Tuesday, March 20, 2012

आइनों का सच

 
खुद तो रोये थे मुझे भी, तो रुलाया तुमने ,
मुझको कल रात भी बेवक्त जगाया तुमने !

कोरे कागज पे न मजमून न पता था मेरा ,
कितनी शिद्दत से ये रिश्ता निभाया तुमने !

आइनों का सच तो यूँभी मुझे मंजूर न था  ,
टूट कर बिखरा हैं, जब भी दिखाया तुमने !

शाम रुक सी गई, मंजर वो  ठहर सा गया,

ऐसे मुस्का के जो पलकों को गिराया तुमने!


हाँ ये सच हैं कि मैं भी था तेरे तलबगारों मैं ,

जब्त करता ही रहा परदा ना  हटाया तुमने !


बेवफा था मैं खुदगर्ज भी  था नज़रों मैं तेरी ,

सिर्फ मुझसे न कहा दुनियां को बताया तुमने!!