Monday, June 27, 2016

बारिशें

बारिशें
यूं ही तो
पसंद नहीं हैं मुझे
टिपटिपाती हुई
दनदनाती हुई सी भी
निर्झर ,झरती हुई सी
कभी रुक रुक के
कभी मूसलाधार
ये बारिशें !
अनायास ही
आ के लिपट जाती हैं
छन्न से
चेहरे पे मेरे
कपकपाती हुई सी ये बूंदे
अपरिचित सी, बिन बुलाई सी
अल्हड़, बे रोक टोक भी
बड़ी बेशर्म हैं
ये बारिशें !
सोचता हूँ
की यूं भी
तो होता होगा
इक सकून , अपनापन भी
यूं ही किसी पे बरस जाने में
खुद मैं समाहीत कर लेने में
अपनत्व भी
स्नेह की पराकाष्ठ भी
बिना शिष्टाचार और दिखावे के,
सुख, जो केवल दैहिक न हो
आत्मिक भी
कितनी निश्छल हैं
ये बारिशें !
फिलहाल
ये लगातार होती बारिश
और उसमें भीगते हुए मैं
और मेरा आस पास
मिटटी की सौधी खुशबू के साथ
भीगते हुए फूल पत्तों के साथ
अंतस तक सराबोर कर
ये भिगो रही हैं मुझे
या खुद
भीग जाना चाहता हूँ मैं
तय नहीं हो पा रहा !!
प्रियतमा सी हैं
ये बारिशें !
जाने कब बरस जातीं हैं
जाने कब रुके
न आये वादा कर के भी
मनमानी हैं उसकी
रिमझिम सी कभी
कभी बूँद भी नहीं
निष्ठुर सी हैं
ये बारिशें !
लो..!!
फिर शुरू हो गई हैं
झिलमिल-झिलमिल सी
ये बारिशें !!