Saturday, April 18, 2020

चॉकलेट्स

चॉकलेट्स ..

चॉकलेट्स
बहुत पसंद थी उसे 
मुझे भी 
मुझे क्यों ​?​
पता नही ...शायद
क्योंकि उसे पसंद थी 
हालांकि 
कभी खाई नही मैंने

मजा आता था 
उसे खाने में ​
और मुझे 
उसे खाते देखने में
बात शुरू करने का 
शायद 
तरीका ही ये हो गया था  
सुनो 
चाकलेट खाओगी 
....लाये हो 
......आज भी 
वो मासूमियत से 
खिल जाती थी
याद नहीं 
कभी मना  किया हो उसने 
​मुझे तो ​..कभी नहीं  
पिघले हुए 
कोको का स्वाद 
ऐसे भी सर चढ़ के 
बोलता होगा 
सोचा नही था 

कहा न 
चॉकलेट्स 
बहुत पसंद थी उसे 
इसीलिए शायद 
उसकी बातें भी 
चाकलेट जैसी ही थी 
मन में घुल सी जाती थी 
मिठास के साथ 
ऊपर से सख्त 
पर
प्रणय की उष्णता 
जिसे पिघला ही देती हैं 
और वो दहक उठती थी
लावे की तरह

जाने क्यों वो
सभी चाकलेटस के रैपर  
संभाल लेती थी 
अपने पर्स में
अजीब था न
रैपर्स से भला 
क्या लगाव होगा उसे 
उसने लिक्खा था 
हर एक रैपर पर 
उस दिन की तारीख
और उस दिन का नाम 
तोहफों की तरह 
पागलपन था शायद
या की मुहब्बत
तब मुझे लगता था 
कि वो एक चाकलेट हैं 
और मैं... उसका रैपर
तब
मेरे पास होती थी 
बहुत सी  चाकलेट​
मेरे कबर्ड में 
स्टडी टेबल की ड्रा में
जैकेट की जेब में  
कॉलेज के बैग की 
साइड वाली पॉकेट में 
स्कूटर की डिक्की में 
स्वप्नीले से रैपर वाली 
चॉकलेट्स
पता नहीं क्यों 

वो 
उन दिनों की बात थी 

चाकलेट खरीदे
जमाना हो गया अब 
ये इन दिनों की बात हैं 

हरीश भट्ट

मोगरे की खुशबू ....

ओपिडी में आज भीड़ कुछ जियादा ही थी 
अपनी बारी के इन्तजार में विजिटर बेंच पर बैठे बैठे मैंने सोचा और टाइम पास के लिए मोबाइल खोल कर मैसेज  देखने लगा 
"क्या में यहाँ बैठ सकती हूँ"  
"जी" मैंने उसे बिना देखे ही जरा सा सरक कर कहा
मोबाइल  से नजर तब भटकी जब भीनी सी मोगरे की ख़ुशबू के झोंके ने ध्यान अपनी तरफ खीचा...  मोटे तल्ले वाली चप्पल करीने से तराशे हुए पैर के नाखूनों पर चम्पई सा नेलपेंट पतली सी पाजेब मेचिंग बिछुओं के साथफिरोजी रंग के सूट पर छींट का दुपट्टा अमलताश की फलियों सी उँगलियों के पोर... और  भरी भरी कंपकपाती हथेलियाँ, हथेलियों में पकड़ा हुआ डा. मीनाक्षी अग्रवाल का परचा... तिरछी  निगाह से बस इतना ही देख पाया था तब..
लगा ....कहीं तो देखा हैं... पर कहाँ.. मन में कई चित्र चित्र से तैर गए  

