Thursday, September 1, 2016

शौक-ए-आशनाई

मुझे तो तुमसे चलो,, शौक-ए-आशनाई हैं !
तुम्हें भी बाज़ न आने की, बुरी आदत क्यों !?
तेरी गली से गुजरता हूँ ....एहतियातन मैं !
वक्त बेवक्त तेरी भी तो, छत पे आमद क्यों !?
तुम्हारे नाम लिखे थे, जो ख़त मोहब्बत में !
वो मांगते हैं मुझसे आज, अपनी कीमत क्यों !?
चराग़ बुझने लगे .........महफ़िलें तमाम हुई !
वक्त-ऐ-रुखसत, तेरे चहरे पे अब ये वहशत क्यों !?
तुम्हें तो मेरी मोहब्बत पे,... एतबार ना था !
किसी को चाहूँ अगर मैं, तो फिर शिकायत क्यों !?
............हरीश.........