Monday, September 9, 2013

धुधलका.......






 
पलकों का
उनींदापन
अब
थम जायेगा
शायद,

मिल ही जाएगा  
नब्ज दर नब्ज  की
हरारतों को
विराम भी !

छट ही जायेगा
वक़्त
बेवक्त की 
उम्मीदों  का धुधलका ,

छट  भी जायेगा
 सीने में अटका
वर्षों से पसरा
अनमना सा गुबार भी !

कम हो ही जाएगी
हथेलियों की 
रक्तिम तपिश ,
छू पाने की हसरत भी

विस्मृत नहीं कर पायेगी
अब 
तारों के टूटने की झलक !
देर तलक
टकटकी के लिए

डूब ही जायेगा
झूठी तसल्लियाँ
देने मैं माहिर
सूरज ,
हमेशा के लिए
देवदार  के 
पेड़ों के पीछे !

अब न भरमायेगा
क्षितिज का
वो सम्मोहन ,
मिलने न मिलने का
........
आज
मैंने तुम्हारा
आंखरी
ख़त  भी
जला जो दिया हैं
........
अब उस
दराज में
खाली लिफाफे सा
ठहरा हुआ हूँ
बिना
पता लिखा हुआ
मैं........
केवल मैं..!!

Tuesday, April 9, 2013

"बलात्कार"


आजकल
शब्दकोष मैं ढूंढता हूँ
एक शब्द
"बलात्कार"....
और सिहिर उठता हूँ
इसके विकृत अर्थांशों पर

दिन भर यह शब्द
कान से चिपका हो जैसे
हथोड़े सा
मष्तिष्क पटल पर
बजता हुआ सा
बार बार--
तस्कीद करता हुआ सा
की नपुंसकता
मानसिक भी हो सकती हैं
पर कैसी नीचता
स्वयं को उघेड़ लेने का 
कैसा अतिरेक
उन्मांद की ऐसी परिणिति
कुत्सित  ही नहीं
अक्षम्य भी हैं
शब्दकोष में  तो कभी
इतना घृणित
नहीं था कोई शब्द
मान मर्यादा
जाती वर्ग विशेष
उंच नीच
छुआ छूत
से सुसज्जित और परिभाषित
ये मेरा समाज
हैरान हूँ
की कैसे झटक देता हैं
ब्लात करते हुए ऐसी जघन्यता 
असहाय स्त्रीत्व
तब न उसे 
जातिगत दिखता  हैं
न किसी वर्ग विशेष से
आखिर
गर्व करने को 
क्या रक्खा हैं
ऐसे स्वछन्द पौरुष पर
धिक्कार के सिवा
मृत्यु
शायद कम हैं
उस तिरिस्कृत 
एहसास तक पहुचने के लिए
पर इससे अधिक पर 
मौन हैं 
न्याय का देवता भी  
उपेक्षित पर उद्वेलित 
सोचता हूँ  
इस दंड के लिए
कोई विधान 
किसी शब्दकोष मैं
नहीं ही
होगा शायद

हाँ ...
आँख के बदले आँख
और हाथ के बदले हाथ  के
रामबाण न्यायसूत्र
की कह दूं
तो
मानवाधिकार
के बलात्कार का
गैर जमानती आरोप
चस्पा होते देर न लगेगी


तेज़ाब



तुमने ....
हाँ तुमने
कुरूप किया हैं मुझे ....
तेज़ाब सा कुछ 
उढ़ेल दिया
कान्तियुक्त चेहरे पे मेरे
कई पठारीय परिदृश्य
उभर आये हैं अब
अनगिनत लकीरे
भयावहता की
अकल्पनीय टीस  और 
पीड़ा से  भरे हुए !!!

सुन नहीं पाती हूँ
माँ की चीख .....
कान के परदे तक 
पंहुचा होगा कुछ तरल
न जाने 
कौन से अस्पताल का पता
पूछ रहे हैं पड़ोसी
देख ही नहीं पा रही हूँ
अब कोई  भी बोर्ड
सांस लेने के रास्ते
या तो अवरुद्ध हैं 
या मिट चुके हैं

एसिड .....
ऐसा ही होता होगा शायद
कभी....
सुना भी न था
किसी ने..
बताया भी नहीं
की चेहरे को चीरती हुई
तरल की कुछ बूंदे
कितनी तीक्ष्ण होती जाती हैं
मेरा कसूर ...
कब बताओगे तुम
तुम ..!!
या तुम्हारा समाज ????