सीने का दर्द कुछ हल्का होता महसूस हुआ, मेरा नंबर पुकारा जा रहा था इसलिए मैं  उठा और सीधा डाक्टर के केबिन में घुस गया सामान्य चेकअप के बाद पांच दिन की दवा और फिर दिखाने की एहतियात लिए बाहर निकला 
वापसी पर निगाह बेंच की तरफ डाली  पर शायद उसका  भी नंबर आ चुका था 
पूरे हफ्ते फिर ये बेजा ख्याल दबे क़दमों ज़हन में  आता रहा की जाने क्या हुआ होगा उसे 
शनिवार शाम को ही ऑफिस में नेहा  का फोन आ गया याद दिलाने के लिए की आज डाक्टर को दिखाते हुए आ जाना तबियत ठीक थी पर फिर भी कदम क्लिनिक तक पहुच ही गए हर तरफ वही ज़र्द बीमार चेहरे हाथों में परचा लिए पेथोलोजी और एक्सरे पकडे हुए ......नेहा ... बताना ही भूल गया मेरी धर्मपत्नी
खाली बेंच की तरफ नज़र दौड़ते हुए मैंने भी परचा जमा करवा कर खुद को एक सीट के सुपुर्द कर दिया 
अचानक याद आया की हर मरीज आज रिपीट हुआ होगा हर एक को पांच दिन के बाद दिखाना होता होगा तो क्या ....तभी एक पहचानी सी आवाज सुनाई  दी ..."एक्सकिउज  मी क्या यहाँ कोई बैठा हैं" ...जी नहीं... इतना ही कहा था मैंने और तभी  मोंगरे की भीनी खुशबू ने अपना तार्रुफ़ दे दिया था ...उस दिन फिरोजी था और आज सलेटी सा कलर का सूट.... बदरंग सा वार्डरोब रहा होगा शायद उसका 

