Saturday, April 18, 2020

प्रेम पत्र

सोचा किसी को पत्र लिखूँ और कहूँ  की .....

प्रिय मुझे जब, पत्र लिखो तो !
तुम कुछ.. ऐसा सा लिखना !!
पंक्ति पंक्ति में ....तुम रहना, !
और पृष्ठ पृष्ठ, मुझसा रखना !!

लिख देना कुछ ..कागज़ पर !
मैं उसमें तुमको...पढ़ लूँगा.!! 
तुम अक्षर अक्षर.. रच जाना !
मैं चित्र चित्र सा ...गढ़ लूँगा !!
तुम अंत में अपना रख लेना !..
पर ऊपर नाम ...मेरा रखना !!
पंक्ति पंक्ति में .....तुम रहना,!
और पृष्ठ पृष्ठ, मुझ सा रखना !!

तुम छू लेना जरा सा, होंठों से !
सांसें मुझको, महका जाएँगी !! 
भावों को तूलिका ...कर लेना !
यादें ...मुझको सहला जाएँगी !
नाम भले ही ....मत लिखना !
पर एहसास ​.....​सदा रखना ​!!​
​पंक्ति पंक्ति में .....तुम रहना,!
और पृष्ठ पृष्ठ, मुझ सा रखना !!​

बीते हुए प्रतिक्षण में, शामिल !
अविरल प्रतिक्षा, लिख देना !!
अतृप्त विरह की... नीरवता  !
स्नेहिल शुभेच्छा ..लिख देना !!
उम्मीद भले तुम कम लिखना !
मुझ पर विश्वास खरा रखना !!
पंक्ती पंक्ती में .....तुम रहना !
और पृष्ठ पृष्ठ मुझसा रखना !!

लिख देना... वेदनाएं मन की !
सब अश्रु स्वेद भी लिख देना !! 
इतने वर्षों का ​.​​......​राग द्वेष ​!​
औ मन विभेद भी लिख देना​ ​!!
बस इतना अर्चन हैं ....तुमसे !
बीते दिन याद...जरा रखना !!​​
पंक्ति पंक्ति में .....तुम रहना​ ​!
और पृष्ठ पृष्ठ​,​ मुझ सा रखना!!

तुम्हारा 
हरीश भट्ट

रोज़ डे दुमदार दोहे

Happy Rose day my dear अर्धांगिनी😊😊

कुछ दुमदार दोहे आपके नाम 😊😊

लाल ललाम थी कामिनि​, कर में लाल गुलाब !​
अखियन से घायल करे,​ उसका नहीं जवाब ​!!​
नयन से गोली मारे ​!!​

रोज़ रोज़ को देख कर, मन ही मन हुलसाय ! 
रोज दिया जो रोज को, विह्सें मुह बिचकाय  !!
सड़क पे फैके सारे !!

कैसा यह  दस्तूर हैं, अजब विधि का विधान ! 
फूल फूल को फूल दे, देख सखी उपमान !! 
कहीं का ना रक्खा रे !!

जान हैं किसी और की, उसको जान न जान !
घर जो मान बढ़ा रही, उसको अपना मान !!
पतिव्रत धर्म  निभा रे !!

कंचन काया कौमुदी, कोमल कलि कचनार​ !​
क्या मैं उसको भेंट दूं​,​ मुख जिसका  रतनार​ !!​
गुलिस्तान उस पर वारे​ !!​
हरीश भट्ट

महिला दिवस

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की बहुत शुभकामनायें, उनके लिए जिनसे मेरा सबकुछ हैं .....

वो, 
जिनसे मुझे 
अपूर्णता से 
सम्पूर्णता मिली, 
परिपूर्णता भी ....
वो जो मार्गदर्शक भी बनी 
और पथ प्रदर्शक  भी
चित्तहर्षक भी , ...
वो जो सौम्यता, स्निग्धता 
और ममत्व का 
प्रतिमान हैं, 
वो जो पैरों के नीचे की ज़मी 
और सर पे 
आसरे  का  आसमान हैं, .....

वो जो 
स्नेह का पिटारा भी हैं 
और मझधार में 
कश्ती का किनारा भी 
और अनंत का सहारा भी , ....
.वो जो मंदिर की 
परिक्रमा में 
आस्था का आँचल  भी हैं 
हंसी मौन क्रंदन भी 
और स्वाभिमान का 
रोली चन्दन भी ...
वो जो दुश्वारियों को 
बुहारने का सूप भी हैं 
साक्षात देवी सा रूप भी 
और आँगन में  
खिलखिलाती 
गुनगुनाती धूप भी,..... 

