Thursday, February 9, 2012

मुझे तुमसे तो मोहब्बत नहीं थी लेकिन...


मैं सोचता हूँ कुछ ऐसा यकीं नहीं होता
मेरी तुझको तो जरूरत नहीं थी लेकिन
तमाम उम्र मैं तेरी राह यूंही तकता रहा
मुझे तुमसे तो मोहब्बत नहीं थी लेकिन

तेरी हर बात मेरे जहन मैं लौट आती हैं
तेरे अंदाज तेरा जिक्र जब होता हैं कहीं
मेरे ख्वाबों के गुलिस्तां में बहार आती हैं
सुब्ह होती हैं तेरी दीद की हसरत लेकर
शाम बेसाख्ता ही छत पे गुजर जाती हैं

मुझे तुमसे तो मोहब्बत नहीं थी लेकिन ...

जाने क्यों मेरी नीदों से, बगावत सी रही
जाने क्यों मेरी सांसों से अदावत सी रही
खिड़कियाँ धूप लिए आती थी तेरी खुशबू
तन्हा गोशों में तेरे आने की आहट सी रही

रास्ते तल्ख़ ख़ामोशी का बार उठाये हुए
लौट आते हैं तेरे दर से.. सर झुकाए हुए
न कोई आहट न शिकन न सदा ही कोई
राह तकता हूँ ज़माने से नजर चुराए हुए

मुझे तुमसे तो मोहब्बत नहीं थी लेकिन...

फिर भी हसरत की तुम्ही से चुरा लूं तुमको 
पास बैठा के तुम्हे पहलूँ में अकेले में कभी
कोई देखे न कहीं पलकों में छुपा लूं तुमको
यकीं था  की तुम आओगी हर सदा पे मेरी
आजमाने के बहाने से ही बुला लूं तुमको 

मुझे तुमसे तो मोहब्बत नहीं थी लेकिन...

अब भी मेरे राजदां  हैं जो तुझसे बाबस्ता
अब भी कुछ दोस्त मेरे तेरा पता पूछते हैं
जब भी आता हैं तेरा नाम जेर-ए-लब मेरे
बाद मुलाकात क्या हुआ ये बता, पूछते हैं

ये तीरगी ये तलातुम जो मुझको घेरे हैं
जर्द आँखों मैं जो तनहाइयों के... घेरे हैं
जो भूलती भी नहीं, याद भी नहीं आती
कहानियाँ  जो कभी बाज़ भी नहीं आती
कहीं ऐसा तो नहीं आखों से बयां होता हो
दिल में कुछ हो, कुछ और अयाँ होता हो

मुझे तुमसे तो मोहब्बत !!
 नहीं थी  ??

लेकिन........