उसके मोबाइल के वाल पेपर पे गहराती शाम का मंजर शायद उसके चेहरे पे भी उतर आया था ....हाँ इस बार देख पाया था मैं वो चेहरा तीसरे दिन के गुलाब के मानिंद कुम्हलाया सा चेहरा सुतवा नाक कोरे कोरे से होंठ.... ये बड़ी बड़ी सूनी सूनी सी ऑंखें छोटी पर सपाट बिंदी कानों में लापरवाह से झुमके करीने से संवरे बाल कानों के पास कुछ एक पक चुकी सुनहली सी बालियाँ  क्लचर में कसमसा के जकड़े हुए बाल  कुछ छूट गए थे  तो कानों के पास से निकल गालों को सहला से रहे थे ...कहीं तो देखा हैं....सोचा पूछ लूं क्या हुआ हैं पर उसकी ऑंखें फर्श की टाइल को कुरेदती हुई सी स्थिर थी बस  कोई मौका नहीं था सिलसिला होने का... कुछ तो रोक रहा था उसे
इसे आप दूसरी मुलाकात कह सकते हैं 
अचानक खांसी  का धसका उठा और वो बैचैन हो उठी मैंने अपने ऑफिस बैग  से पानी की बोतल उसकी तरफ बढ़ाते हुए कहा ....”पी लीजिये”...एक बारगी मना  किया था उसने पर शायद जरूरत थी तो दो घूँट उड़ेल लिए अब कुछ ठीक था शुक्रिया कह के बाटल वापस की थी उसने 
""आपके साथ कोई हैं नहीं"" सांसों को संयत होते देख पूछा था मैंने
इनकार में गर्दन  हिली और फिर एक ख़ामोशी सी छा  गई 
“क्या प्रोब्लम हैं आपको” ...बातों का सिलसिला बढ़ाते हुए पूछा था मैंने ...”अस्थमा ..” अपनी तरफ से कम से कम शब्दों में जवाब देने की कोशिश थी उसकी ...इससे पहले की मैं कुछ और कहता उसका नंबर आ चूका था और कुछ देर बाद मेरा भी 
क्लिनिक से निकलते हुए सोच रहा था की इतने मरीज थे वहां फिर उसके विषय में इतनी जिज्ञासा क्यों ... कहीं तो देखा हैं... पर कहाँ 
अगला हफ्ता भी धीरे से सरक गया पर ज़हन से मोगरे की खुशबू निकल ही नहीं पाई 
शनिवार को जल्दी आफिस  से निकल गया था कोई काम नहीं था न डॉक्टर का अपोइन्टमेंट 
बस एक जिज्ञासा हास्पिटल का पूरा  कारीडोर भरा था खाचा खच पर वो नहीं थी वहां मोगरे की महक भी नहीं सिर्फ दवाइयों की गंध थी हर जगह 
शायद अब डॉक्टर की जरूरत न हो चलो अच्छा ही हुआ सोचता हुआ में बाहर निकल ही रहा था की किशोर ...हाँ किशोर ही तो था ...”अरे किशोर पहचाना में अमित” ...अचकचा कर देखा था उसने पहचानने की जद्दोजहद में 
“अरे अमित कैसे हो यार इतने दिन बाद कहाँ हो आजकल” .....किशोर और में स्कूल में एक साथ थे कभी इंटर साथ  किया था हमने ...”हाँ में ठीक हूँ ,मैं तो हरिद्वार ही हूँ तबसे तुम बेंगलोर  थे न” 
 हाँ... किशोर ने कहा अभी पिछली कंपनी में रिजाइन किया हैं तो कुछ दिन के वेकेशन पर हूँ अगले महीने दुबई जा रहा हूँ एक नया जॉब देखा हैं और सुनाओ तुम यहाँ हॉस्पिटल में कैसे 
“बस यार ऐसे ही डाक्टर से मिलने आया था बीपी ठीक नहीं रहता तो कंसल्टेशन के लिए आ जाता हूँ तू बता तू यहाँ कैसे सब ठीक तो हैं” 
“बस ऐसे ही यार सब ठीक हैं अच्छा मिलता हूँ” ..किशोर जल्दबाजी में था 
“हाँ ओके घर आना मैं अब भी वही रहता हूँ याद हैं स्कूल के दिनों में कितना आते थे  तुम लोग” 
“अब तो सब बिखर गए ...ओके ये मेरा मोबाइल नंबर हैं मुझे मिस्काल मार देना में सेव कर लूँगा” ...“ओके बाय”
“अमित” ....पीछे से आवाज लगाईं थी किश्जोर ने “अरे तुझे मिनल याद हैं” ....”कौन मिनल” ....
“वो फिरोजी स्कार्फ वाली 10थ बी तेरा झगडा हुआ था जिससे  .....
“हाँ हाँ वो साइंस ले ली थी न जिसने...क्यों क्या हुआ” 
“उसी को देखने आया हूँ चार  दिन से एडमिट हैं यहाँ” 
“अरे क्या हुआ उसे” अचकचा कर पूछा था मैंने ...”लंग केंसर वो भी आखरी स्टेज पे हैं”  
“ओहो ..अरे कैसे” ....आँखें फ़ैल सी गई थी मेरी और आवाज कपकपाने  लगी थी ....”अच्छी लड़की थी यार ...पर वो यहीं रहती थी  क्या ...”
“नहीं उसकी  शादी तो  पालमपुर हुई थी पर उसके हज्बेंड  ने डिवोर्स दे दिया था तब से यही हैं कई साल से”...बताया किशोर ने 
“अच्छा  कमाल  हैं कभी मुलाकात नहीं हुई चल ठीक हैं तू  मिल मैं निकलता हूँ” ...सीने में कुछ भारीपन सा महसूस होने लगा था 
“तू नहीं मिलेगा “..किशोर ने कहा ...
“मैं ...मैं अब क्या मिलु उससे मैं तो उसे पहचानता भी नहीं ..और कुछ काम भी हैं” 
“झूठ ...झूठ  मत बोल यार मुझे पता हैं  तुम्हारे बारे में मीनल  ने मुझे बताया था बस मुझे ही बता पायी वो आज तक “..किशोर की आवाज में तेजी थी 
“क्या बताया ...ऐसा कुछ नहीं हैं..मैं तो मिला भी नहीं उससे...” सीने का भारीपन बढ़ने लगा था अब  
“बकवास मत कर यार ...तू बुजदिल हैं तेरी वजह से ...क्या कहूं कुछ कह भी नहीं सकता ....... वो मर रही हैं अमित एक बार बस आखरी बार तो मिल ले उससे .सकून से जी नहीं पायी कम से कम सकून से मर तो पाएगी ....मुझे तो लगा था तू उसे ही मिलने आया होगा ...”
“बकवास में कर रहा हूँ या तुम ...प्लीज़ ऐसा मत बोल यार ...” पास ही पड़ी  बेंच पर खुद को रख लिया था मैंने 
“झूठ तो उसने बोला मुझे... की अस्थमा हैं उसे वो अन्दर ही अन्दर घुट रही थी और मैं बुजदिल नहीं था ..कभी नहीं ....पूछ उससे ...एक वादे की जंजीर से जकड़ा  हुआ हैं उसने” "की जब भी मिलेंगे तो अजनबियों की तरह " “वरना क्या बेगानों  की तरह यहाँ हॉस्पिटल आता उसे बस एक नजर भर देखने के लिए ...” बड़ी मुश्किल से कह पाया था मैं
“था तू बुजदिल ...आई थी न वो तेरे पास जब उसकी शादी तय हुई थी कहा था न उसने एक अलग दुनिया बसाने  के लिए” ..किशोर की बातों में गुस्सा दिखने लगा था .
“हाँ कहा था पर.... कैसे ...अपने और उसके परिवारों की खुशियों को रोंद कर न ...और ...छोड़ यार चलता हूँ ...नहीं मिलना हैं मुझे” 
“प्लीज अमित तू नहीं मिलता आज यहाँ तो कोई बात न थी पर अब जब तू यहाँ आ ही गया हैं तो एक बार मिल ले मेरी खातिर” 
“ठीक हैं चल” ..और मैं  उठ कर किशोर के पीछे पीछे हो गया ..आगे जाने की लालसा तो थी पर हिम्मत नहीं थी मन एक अजीब सी आशंका में घिर गया था
रूम नंबर १४ अन्दर घुसते ही मोगरे की खुशबू सांसों में भर गयी थी वो सो रही थी शायद करवट लिए हुए पास ही उसकी बेटी हाँ बेटी ही रही होगी नक्श तो यही कहते थे ...”नमस्ते”  कह के उसने धीरे से आवाज दी "मम्मी  " 
“रहने दो मत जगाओ सोई होगी” किशोर ने कहा 
“नहीं ...जग रही हैं ..मम्मी   देखो किशोर अंकल आये हैं...मम्मा...मम्मा” 
आँखें शायद बंद थी ...नहीं खुली न  जागने वाली नींद में खोयी हुई मीनल ने अपना वादा निभा दिया था जानते हुए भी अनजान बने रहने का मिल के भी कभी न  मिलने का किशोर पागलों की तरह उसे झकझोर रहा था 
मैं रूम से बाहर निकल आया था बैचैन सा सीना लिए... कुछ वादे क्या कोई ऐसे भी निभा पायेगा ....और इस हद तक 

