Tuesday, February 14, 2012

प्रणय दिवस पर


सलीके से मुझे वो आज भी, पहचान लेती है !
मैं जब घर थक के आता हूँ हथेली थाम लेती है !!

न पूछा आज तक मैंने, न उसने ही कहा कुछ !
जुबां खामोश रहती है,, निगाहें जान लेती है !!

कभी जब ख़फा होती, सताने के लिए मुझको !
न रह पाती ज़ुदा मुझसे, यूंही बस मान लेती है !!

में आगे जा नहीं पाता, यहीं तक मेरी 'सीमा' हैं !
वो नजरों में रखती हैं,, जतन से काम लेती है !!

वो उसके गेसुओं में रात,, गहराती हैं जब भी !
मेरी हर आवारगी भी तो, वहीँ आराम लेती है !!

कोई जब पूछता हैं जिंदगी भर का सिला क्या हैं !
मैं उसका नाम लेता हूँ,,, वो मेरा नाम लेती है !!

यही बस जिक्र है उसका, यही पहचान है उसकी !
मेरी नज्में उसी का नाम, सुब्ह-ओ-शाम लेती है !!

हरीश भट्ट, हरिद्वार