Wednesday, April 29, 2015

ज़लज़ला : एक त्रासदी

वो जो शिद्दत से घर गया होगा !
कच्ची मिट्टी से, भर गया होगा !!

कितनी मासूम,, जिंदगी लेकर ! 
जलजला था,, गुजर गया होगा !!

सर पे जब छत दरक रही होगी !
माँ से चिपका, वो डर गया होगा !!

अब न चीखें,,  न कोई आवाजें !
उसको छोड़ो, वो मर गया होगा !!

हाथ और पैर का तो, क्या रोना ! 
जाने कितनों का, सर गया होगा !!

अब न मंदिर बचा,, न चौराहा !
काठ का घर था, गिर गया होगा !!

जिंदगी,, फिर भी मुस्कुराती हैं !
कुछ दुआ का, असर गया होगा !! 

Sunday, February 1, 2015

४५वे पड़ाव पर



नमस्कार दोस्तों
आज उम्र के पांचवें पड़ाव के मध्य में पहुँचते पहुँचते हर्षित   तो हूँ पर   कुछ अनमना सा गया हूँ विचलित  भी,,,,,,,,,,,,, जो  बीत गई सो बात  गई से संतुष्ट नहीं हो पाता
कल रात से ही व्यग्तिगत रूप  से  तथा फोन से भी  मित्र लोगों की शुभकामनाओं के पुष्पगुच्छ समेटते समेटते प्रफुलित मन से कृतज्ञ भी हूँ  इस आपाधापी में भीड़भड़क्के में और टूटती वर्जनाओं में   भी लोग किसी को याद करलें तो मन में एक आस तो रहती ही हैं कि जीवन अभी बांकी हैं
सोचता हूँ की जन्म से ले कर अब तक न जाने कितनी भूमिकाएं निबाहने को मिली न जाने कितने किरदार गढ़े स्वयं ने और न जाने किस किस ने, कुछ संबंधों  को तो केवल नाम ही दे पाया,,, कुछ  को वो  भी  नहीं,, कुछ को पूरी तत्परता और दृढ़ता से,, तो कुछ को बस  अनमने ही !!
  क्या ऐसा केवल मेरे साथ ही हैं ??
क्या पुत्र  से अधिक में पिता बन सका ? क्या प्रिय  से अधिक पति , क्या सहयोगी  से अधिक  मित्र बन पाया ? क्या सहकर्मी से अधिक सहधर्मी ?
मुझमें न जाने कितना कम रह गया ,,,कुछ पता चला तो कुछ  नहीं,, कभी किसी किसी ने जता दिया किसी    ने अक्षरश निभा लिया अनकहा सा
न जाने किस किस ने मुझे दृष्टि के किस किस कोण पर रक्खा !! पाना भले ही नियति न हो पर खोया तो मेने स्वयं के उपक्रम से ही हैं!! स्वीकार लेने में हर्ज ही क्या हैं। ....
आप भी कहेंगें ,,,भाई जन्मदिन पर ये  कैसी नकारात्मकता,,, पर दोस्तों इस पहलू के बिना दूसरे का क्या मोल ,,बात केवल "उम्रदराज " हो जाने तक की तो नहीं ही हैं। ..
आज जब आगुन्तक सांसों की गिनती कम देखता हूँ तो सोचता हूँ कितना  सा ही तो  बचा  हैं यूं भी गणित में मेरे नम्बर हमेशा कम ही रहे हैं फिर क्यों ये दुराव- छिपाव और कैसा प्रपंच
संबंधों की परिभाषाएं दुबारा जननी ही होंगी
तमाम  शुभकामनाओं के लिए ह्रदय से धन्यवाद ,,शुक्रिया 

Wednesday, December 31, 2014

नव वर्ष !! क्यों कहूँ तुम्हे अभिनन्दन हो ??


जब तिमिर द्वार पर पसरा हो  और व्योम घना घन गर्जन हो
जब मानवता का ह्रास प्रबल, और भूख प्यास का क्रंदन हो
जब चहूँ ओर चीत्कार मचे,,  और मानवता अकुलाती हो
जब पाप हो पोषित घर घर में,,  पृथ्वी की फटती छाती हो
तब कौन तुम्हे आह्वाहन दे ,,, तुम मोह पाश का बंधन हो
नव वर्ष !! तुम्हारे आने पर  क्यों कहूँ तुम्हे अभिनन्दन हो ??