हरीश  भट्ट 

Tuesday, October 8, 2019

वेदना के स्वर - गीत

वेदना के स्वर  जब अपने ही देश को धिक्कारते हैं लोग

आभावों मैं जीने वालों ....क्यों इतना पछताते हों ।
क्यों ओरों की चकाचौध में, अपनी रात छुपाते हो ।।
आभावों मैं कौन नही हैं,, कौन यहाँ परिपूर्ण कहों ।
मानव हो ओर मानवता का, ह्रास हुआ बतलाते हों ।।

जिस धरती पर जन्म लिया, जिस माटी में तुम खेले ।
जिस भूमि पर लगते हैं, हर बरस चिताओं पर मेले ।।
उस मिट्टी को गाली दो ये हरगिज भी स्वीकार्य नही ।
सम्मान नही दे पाये तो अपमान काभी अधिकार नही ।

कुछ तो सीमा पर हरदम ही, बस आग लगाये बैठे हैं ।
कुछ अपने हैं अंदरखाने, जाने किस बात पे रूठे हैं ।।
जिसको देखो बात बात पर, हमको आँख दिखता हैं ।
और विदेशी मंचों पर वो,, व्यर्थ ही गाल बजाता हैं ।।

पर कितने भी प्रतिबंध लगालो, टीका चंदन रोली पर ।
जितने चाहे बम फोड़ो तुम,, ईद दीवाली होली पर ।।
फर्क नही पड़ता हैं लेकिन, चाहे जान लड़ा लो तुम ।
गद्दारों का नाम लिखा हैं हर देशभक्त की गोली पर ।।

इस देश को जिंदा रखने को जो, रक्त के आंसू रोया हैं ।
इस गुलाम के लांछन को,, जिसने मस्तक से धोया हैं ।।
वो तो शहीद हो गया वतन पर, अबकी तुम्हारी बारी हैं ।
तुमने तो सबकुछ पाया हैं उसने सब कुछ ही खोया हैं ।।

माना की देश के माथे पर,, अभी चंद लकीरे हैं गहरी ।
माना कि भ्रष्ट हैं तंत्र और, सरकार भी हैं गूंगी बहरी ।।
पुरुषार्थ मगर मंगल हेतु, सब को करना पड़ जायेगा ।
देश का मंगल करने को,, कोई मंगल से नही आयेगा ।।

