Saturday, December 20, 2014

साल-दर-साल



तुम
इस बार भी नहीं रुके,
नहीं ही रुके,
इस बार भी !!
या कहूँ ,
नहीं  रोक पाया,
मैं तुम्हे,
इस बार भी,
हर बार की तरह !!

पीछे
जनवरी-फ़रवरी
तुम्हारे
आने आने  में  रह गयी,
आ धमकते हो
बुलाने तक तो ,,,,

मार्च-अप्रेल ..
मैं तुम्हे रिझाने ,मनाने
और  खुद को
समझाने  में  रह गया !!

मई-जून.....
हाँ अब शायद ……
तुम्हारे प्यार की गर्माहट
महसूस होने  लगी हैं अब,
और तो और
जुलाई-अगस्त आते आते
सराबोर करने लगे हो तुम,
अतरंग फुहारों से !

पर यह क्या ??
सितम्बर-अक्टूबर ……
पीछा छुडाने लगा हैं
तुमसे,
उतरने लगे हो तुम,,
दिवार पर  से,
धूप की तरह !!
नवंबर-दिसम्बर....
कोशिश में लगा हूँ
फिर  से
रोक पाने की तुम्हे ?

मुझे पता हैं
फिर नहीं रुकोगे तुम,,
जाना, नियति हैं तुम्हारी
कौन रोक पाया हैं तुम्हें

कोशिश !! फिर भी
जारी हैं,
मेरी भी, ओरों की तरह  ,,,
साल-दर-साल
लम्हें-दर-लम्हें !!!!!
काश !!
की तुम,
रूक पाते ????

तुम
फिर आओगे
जनवरी-फ़रवरी में
पता हैं मुझे !!
पर हर बार,
तुम !!!
कुछ बड़ से जाते हो ,,
और
मुझ में,,
कुछ घट सा जाता हैं !!!??