Tuesday, July 4, 2017

लघुकथा

लघुकथा: सप्तपदी का वचन (एक मित्र का प्रश्न)

महेश बेड पे अधलेटा लेपटाप खोले ऑफिस का काम कर रहा था । दीपिका पास ही मोबाइल पे शायद अपना फेसबुक प्रोफाइल देख रही थी की  तभी महेश ने कहा "दीपू यार  जरा मोबाइल देना मेरा"
दीपिका ने लेटे लेटे ही कहा "कहाँ हैं? फिर शायद डाइनिंग टेबल पर ही छोड़ आये होंगे आप"
"अपना ही दे दो तब तक मुझे बस कैलक्यूलेटर चाहिए"
"अरे दो मिनट एक कमेंट तो देख लूं देखो कितनी अच्छी प्रतिक्रियाएं आयी हैं" दीपिका के चेहरे पे खुशी झलक रही थी
"बाद में देख लेना तुम अपना.. सारा दिन तो नोटिफिकेशन आते ही रहते हैं तुम्हारे और ये चापलूसी को प्रतिक्रिया कहते हैं क्या? बेकार पूरा दिन यही काम हैं तुम्हारा ""
" तो घर का काम तुम करते हो न.. देखने का टाइम भी नही मिलता मुझे तुम्हारे सामने अभी तो खोला तुम भी तो...""
दीपिका ने अनमने ही अपना मोबाइल देते हुए कहा
"अच्छा" बात काटते हुए बोला महेश " कौन से इम्पोर्टेन्ट मेल्स हैं.. होंगे व्हाट्सअप के तुम्हारे बेकार दोस्तों  के मैसेज क्या क्या भेजते हैं  तुम्हें डबल मीनिंग जोक्स मोहब्बत की शायरियां.. क्या अच्छा लगता हैं अब तुम्हें इस उम्र में"" किरकिराते हुए शब्दों से गले तक भर गई थी दीपिका
अभी महेश ने मोबाइल पकड़ा ही  था कि मेसेंजर की बीप सुनाई दी नोटिफिकेशन में कोई शुभम का मेसेज था
"हाय !दीपिका ..😊"
देखते ही फट पड़ा था महेश "ये तुम्हारे यार लोग भी न  वक्त देखते हैं न...." तकरीबन पटकते हुए फेंका था फोन महेश ने
"यार.लोग" ..गाली सा लगा था दीपिका को  वो शब्द कान में जैसे शीशा उड़ेल दिया हो अचानक उसे याद आया केलकुलेटर तो लैपी  में भी होता ही हैं
उसे सप्तपदी का वो वचन याद आ रहा था "मैं वचन देता हूँ मैं तुम्हारा विश्वास कभी भी नही...... "विश्वास ?""तो क्या शादी के 14 साल बाद भी उसे ही खुद को साबित करना होगा??
महेश अपना मोबाइल लेने उठा था किसी के मेसेंजर काल की आवाज आ रही थी उसके मोबाइल पर 
दीपिका वैसे ही लेटी रह गई थी.. बाहर सन्नाटा बढ़ रहा था और अंदर उसके सीने का तूफान भी...
रात भर गला खुश्क और  तकिये का बायां कोना तर होता रहा.....
हरीश भट्ट