!​
शून्यता चहुँ ओर, थी और !
नींद में बेसुध ....नगर था ​​!!​

कामिनी इक ..जागती थी !
शून्य में .....नजरें गड़ाये !!
कुछ प्रतीक्षा रत ..हो जैसे !
कुहनियों पर, सर टिकाये !!

स्वप्न के आसार ले कर नींद ...आँखों में पली थी !​
वेदना अभी पूर्ण ही थी ​...​रात आधी हो चली थी ​!!​

सनसनन चलता पवन था ​!​
रागिनी सी ​...​बह रही थी ​!!​
सरसराती ......तरु लताएँ ​!​
हाँ निशा कुछ कह रही थी !!

एक जोड़ा ​.....​पक्षियों का ​!!
कामातुर हो ...सुन रहा था !
मुक्त हो ​..​..भय भंगिमा से !
स्वप्न अपने ....बुन रहा था !!

​तैरते कुछ प्रश्न थे ​..​जब बूँद आँखों से ढली थी !
वेदना अभी पूर्ण ही थी ​...​रात आधी हो चली थी !!

​पूर्ण यौवन ​....​चन्द्रमा का !
चांदनी आसक्त जिस पर !!
जगमगाते ....ज्यों ​सितारे !
खिलखिलाने को थे तत्पर !!

रात्रि का माधुर्य ....अविरल !
सहन में .....पसरा हुआ था !!
भोर बस  ​....​कुछ दूर ही थी ​!​
क्षितिज अब गहरा हुआ था ​!!​

मन में तो संकोच था पर दीपिका सी जली थी !
वेदना अभी पूर्ण ही थी ​...​रात आधी हो चली थी ​!!​

क्या कहूं क्या चित्र था वह !
अश्रुओं से ....युक्त था वह !!
ह्रदय से विचलित हुआ सा !
अनमना सा ..मित्र था वह !!

अब नहीं ...आयेंगे प्रियतम !
हा! ये क्या कातिल घड़ी हैं !!
पर मिलन की आस लेकर !
वो वहीँ ...........
............अब भी खड़ी हैं !!

प्रीत की संदिग्धता में ,....प्रेयसी कुछ यूं छली थी!​
वेदना अभी पूर्ण ही थी ​...रात आधी हो चली थी !!

हरीश भट्ट