जिन्दा रहना ही क्या
काफी होता हैं...
रह के तो  देखो फिर
केवल कुछ
सुराखों के साथ
पथरीला सा चेहरा लिए

हाँ ....
तुमने ही तो उडेला हैं
ये तेज़ाब...
तुम्हारे मष्तिष्क की 
कड़वाहट ने सींचा हैं इसे
तुम्हारी विकृत सोच ने
खौलाया हैं इसे..
तुम गुनाहगार हो मेरे
याद रखना !!

किसी दिन
किसी सूनसान तिराहे पर
खड़ी  मिलूंगी मैं जरूर 
तुम्हारे इन्तजार मैं
बोतल में लिए हुए  
कुछ कतरे
तेज़ाब के
अगर जिन्दा रही तो ..........

फिर सोचती हूँ ..
ईश्वर  न करे
कहीं  
कल
तुम्हारे आंगन मैं
बेटी बन के पैदा हुई तो ..!!??
यही
छिद्रित सा
चेहरा लिए ...!!!???

Friday, March 29, 2013

मैं तो मुसाफिर हूँ ....





मैं तो मुसाफिर हूँ हमेशा लहरों में रहूँगा !
तुम सुमन सम साथ साहिल के चलोगी !!
मैं तो नीरव सा सघन.... वन वन रहूँगा !
तुम सुहासित उश्मिता के... संग चलोगी !!

इस सुलगती वसुधरा कि प्यास भी तुम !
इस धरा पर प्रणय का मधुमास भी तुम !!
तुम बरसती भाद्र कि..... हर आद्रता में  !
ज्येष्ठ कि मृदु धूप का आभास भी तुम !!
में तो चातक हूँ सघन.... घन घन रहूँगा !
तुम अहर्निश रश्मिता के.. संग चलोगी !!

तुम क्षितिज की, रक्तिमम लावण्यता में !
तुम शिशिर की, चंचलित हर व्यस्तता में !!
ओस की कोंपल पे झिलमिल   धूप जैसी !
श्वेत संदल सी... खनकती ज्योत्स्ना में  !!
मैं तो याचक हूँ नमित ...कण कण रहूँगा !
तुम सुभाषित अस्मिता  के..संग चलोगी !!

निशदिन शुभेच्छित हो नया संसार तुमको !
मुझसे निश्छल स्नेह का,..आभार तुमको !!
तुम न चाहो तो तुम्हें, याद आऊं मैं कैसे ?!
हैं स्मृतियों से मिटने का अधिकार तुमको !!
मैं तो त्यज्यित हूँ, भ्रमित क्षण क्षण रहूँगा !
तुम मधुरमित  शुश्मिता के, संग चलोगी !!

मैं तो मुसाफिर हूँ हमेशा लहरों मैं रहूँगा !
तुम सुमन सम साथ साहिल के चलोगी !!

Tuesday, September 25, 2012

स्वेटर


तुम,,
कैसे बुन लेती हो !!
कविता भी,,
स्वेटर कि तरह !!!
एकसार त्रुटिहीन..
गुनगुना सा...!!
शब्द ,,
एक दूसरे में गुथे हुए,,,
प्रीत के फंदों में सिमटे ,,,
अनगिनित रंगों ...
असीमित विस्तार ,,
में सजे हुए ..!!
ऊन का सा
मखमली एहसास..
कविता में भी ..!!??
कैसे पिरो लेती हो तुम..!!""
सृजन की यह आत्मीयता
स्संस्कार ही होगी तुममे
या कालांतर में विकसित
हुई हैं ये कला..!!
अपरिपक्व शब्दों से
मंथरित वाक्यांशों तक
यूंही तो गढ़ती थी तुम
ऊन के लच्छों को
व्यवस्थित गोलाइयों में 
बुनावट का ये क्रम
कैसी तल्लीनता का द्योतक हैं..!
सुध बुध विहीन हो जैसे..!!
कैसे पिरो लेती हो ..??
सुख -दुःख को
शब्दों की सिलाइयों में
सभी रंग तो हैं यहाँ
देखो तो ..
कभी मात्राओं  की तरह
फंदों का घट बढ़ जाना
कभी वैचारिक तारतम्य का
धागों की तरह टूट जाना
कभी किसी कोने में
अधबुना सा
अधलिखा सा छूट  जाना
कभी अखबार
या चाय की चुस्कियों के साथ
जब तुम पूछ लेती हो
शोख रंगों या पैटर्न
के बारे में
विन्यांश या साइज के बारे में
में उलझ सा जाता हूँ ..!!??
तुम नए स्वेटर की बात कर रही हो
या नई कविता की
लो..!!!!
कब पूरा कर लिया तुमने इसे..,,!!
पता ही नहीं चला  