जय भारत जय भारती..
हरीश भट्ट

नजरिया -

नमस्कार दोस्तों ...शुभरात्रि
सोचता हूँ
कुछ नजरिये
तह कर के रख दूं
अंदर वाले
संदूक में
चलन से
बाहर हो चुके
कपड़ों के साथ
दृष्टिकोण के कोंण
मिटा कर
पाट दूं
सार्वजनिक
स्वीकार्यताओं से
वैचारिकता को
थोप लूँ
खुद पर
तुम्हारे स्वयं के
आंकलित
पूर्वाभासों को
और कुछ आग्रहों  को
जिन्हें तुम
पूर्वाग्रह कहते हो
मुझे आंकलित करते हुए
तिलांजलि दे दूं
छोड़ दूं
खुद को
किस्मत के हवाले
रफ्ता रफ्ता
आदत पड़ जाने तक
भीड़ का चेहरा होना ही
भीड़ का हिस्सा होना हैं
मान कर
सोचता हूँ संकल्प ले
तर्पण कर दूं
आज ही
तथाकथित
अपने प्रति
तुम्हारे दुराग्रहों का
तिलांजलि दे दूं
हृदयगत संबंधों को
सीख लूं चलन
समायोजनाओं में
जीने का
तलाश लूं
बीच के रास्ते
कुछ पगडंडियां
कुछ रिश्ते
कुछ वास्ते
तुम कहो तो
संवेदनाएं टांक दूं
व्यस्तताओं की खूंटी पर
वेदनाएं ओढ़ लूं
मेटीरियलिस्टिक सी
प्रेक्टिकल अप्प्रोच
मुखोटों की तरह
सहज न हो भले
तो क्या
आकर्षण तो होगा न
विकर्षण भी
क्यों न
ढूंढ लू
तुम्हारे वाला शब्दकोश
जिसमें
भाव-समभाव
वेदना-संवेदना
आवेश-भावावेश
प्रेम-स्नेह और विवेक
जैसे शब्द न हो
और जो हों
उनके कई कई
अर्थ निकल जाते हों
सहूलियत के हिसाब से
पारिस्थितिक और
मान्यता के हिजाब में
सोचता हूँ
अपेक्षाएं जमा कर दूं
पीछे के स्टोररूम में
उपेक्षाओं की
और कांटेदार
जिल्त चड़ा लूं
चेहरे पर
भरपूर
नाटकीयता के लिए
चेहरे पे चेहरों का होना
शायद
जरूरत बन गई हैं
एकमात्र शक्लें
संदेहग्रस्त हो जाती हैं
अमान्य भी
मित्र जब तुम
ऐसा सोचते हो
तो अगर मैं भी
तत्सम ही
सोचता हूँ
तो
कहो जरा
क्या गलत सोचता हूँ ??
हरीश भट्ट