वो जो अन्नपूर्णा भी हैं 
जी लेने  की प्रेरणा भी  
और उज्जवलित सी 
कांतिमय  कामना भी,...
.वो जो आशीष का 
अम्बर हैं 
प्रीत का स्वयंबर हैं 
और संभावनाओं का 
समन्दर भी 
वो जो मेरा 
समाधान भी हैं  
अभिमान भी 
और मेरा प्रतिमान भी 

वो जो एक माँ हैं 
एक पत्नी भी 
एक बेटी भी ....

बहुत शुभकामनाएँ पुनः आप तीनों को और प्रणाम भी

बुखार

ये बुखार का खुमार 
(डेंगू जनित प्रलाप)

अजब सी 
बेकसी का सबब 
और ये बुखार का आलम
सर्द कमरे में भी 
गर्मी की हरारत 
घुल सी गई हो जैसे 
बिस्तर तक पसरी कैफ़ियत 
बैचैन सा तकिया
अनमनी सी चादर
सिलवट सिलवट
इंतजार की घड़ियों की तरह 
घटता बढ़ता 
थर्मामीटर के पारे का सुर
100...101...102..103 
बेकरार आपे से बाहर 
होने को आतुर 
सफर दर सफर
नादां सी मुहब्बत की तरह
अब किसी दवा का असर
बेसबब बेअसर

हाँ 
अब चाँद रात 
पूरे यौवन पे हैं 
महसूस होने लगी हैं 
खुद की सांसों की आंच 
कितने ही दवाई के पर्चे
बेतहाशा खर्चे
सुबह शाम की 
अनगिनत जांच
रक्त जम सा गया हैं 
शिराओं में
टेस्ट रिपोर्ट भी 
तुम्हारे खत की तरह हो गई हैं 
जब भी आती हैं 
नाउम्मीदी से भरी हुई 
बुखार....
पूरी शिद्दत से 
अपनी पनाह में ले चुका हैं... 
की जैसे उसको 
बनाया गया हो 
मेरे लिए 
की जैसे किसी ने 
कस के भींचा हो 
अपनी आगोश में 
कौन आना भी चाहेगा 
अब होश में ...

बदन के टूटने का लुत्फ 
सपनों के टूटने 
से कम तो क्या ही होगा 
पलकों का भारीपन 
बेसबब बेस्वाद मन
जाने कितनी ही 
हसरतों का साया
आधी अधूरी सी झपकियां
जाने किस किस ने पूछा
जाने कौन कौन आया 
पूरी छत का बोझ
उठाये हुए 
रात गुजर रही हैं 
रफ्ता रफ्ता 
गुजरती हुई 
उम्मीद की तरह 
रेज़ा रेज़ा

ग्लूकोज की बॉटल
उफ़क पर टंगे 
चाँद सी लगती हैं 
कितनी हसरत हैं 
जरा सी गर्दन बढ़ा के 
एक झलक 
उसके मासूम से चेहरे को 
बेखयाली से तकते रहने की
उसकी टप टप को 
देखने का शगल 
होता जा रहा हैं 
दीदार ए यार हो जैसे... 
हाँ ..माशूक की 
जुल्फों से टपकती 
बूंदों की तरह 
जर्रा जर्रा  
नमकीन पानी की बूंदें 
जब बदन में 
समा रही होती हैं 
तो मखमली सा एहसास 
नसों में 
तूफान ला देता हैं

कभी कभी मगर 
किसी की ख़ुश्बू से तर
हो जाती हैं हवा
मेरे आसपास की
और सर्द कमरा
महकने लगता हैं 
किसी ने अभी अभी 
माथे पे हाथ
रखा हो जैसे 
कोई छू कर 
गुजरा हो जैसे 
और जिंदगी 
जीने मरने के तलातुम में 
लौट आई हो जैसे 
वो स्पर्श 
जा नही पाता 
देर तलक भी 

पी लेता हूँ 
ये कड़वे बदरंग से सिरप
एक सांस में 
काश की 
जिंदगी भी 
पी जाती एक घूंट में ही 
तो इतनी बदमज़ा न होती 
जाने क्यों हसरतें 
बार बार लौट आती हैं 
इंफेक्शन की तरह 
कटीली सी यादें
चुभ रही हैं
किसी इंजेक्शन की तरह 

सुनो 
तुम आओगे ना
किसी रोज़
मोगरे के फूल लिए
मुझे देखने के बहाने ही सही
शर्त रही चलो 
मेरे ठीक होने की 
ओर तुम्हारी मुहब्बत की 
निभाओगे न 
इंतजार रहेगा 
तुम्हारी सुबह 
नजदीक हैं शायद 
मेरी नींद
सो गई हैं कहीं और जा कर