गर्वित सी उश्मिता लिए
ओढ़ लेता हूँ मैं
स्वेटर हो 

या तुम्हारी पंक्तियाँ
ह्रदय से लगी हुई ..!!
और.. बढ़ जाती हैं
आँखों की चमक
जब मेरे नाम को उकेर लेती हो तुम
अक्षरों के धागों में
सोचता हूँ...
की तुम ...,,
"स्वेटर"

ज्यादा अच्छा बुनती हो...
या 

"कविता" ..?!?!

Friday, August 10, 2012

रक्षा सूत्र




उसने,
कितने ममत्व से 
मेरी कलाई पर
रक्षा के
दो रेशमी सूत्र बांधें !!
तिलक किया
मस्तक पर
कपकपाते हाथों से
आरती उतारी
स्वाभिमान से
कंधे को छू कर!
आजीवन रक्षा और मान का 
आशीशमय संकल्प
स्वतः ही
निकलता हैं मेरे स्वर से तब !

कैसी वचनबद्धता हैं
कैसा समर्पण,
गदगद हैं वो
संतुष्ट भी ,
आश्वशत  भी !!

 पर ??
फिर किसी चौराहे से
निकलते हुए,
होते देख
किसी महिला का अपमान,
निरुत्तर
क्योँ हो जाता हूँ मैं,
जड़  हो जैसे
क्यों याद नहीं रहता वो
रेशमी सूत्र का बंधन,
रोली तिलक और चन्दन,
ममत्व से अभिसिंचित
मुस्कान हसीं  क्रंदन
आशीष के वो पुष्प
और आरती का दिया
क्यों हो जाते हैं 
नेपथ्य में.! 

आखिर क्यों
कि वो मेरी सहोदरा न थी,
क्योंकि वो एक पृथक रूप हैं..
क्योंकि रक्तरंजित..
उस हाथ ने..
नहीं बाधा था,
वो बंधन,
या ये मेरा दृष्टि दोष हैं,,
क्यों नहीं देख पता..
उसमे..
में स्वयं का अभिमान,
नारीत्व का स्वाभिमान,

मेरी कलाई पर..
रेशमी सूत्र के वो धागे..
मेरा मुह चिढाते हैं..
उनकी चमक.
सह नहीं पाता  मैं, 
क्या अधिकार हैं मुझको..
धारण करने का फिर..
रेशमी सूत्र का  वो बंधन..

इससे तो ..
सूनी कलाई का अभिशाप..
सहना ही..
फलित होगा,
किसी दिन..
यदि हर सूत्र की..
लाज न बचा पाया तो  !!

Monday, July 23, 2012

रोटियां !

हर उम्र हर इक दौर को, ढोती हैं रोटियां !
ओ देश तेरे हाल को..., रोती हैं रोटियां !!

बचपन गया सूनी रही, अम्मा कि कढ़ाही  !
आई जो जवानी रही... रोटी कि लड़ाई !
रिश्तों ने भी बस खून कि हैं, प्यास बढाई!
हैं कौन वो जिसके नहीं, फूटी ये बिवाई !

कितने जतन से टीस भी, बोती हैं रोटियां!
हर उम्र हर इक दौर को, ढोती हैं रोटियां !!

कितनी ही सभ्यताएं , नस्लें भी खट गई !
रोटी कि भूख में कई...किश्तों में बट गई !
विस्तृत थी जो एश्वर्य में, सीमायें घट गई !
गंगा-ओ-रावी कि धरा, लाशों से पट गई !

मस्तक को अपने रक्त से, धोती हैं रोटियां !
हर उम्र हर इक दौर को, ढोती हैं रोटियां !!


उस माँ से पूछो जिसका, चूल्हा नहीं जला !
परदेश गया था वो जो, बेटा.. नहीं मिला !
रोटी कि कशमकश में, दिए सा जो जला !
जीवन कि रसोई ने उसे, चुपचाप ही छला !

बरसों  तवे पे खुदको ही, सेती हैं बेटियां !
हर उम्र हर इक दौर को, ढोती हैं रोटियां !!