समर्पण - एक लघु कथा

देहरादून के गढ़वाल विकास निगम का वह कांफ्रेंस हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज रहा था मंच पर राज्य के सांस्कृतिक विकास मंत्री श्री परमार जी ने अपना उद्बोधन देना शुरू किया ...."मुझे ख़ुशी हैं और गर्व भी,.. इस साल का संस्कृति रत्न पुरुस्कार श्री अनिरुद्ध डबराल जी को देते हुए ...आज  इनके काव्य संग्रह "अंतस " का विमोचन करते हुए मुझे अत्यंत हर्ष हो रहा हैं...इतनी कम उम्र में ऐसा प्रखर सृजन......... ""
....और हाल एक बार फिर तालियों की गड़गड़ाहट से भर गया....
अनिरुद्ध की आंखे स्टेज पर खड़े खड़े डबडबा आई थी ....आज उसका सपना जो साकार हो रहा था ...चिर प्रतीक्षित सपना ...उसकी पिता जी कि आँखों में चमक बड़ गई थी... बढ़ा आयोजन था...सब दोस्तों कि नजरें  आज अनिरुद्ध पर ही थी ...और जब अनिरुद्ध ने अपनी पुस्तक से कविता के  कुछ अंश पढने शुरू किये...
अंतस तक प्यासी हैं धरती
आओ अम्बर को बतलाये ....
तब..तब वहीँ तो थी कादम्बिनी  हॉल के दूसरे दरवाजे कि ओट  में ....हजारों बार सुनी थी उसने यह कविता अनु के मुह से ...तब उसे लगता था जैसे धरती कि नहीं यह उसकी स्वयं कि बात हो...."अंतस तक प्यासी हैं धरती.....(हाँ वह प्यार से अनिरुद्ध को अनु ही कहती थी)
कुछ दिन पहले  कि ही तो बात हैं .....
""अनिरुद्ध ""....बहुत दिन से तुमने कुछ नया नहीं लिखा...... पूछा था कादम्बनी ने...एक सकून भरी मुस्कराहट के साथ कहा था अनिरुद्ध ने...नहीं कादम्बनी कुछ नया लिखने का मन नहीं ...मेरे अन्दर से तब कुछ उत्सर्जित होता   हैं  ..जब में अकेला  होता हूँ ...दर्द और बेचैनी निकल ही आती हैं वर्कों पर ...लेकिन ...तुमसे मिलने के बाद सब कुछ पा लिया लगता हैं मेरी तलाश ख़त्म हुई...
"लेकिन अनिरुद्ध तुम्हारे सपने...तुम चाहते थे न कि तुम्हारा काव्यसंग्रह....."" ...
"ओहो....कादम्बिनी ...तुम हो ना मेरा काव्य संग्रह...आओ कहीं काफी पीते हैं"
"पर अनिरुद्ध तुम्हारा सपना मेरा भी तो हैं ..में तुम्हे आगे बढ़ते देखना चाहती हूँ जरूरी तो नहीं केवल मिलन और विछोह के ही गीत लिखे जाये...खुशियों के पल भी तो हैं सामाजिकता ..संस्कृति..."
"प्लीज़ कादम्बनी ...सुबह सुबह ..क्यों मूड ख़राब कर रही हो ..तुम्हारी दोस्ती मुझसे हैं या मेरी रचनाओं से.".कसक कर कहा अनिरुद्ध ने
"" नहीं अनु ..तुमसे तो हैं पर ..तुम्हारी रचनाओं  में  मेरा जीवन बसता  हैं....  तुम्हारी रचनाओं कि नायिकाओं में मैं खुद को तलाशती हूँ ...रख के देखती हूँ खुद को ...""
""हहहहहः ....क्या कादम्बनी ...तुम भी न...अरे कल्पनाओं कि नायिका और तुममे बहुत फर्क हैं " ... हँसते हुए कहा था अनिरुद्ध ने
"वो तो अतीत हो जाती हैं ...पल में ओझल ..पर..पर तुम तो मेरा वर्तमान हो...तुम से तो मैंने जीना सीखा हैं ....अच्छा  ..सुनो...प्लाजा में नई फिल्म लगी हैं ... शाम को चलते हैं ...वहीँ रेस्तरां  में कुछ खा लेंगे.." और हाँ तुमने वादा किया हैं कि कल तुम अपने घरवालों से बात भी करोगी "
"नहीं अनु...आज मुझे कुछ काम हैं में चलती हूँ . बाय " अनमने ही उठ खड़ी हुई थी कादम्बिनी
घर लौटते हुए कादम्बिनी  के चेहरे पे उदासी थी ...वह सोच रही थी ...कि कैसे अनिरुद्ध को बताये कि उसकी बातों में उसकी रचनाओं में एक अलग बात हैं ...वह अच्छा लिख सकता हैं ...इतना कि दुनिया उसे पढ़े ... और उसे सर आँखों पे बिठाये
कादम्बिनी अनिरुद्ध को बचपन से जानती थी दोनों  एक दूसरे कि चाहत थे पर कादम्बनी कि नज़रों में प्यार के मायने अलग थे वो जब अनिरुद्ध कि आँखों में आगे बढ़ने का सपना देखती थी..जब उसके चेहरे पर भविष्य कि ख़ुशी कि झलक महसूस करती थी तो उसे लगता था कि शायद यही चाहत हैं उस खुशी उस सपने को पूरा करने में ही उसके प्यार का हक अदा हो जाये शायद
शाम गहरा गई थी आसपास भी और मन के अन्दर भी ...सोचते  सोचते ...घर भी नजदीक ही था...कुछ तो निश्चय कर ही लिया था उसने ..आखिर क्या ?
अल सुबह ही अनिरुद्ध का फोन आ गया ....
"हाय कादम्बिनी कैसी हो" ....."ठीक हूँ कहो कैसे फोन किया"
"कादम्बिनी याद हैं ना तुम्हे आज तुम आपने घरवालों से मेरे बारे में बात करोगी " आवाज में चमक थी अनुरुद्ध की
"..क्या मतलब ..कैसी बात .." कादम्बिनी सपाट थी
"अरे ...हमारे रिश्ते की बात  ...." चहका था अनिरुद्ध
""क्या बकवास कर रहे हो अनिरुद्ध ..एक दो बार तुम्हारे साथ घूम क्या लीया  तुमने मुझसे रिश्ता जोड़ लिया ...तुमने सोच भी कैसे लिया कि में तुमसे शादी करूंगी ....तुम सिर्फ दोस्त हो मेरे पर शादी ...में तुमसे शादी कभी नही करना चाहती थी "
मजाक कर रही हो ... अनिरुद्ध अभी भी बेअसर था किसी भी अनहोनी से
"तुम्हें मेरी बातें हमेशा मजाक ही लगती हैं न अनु कभी तुमने अपने आगे कुछ समझ भी हैं मुझे ....बस अपनी कविताओं की कपोल कल्पना हूँ न में तो आगे से कभी मुझे फ़ोन मत करना""
और...फोन काट दिया कादम्बनी ने ....उसकी आँखों में खारापन बड़ गया था और सीने में भारीपन भी ....
हाँ यही तो सोचा था उसने कल शाम घर वापस आते हुए गहराते अंधियारे में.. और कोई रास्ता नही था .......
और अनिरुद्ध जड़ होगया था ..सुन कर...उसने कादम्बिनी को मिलने की बहुत कोशिश की तो पता चला वह आपने मामा के यहाँ चली गई हैं ..हल्द्वानी ..किसी कोर्स के लिए...
छः माह बीत गए शायद....
कांफ्रेंस हाल से निकलते हुए बुक स्टाल से कादम्बिनी ने  अनिरुद्ध की कविताओं का संकलन खरीदा ..प्रथम पेज पर ही "दो शब्द .."पढ़ कर उसकी आंखे फिर से नम हो गई वह दौड़ रही थी पूरे वेग से घर की ओर...लिखा था ..
""एक स्नेहिल मित्र के अंतस को समर्पित.... ""
कौन जान सकेगा की ..क्यों उमड़ घुमड़ कर आये मेघ कभी कभी धरती को प्यासा छोड़ कर रुख बदल लेते हैं जबकि उनकी तृप्ति भी धरती को अंतस  तक भिगोने की ही हैं ...
कौन जान सकेगा...??
--
हरीश भट्ट

