Sunday, January 2, 2011

नव वर्ष मंगल मय हो..!!!!???

आखिर क्यों 
इतने खुश हो..!!??
किस बात की शुभकामनाए दोस्त..???
क्या बीता वर्ष..
कभी नया न था..??
तब भी तो खुश हुए थे तुम..!!
तब भी तो शुभकामनाए दी थी तुमने..!!
फिर.......
फिर क्या दे गया  ये बीता वर्ष तुम्हे..?
क्या तुम पोछ सके..
अपने आस्तीन से
बेगुनाहों का लहू...?  
क्या मिटा सके.. 
मानवता पर लगे दागों को..??
क्या दिला सके हर बेरोजगार को रोजी.. 
और हर भूखे को रोटी ..??
तो फिर क्यों  ये शब्दजाल फिर से..?
क्या तुम भूल गए उस 
धर्मान्धता की आंधी को..
पीढ़ियों तक जिसका विष 
तुम्हारे खून मैं रहेगा..
क्या तुम भूल गए उस प्राकृतिक उत्पात को 
जिसकी हलचल 
आज भी उन वीरानों मैं 
चीत्कार करते चीड के पेड़ों  
के रक्तिम आंसुओं मैं हैं..?
हाँ......!!
शायद... भूल गए तुम..
इसलिए न...
कि उन आंसूओ  मैं
तुम्हारे  आंसू न थे 
उस बहते खून मैं तुम्हारा खून न था.!
इसलिए शायद ...तुम हर दौर को
पी लेते हो चुपचाप
पवित्र गंगा जल समझ कर
और हर बार जब
ये नया वर्ष बांहें फैलाये आता हैं
तो तुम उसे
गले लगाने की चेष्टा करते हो
तुम भूल जाते हो 
तुम्हारे आस्तीन पे लगा हुआ रक्त 
तुम्हारी पीठ से लगा हुआ
दोस्ती के फूलों मैं लिपटा चाकू
और सफ़ेद कफ़न की चाहरदीवारी मैं बंद
तुम्हारे अख़बार की कतरनों मैं
छपे सामूहिक नरसंहार को..!!!
आखिर क्यों.....????
क्योंकि तुमने बुरा देखना,बुरा सुनना 
बंद कर दिया हैं.!
या तुम डर जाते हो यथार्थता से
सिर्फ पाना चाहते हो
अल्लाउद्दीन का चिराग
जिससे तुम अपना हर पल
मंगलमय कर सको
नहीं दोस्त नहीं...!!
तुम जिन सिसकते जख्मों के 
रक्तपिपासू कीटाणुओं को
भूल जाना चाहते हों
वो तो हर युग हर दौर
मैं मिलेंगे
उन से अलग रह कर
तटस्थता का छूत रोग मत फैलाओ
नोच लो इन जख्मों से
इन विषाक्त कीटाणुओं  को
सिर्फ नववर्ष के मंगलमय होने की
कामना  करने से ही
हर वर्ष मंगलमय होता 
तो बीते वर्षों मैं 
मंगल पर कभी शनि नहीं चढ़ता 
लो... चलो ..मैं भी कहता हूं
नव वर्ष मंगल मय हो..!!!!???