जब विद्या के उस आलय में  सौ सौ  बच्चो की चिता जली
जब क्षत विक्षत हो  ललनाएँ ,, अपने ही  हाथों  गई छली
क्यों उठी नहीं ये सुन कर भी,,  चीत्कार तुम्हारे होठों पर
क्यों कान तुम्हारे बंद हुए थे,,  उन आतंकी विस्फोटों पर
कब बचा सके तुम लाज कहो  हाँ सभ्य नहीं तुम दुर्जन हो
नव वर्ष !! तुम्हारे आने पर  क्यों कहूँ तुम्हे अभिनन्दन हो ??

गत वर्ष भी तो तुम आये थे,,  शोभित नूतन सी आस  लिए
नवकोंपल और नवजीवन का  स्वप्नीला सा, विश्वास लिए
तब भी तो तुम्हारे स्वागत में,,  हमने सुध - बुध बिसराई थी
नव तिलक किया था माथे पर  कोमल कलियाँ बिखराई थी
पर मिटा सके कब  माथे से,, तुम  रक्तजनित उस चन्दन को
नव वर्ष !!  तुम्हारे आने पर  क्यों कहूँ तुम्हे अभिनन्दन हो ??

अब तो मित्र  उत्सुक्त नहीं, न आल्हादित हूँ तुम्हारे आने पर
अब न कोई प्रतिकार ही हैं ,,ना  प्रतिरोध तुम्हारे  जाने पर
जाने हो  कैसा स्वर्णिम युग,, जिसका संकल्प दिया तुमने
में भुजा पसारे याचक  था,, पर निष्ठुर,,  अल्प दिया तुमने
क्यों कहो की फिर सत्कार करूँ औ क्यों ये तुम्हारा वंदन हो

नव वर्ष !!  तुम्हारे आने पर  क्यों कहूँ तुम्हे अभिनन्दन हो ??

Saturday, December 20, 2014

साल-दर-साल



तुम
इस बार भी नहीं रुके,
नहीं ही रुके,
इस बार भी !!
या कहूँ ,
नहीं  रोक पाया,
मैं तुम्हे,
इस बार भी,
हर बार की तरह !!

पीछे
जनवरी-फ़रवरी
तुम्हारे
आने आने  में  रह गयी,
आ धमकते हो
बुलाने तक तो ,,,,

मार्च-अप्रेल ..
मैं तुम्हे रिझाने ,मनाने
और  खुद को
समझाने  में  रह गया !!

मई-जून.....
हाँ अब शायद ……
तुम्हारे प्यार की गर्माहट
महसूस होने  लगी हैं अब,
और तो और
जुलाई-अगस्त आते आते
सराबोर करने लगे हो तुम,
अतरंग फुहारों से !

पर यह क्या ??
सितम्बर-अक्टूबर ……
पीछा छुडाने लगा हैं
तुमसे,
उतरने लगे हो तुम,,
दिवार पर  से,
धूप की तरह !!
नवंबर-दिसम्बर....
कोशिश में लगा हूँ
फिर  से
रोक पाने की तुम्हे ?

मुझे पता हैं
फिर नहीं रुकोगे तुम,,
जाना, नियति हैं तुम्हारी
कौन रोक पाया हैं तुम्हें

कोशिश !! फिर भी
जारी हैं,
मेरी भी, ओरों की तरह  ,,,
साल-दर-साल
लम्हें-दर-लम्हें !!!!!
काश !!
की तुम,
रूक पाते ????

तुम
फिर आओगे
जनवरी-फ़रवरी में
पता हैं मुझे !!
पर हर बार,
तुम !!!
कुछ बड़ से जाते हो ,,
और
मुझ में,,
कुछ घट सा जाता हैं !!!??



Thursday, January 30, 2014

पुण्यतिथि....