दुमदार दोहे ....

शुभ दुपहरिया दोस्तों
दुमदार दोहे ....

शाम सुहानी हैं मगर, विचलित हैं आकाश!!
नदियों में कलरव नहीं, मन में नहीं उजास!!
निपट एकांत का मारा ! 

वृक्ष नही वन में कहीं, जल विहीन हैं ताल!
सूनी सूनी गोद हैं, .........धरती हैं बेहाल!!
घटायें कब बरसेंगी !

तुझको क्या मैं नाम दूं ,राम कहूं रहमान !
घट घट तेरा वास हैं, ..पग पग तेरी शान!!
दरश को तरसे हैं मन ! 

हरि बिन पार न पावही, लाख करे तू टाल!
कर्म बिना पर गति नहीं, यह कैसा जंजाल  !!
वही अब पार लगाये !

कबहु प्रीत ना कीजिये, कठिन प्रीत की रीत !
ठेस लगे से गिर पड़े, ..ज्यों माटी की भीत !!
प्रीत की रीत बुरी हैं !    

देख सखी सुन ले जरा,.....बात जरा गंभीर !
प्रेम रोग सबसे बड़ा,  विकट बड़ी यह पीर !!
सखी री पछताओगी !

हो विमर्श हर बात पर, आपा काहे खोय !
मत का चाहे भेद हो, मन का भेद न होय!!
न तलवारे तुम खीचों !

मेरा दुख सब से बड़ा, सोचे ये दिन रात !
क्यों तू खुद को दोष दे, घर घर की हैं बात!!
यही हैं दुनियादारी !

बेटी ब्याह न दीजिये, .......देकर दान दहेज़!
जीवन भर सुख ना मिले, ज्यों काँटों की सेज़ !!
जेल जाओगे सुन लो !

हरीश भट्ट....