हरीश भट्ट

1 दिसंबर - याद हैं तुम्हें

सुनो ...
याद हैं तुम्हें 
1 दिसंबर 1995 

प्रणय से परिणय
तक का वो 
स्वपनीला सफर 
इसी दिन तो 
हुआ था न मुकम्मल

याद हैं न 
कल की बात हो जैसे
जयमाल के समय 
आहिस्ता आहिस्ता 
स्वयं के नजदीक आते 
देख  रहा हूँ तुम्हें 
स्वयंवरा सी तुम 
दिव्य और नैसर्गिक
और पार्श्व से आता  हुआ 
मुकेश का वह स्वर
तारों में सजके 
अपने अम्बर से ...
सचमुच पारलौकिक सा था 
वह क्षण
कुछ कहा था तुमने
मेरी तरफ झुक कर
जरा सा मुस्कुरा कर 
भरी भरी आंखों से देखते देखते 
जयमाल गले में डालते डालते 
पुष्पवर्षा के बीच
पूरी लावण्यता के साथ 
क्या कहा था ...
याद नही अब 
तुम्हें याद हैं क्या ?

और हाँ
कन्यादान पर वो स्पर्श 
जब तुम्हारा हाथ 
मेरे हाथों में रखा था 
स्वयं को सौंप दिया हो जैसे 
पूरी विस्वसनीयता के साथ
प्रवाहित होते गंगा जल
उद्बोधित होते मंत्रोच्चारण
और शगुन के गीतों के मध्य
वो पावन स्पर्श 
आज भी अनुभूतित 
होता तो होगा न अब भी 
कैसा सुख हैं 
किसी के हो जाने में 
मन वचन और कर्म से 
अविस्मृत होने वाला 
वो मात्र कन्यादान नही था 
निश्चय ही 
किसी प्रतिक्षु, याचित की झोली में 
विगत जन्मों के सुकर्मों का 
फल था जैसे 
की जैसे किसी देव ने 
तथास्तु कह 
सौंप दिया हो 
आशीर्वचन में 
ताउम्र के लिए

और फिर 
सप्तपदी तक आते आते 
दिसंबर का शीत
अपने चरम पर था 
पर तुम दहक सी रही थी
देदीप्तमान होती हुई 
अग्निकुंड के उजाले में
देवसुता सी तुम 
गठबंधन का वो दायित्व 
आज भी गुंठित हैं तुममें 
सहर्ष और ससम्मान भी
कांधे पर रख कर हाथ 
तब तो बस 
सात कदम भर थे 
पर जन्म जन्मांतर तक 
साथ चलने का व्रत लिए 
देखो
कितनी दूर चली आई हो आज
चलोगी न जन्मांतर के पार भी 
हर युग हर जन्म में
बोलो तो ...

तब तुमने 
अपने बचपन 
अपने घर आंगन 
साथी संबंधियों को 
कहा था विदा 
सजल नेत्रों से
 बरबस ही
एक नए संसार को 
गले लगाने के लिए 
किसी अपने के 
हमकदम होने के लिए 
नए अभिवादन, नए कलेवर 
और नए संबोधन के साथ 
खुद को इतर रख
सोचता हूँ 
तुम्हारे इस  ऋण से 
उऋण,  
हो पाऊंगा कभी क्या !!

अच्छा सुनो 
वो तो याद होगा न 
वो सुबह
वो जाड़ों की अलसाई सी सुबह
कुछ जियादा ही 
सर्द हो चली थी 
भविष्य की गुनगुनाहट 
महसूस होने लगी थी
और तुम्हारे कदम 
झंकृत हो रहे थे 
मेरे आंगन में 
हर कोई देखने को आतुर 
एक नजर तुम्हारी 
घर का हर कोना, हर गोशा
जैसे तुम्हारी ही राह देख रहा था 
हर दिया रोशन था 
हर द्वार 
स्वागत में बिछा हुआ सा 
सपरिवार

और वो रात
नई नवेली सी 
कुछ शरमाई
और सकुचाई सी
गुलाबों की खुशबू से सराबोर 
मखमली स्पर्श लिए
वो रात 
और खिड़की के पार 
महका हुआ सा चाँद
तुम्हारी झलक को आतुर 
आनंदित सा 
जैसे हजार रातों की 
उम्र लिए हो
सपनीले दिनों की आहट 
और उम्मीदों की नई 
कोपलें लिए हो
याद हैं न ...