गाँधी...
गाँधी नाम का विचार 
६२ वर्ष पहले नहीं
और  न ही किसी
गोडसे ने
न ही किसी
धर्मान्धता ने
न ही किसी
सामाजिकता ने 
न अस्त्र ने न शस्त्र  ने
किसी ने नहीं मारा था उसे  तब
वो तो एक जर्जित काया
विपन्न तन से
अलग हुआ था केवल
किन्तु
उसे मारा हमने
और  रोज मार रहे हैं
हाँ....
रोज मर रहा हैं गाँधी
अपने ही देश में
रोज अविग्यित हो रहा हैं
रोज अविनयित हो रहा हैं
अपने  ही देश में
विचारों का तिलान्जलन
ओर आदर्शो का तर्पण
नियति बन चुकी हैं इस देश की
हाँ ...नियति
राष्ट्रपिता  सा शब्द
गाली सा लगने लगा हैं
और ....
और  तुझे तो मरना ही  था
मोहन दास करमचंद गाँधी
ये कृतघ्नों का देश हैं
गोली से नहीं मरता
तो शर्म से तो
कब का मर ही जाता
कब का
रोज पानी पी पी कर
कोसती नई पीढ़ी
और  भ्रष्ट कार्यप्रणाली को
आत्मसात किये
देश के दोगले कर्णधार
रोज ही तो कर रहे हैं
श्राद्ध गाँधी का
सही ही हैं
कलयुग का  पराकाष्ठ
यही हैं शायद 
जब घर वाले
अपने बूढ़े लाचार बाप को नहीं छोड़ते
तो बापू  तुझे  क्या छोड़ेंगे
बस !!??
करो माल्यार्पण
चाय काफी मंगवालो
गान्धित्व का ग भी न जानने वाले
झाड़ रहे हैं भाषण
और  फिर
पुण्यतिथि दिवस का
बजट भी तो ठिकाने लगाना हैं

Tuesday, January 7, 2014

तुम क्या गए.......


तुम क्या गए की आस का मधुमास विस्मृत हो गया !
संवाद संक्षिप्त से रहे  और,  संताप विस्तृत हो गया !!
दग्ध अधरों के प्रश्नों का उत्तर, मैं भला देता भी क्या !
झूठ की  उस परिकल्पना में..,,सत्य वर्जित हो गया !!

दो चरण भी साथ ले कर, क्यों चल सके ना सार्थ तुम !
नीतिगत प्रतिबद्धता में, क्यों बंध  सके ना पार्थ तुम !!
क्या मैं   अर्पित  चाहता था....क्या  समर्पित हो गया !
झूठ की  उस परिकल्पना में.…सत्य वर्जित हो गया !!

तुम कहो तो पूर्व अर्जित पुण्य........ तुमको सौंप  दूं  !
चिर प्रतीक्षित कामना का......... हेतु तुमको सौंप दूं !!
क्यों कहो मधुमास का अवसर.... विसर्जित हो गया !
क्या मैं  अर्पित  चाहता था... क्या  समर्पित हो गया !!

क्या पता था परिहास भी यूं अक्षरश  शिरोधार्य  होगा !
अनमना प्रतिकार तुमको ....सहज ही स्वीकार्य होगा !!
भाव जो समभाव  में  था, क्षण भर मैं वर्गित  हो गया !
झूठ की  उस परिकल्पना में.…सत्य वर्जित हो गया !!



Friday, December 20, 2013

सर्दियाँ



सर्दियों की 
अलसाई सी सुबह 
खिड़कियों से परे 
मीलों तक 
पसरा हुआ सा मैं 
और उस पर 
क़तरा  क़तरा
बर्फ कि मानिंद 
बिछती हुई सी तुम
सर्द एहसास लिए कुहासा 
सराबोर करने को आतुर 
पर पता हैं मुझे 
निष्ठुर उगेगा जब 
रोक नहीं पाउँगा 
वाष्पित होने से 
तुम्हे   

अनमनी सी दोपहर 
लौट चुकी हो तुम 
अपने हिमाद्र में 
मेरा पसार 
सिकुड़ने लगा हैं अब 
धूप सी तुम 
छितरा गई हो 
दूर देवदार  के पत्तों तक
तुम्हारी तपिश 
अब भी दूर हैं 
मुझसे 

भुतहा साँझ 
सर्द धुंधलका गहराने लगा हैं 
दुबक गया हूँ जैसे 
अबाबील कि तरह 
किसी कोटर में 
कंपकपा  गई हैं ऑंखें 
तुम्हारी आमद को 
मुझे पता हैं 
अँधेरे तराश रही हो तुम 
सुझाई नहीं देती हो तुम  फिर भी  

रात्रि प्रहर 
भाँय भाँय करता अंधियाला 
मीलों तक फैला 
सियाह बादलों कि कोर से 
स्खलित हो रही हो तुम 
सुफ़ेद रुई के फाहों सी 
धुंधलकी खिड़कियों के पार 
विसर्जित होते 
देखना ही तुम्हे 
नियति  हो जैसे 
 तुमसे एकाकार 
कब हो पाउँगा मैं 

हाँ'
इन्तजार में हूँ 
अलसाई सुबह का 
फिर एक बार 
मिलोगी न मुझे 
निष्ठुर के उगने से 
पहले तक 
भावाष्पित होने से 
पहले तक 
क्षणांश ही सही