संस्मरण/विषय- शिक्षक दिवस


विधा -संस्मरण/विषय- शिक्षक दिवस
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सभी सदस्यों को शिक्षक दिवस की शुभकामनायें
एक प्रसंग याद आता हैं मुझे भी मैं उस समय १०वी कक्षा का छात्र था विज्ञान के विषय में जरा कमजोर भी ऊपर से बोर्ड की परीक्षा की तलवार भी थी लटकी हुई
केन्द्रीय विद्यालय संगठन ने उस वर्ष ये निर्णय लिया की छात्रों की त्रैमासिक परीक्षा इस बार इस तरह से हो की बोर्ड की परीक्षा का पैटर्न पता चल सके तथा कमजोर छात्रों को प्रेरित किया जा सके..
एक तो सभी छात्र बोर्ड, प्रीबोर्ड के नाम से पहले ही इतना खौफजदा थे उस पर त्रैमासिक परीक्षा का अजब अंदाज लिहाजा विज्ञान विषय में मेरी क्लास के तकरीबन सभी छात्र छात्राएं अनुतीर्ण रह गए ... 
वर्मा सर जो केमेस्ट्री पढाया करते थे एक तो वो पहले ही इतने स्ट्रिक्ट थे  रिजल्ट वाले दिन आते ही उन्होंने पहले तो पूरी क्लास की क्लास ली .. उसके बाद रही सही कसर अगले दिन सुबह असेम्बली में प्रिंसिपल सर ने पूरी कर दी जब पूरे स्कूल के सामने त्रैमासिक परीक्षा में पास न हो पाने वाले बच्चों को अलग से लाइन लगा कर खड़ा कर दिया गया 
जब मेरी कक्षा के कुछ बच्चों ने नया पैटर्न और स्ट्रिक्ट मार्किंग का हवाला दिया तो बांकी बच्चों को तो क्लास में जाने को कह दिया गया पर मेरी पूरी क्रातिकारी क्लास को सजा के तौर पर दिन भर अगस्त की चिलचिलाती धूप में खड़े रहने का फरमान अनुशाशन समिति की तरफ से सुना दिया गया
अब पूरी क्लास धूप में सुबह ७:३० से १० बज गए गर्मी से बेहाल अब गिरे की तब गिरे कभी वर्मा सर को कोसते कभी प्रिंसिपल सर को तो कभी परीक्षा पैटर्न को ..तभी वर्मा सर आते हुए दिखाई दिए हमें लगा फिर कोई आफत आ गई लगता हैं ...पर ये क्या ...वर्मा सर आये और सबसे आगे आ कर खड़े हो गए ..फिर उन्होंने पूछना शुरू किया क्या हुआ क्यों हुआ ..हमने बताया ..सर इस परीक्षा को ले कर इतना डर था की आये हुए जवाब भी नहीं लिख पाए क्योंकि सवाल घुमा फिर के पूछे गए थे ...
एक घंटा उसी तरह बीता ....वर्मा सर रिटायर्मेंट की एज पर थे पसीने से लथपथ वो भी धूप में खड़े रहे हमारे साथ ....प्रिंसिपल सर का अर्दली इस बीच आ के वर्मा सर से बात करके चला गया ..पर हमें कुछ समझ नहीं आया की माजरा क्या हैं सर यहाँ क्यों हैं ??
जब ११:३० पर प्रिंसिपल सर खुद आये और वर्मा सर को कहा की आप स्टाफ रूम जाइये दूसरी क्लास को भी पढ़ाना हैं ...तब वर्मा सर ने मजबूती और आत्मविश्वास से जो कहा मुझे आज भी अक्षरश याद हैं उन्होंने कहा ...

"सर इन बच्चों की सफलता या असफलता मेरी जिम्मेदारी हैं यदि ये पास नहीं हो पाए तो मैं भी फेल हो गया ...सो जो सजा इन्हें मिल रही हैं मैं भी उसमें बराबर का भागिदार हूँ इसलिए जब तक ये धूप में खड़े हैं मैं भी रहूँगा ...

आज याद करता हूँ तो आँख में आसूं आ जाते हैं ...एक स्ट्रिक्ट और कर्कश शिक्षक जीवन में ऐसे भी शिक्षा दे सकता हैं उस दिन पता चला ....प्रिंसिपल सर ने उसी समय सबकी सजा माफ़ की और सबको द्वीतीय तिमाही मैं मेहनत करने की सलाह दे क्लास में भेजा उन्होंने कहा जिन छात्रों का ऐसा डेडिकेटेड शिक्षक हो वो बोर्ड क्या जीवन  की किसी परीक्षा में फेल नहीं हो सकते  ...
ऊपर से कठोर दिखने वाला नारियल समान अंतर्मन से कितना संवेदनशील हो सकता हैं उस दिन पता चला ..नतीजा बोर्ड परीक्षा में हम सब पास थे 

ऐसे थे हमारे शिक्षक ..आज भी बहुत सी बातें हैं स्कूल के समय की जो हमेशा याद आती हैं

हरीश भट्ट