Monday, June 27, 2016

याद तो होगा तुम्हें भी !!

सुनो
तुमसे कह रहा  हूँ  !!
न जाने क्यों
लौट आती हैं
बार बार ज़हन में,
किसी चलचित्र की तरह
तैरने लगती हैं आँखों में,
बचपन की अठखेलियाँ,
छुटपन के दोस्त/सहेलियाँ  ,
अल्हड़ सा यौवन ,
अनसुलझी पहेलियाँ !
याद तो होगा तुम्हें भी !!
वो जोर जोर से पढाई,
खेल खेल मैं लड़ाई ,
शाम तक पकड़म- पकड़ाई ,
गुस्सेल सी छुटकी,
नटखट सा भाई ,
होली का हरियल अबीर
सपाट सा गंगा का तीर,
मुफलिसी में
पर्वत सी पीर
मंदिर का केसरी चीर.
और मां के हाथों के
गुलगुले, पूए, और खीर ,
याद तो होगा तुम्हें भी
न जाने क्यों !
कुछ भी तो बिसरा नहीं हैं ,
छूट गया हैं बस,
आपाधापी की कोशिश में
काम काजी तपिश में,
बच्चों की परवरिश में ,
जीने मरने की हविश में,
और जीवनसाथी से
निभा पाने की कशिश में !
न जाने क्यो,
लौट जाना चाहता  हूँ,
उन दिनों में
बार बार
चलो तुम भी
ढूंढेंगे फिर से
बचपन,
उन्ही अमराइयों में
नीम की निम्बोलियों में
बेर के झुरमुट में
रास्तों की सरपट में 
याद तो होगा तुम्हे !
याद तो होगा तुम्हें भी !!