हाँ मुझे 
मुझे तो सब कुछ याद हैं 
क्षण प्रतिक्षण 
पल प्रतिपल 
और सुनो
तुम आज भी 
वैसी ही हो
नव्या सी 
दुल्हन हो जैसे चिर परिचित
सकुचाई शरमाई सी 

शुक्रिया ...
कह दूं न फिर 
अर्धांग होने के लिए
😊😊
सालगिरह मुबारक हो सीमा जी 

हरीश भट्ट

शिफॉन की साड़ी

शिफॉन, (साड़ी मात्र परिधान नही हैं अलंकार हैं )

सुनो, 
शिफॉन की ये 
कत्थई रंग की साड़ी 
ऐसे लिपटी हैं तुमसे 
जैसे किसी 
अवयस्क गुलमोहर से लिपटी 
कोई द्रुमलता
की जैसे 
डूबते सूरज 
की लालिमा को 
अपने आगोश में लिए 
क्षितज पर 
साँझ का धुधलका 
पता ही नहीं चलता की 
साड़ी में तुम हो 
या की तुम में साड़ी 
कैसे अंगीकृत कर लेती हो 
इतनी सहजता और 
सलीके से एकवस्त्र को 

आश्चर्य  की 
नो गज का ये घेर 
कैसे सिमट जाता हैं 
अप्रतिम काया में 
इतनी शालीनता  से
एकाकार हो 
नख से शिख तक 
विस्तार को जैसे 
मोहित कर 
एकत्रित कर लिया हो 
बांध दिया हो जैसे 
किसी उश्रृंखल नदी को 
रोक लिया हो जैसे 
किसी अल्हड़ झरने की 
फुहार को 
थाम लिया हो जैसे 
परिमल के पसार को 
बंधेज की कारीगिरी हैं 
की सम्मोहन तुम्हारा 

और उस पर 
मैचिंग 
शर्माए से कर्णफूल 
इतराई सी चूड़ियाँ 
खनखनाई सी पायल 
चाहचहाया सा मुक्ता हार
गर्वित सा तिलक 
कजराई सी आँखें  
ललायमान मस्तक 
दिग्भ्रमित करती मुस्कान 
दोनों कर्ण फलकों तक 
हैरान हूँ 
की साड़ी 
किसी भी रंग की हो 
ये सब से 
कैसे मैच हो जाते हैं  

सुना हैं 
काँधे से छिटका हुआ 
तुम्हारा ये आँचल 
हवाओं का 
रुख तय करता हैं 
बल खाता हुआ सा 
सागर की लहरों सा 
बिंदास और आवारा  
पर उसी जुड़ाव  पर 
फिर फिर 
लौट के आने को आतुर 
सुनो 
सर पर रक्खा करो 
इस बेशर्म को 
कोने से दबा कर 
बगावत न करदे वरना 

सोचता हूँ 
की साड़ी और तुम्हारा 
चिरयौवन सा  साथ हैं 
जन्म जन्मान्तर का
चिर बंधन हो जैसे 
अनुबंध हो 
भव्यता का 
और दिव्यता का 
मौसमों की तरह 
हर रंग बिखर जाता हैं तुमपे 
हर भाव 
समभाव में होते हुए भी 
निखर जाता हैं 
जब 
सिमट आती  हो तुम 
शिफॉन की 
करीने से लिपटी 
मादकता में  

सुनो 
बताओ तो जरा 
आज 
कौन सा अलंकार
पहना हैं तुमने ??

(चित्र साभार सीमा हरीश भट्ट की वाल से )

-हरीश भट्ट-

मुस्कुराहट

शुभ प्रभात 
""मुस्कुराहट""

 सुनो 

ये जो तप्त 
लहरावदार 
सुर्ख 
पनियाली 
नारंगी की फांकों सी
रक्तिम 
मेहराबें हैं न 
तुम्हारे चेहरे पे 
कान के 
इस सिरे से 
उस सिरे तक 
खींची हुई 

जैसे किसी ने 
तराश दी हो 
कोई गजल 
या की बिछा दी हो
एक हिलोरदार लहर 
चाशनी में 
पगी हुई
गुदाज़ गालों के बीच 
अनियंत्रित सी 

जैसे शाम के धुंधलके में 
सुरमई 
चांदनी रात में 
किसी कश्ती का
कोई घुमावदार 
अक्स 
पड रहा हो 
दरियाह में 
जैसे कोई चातक
जन्म जन्मांतर की
प्यास लिए हो 
स्वाति नक्षत्र की 
बूंदों के लिए 

अपने होंठों की 
तपिश को 
सुलगाये रखना 
उदासी के अंधेरों 
में खिलखिलाने 
का सबब हैं ये 
इन की गर्माहट 
शुष्क ठंडी रातों का 
सामां होगी 

जब कभी 
उदासियों का मरुस्थल 
घेर लेता हैं मुझे 
तब 
महसूस होती हैं
इन पंखुड़ियों की 
तपिश 
और इनकी 
मृदुल नमी 
तब 
निर्जर बंजर भूमि 
मन की 
लहलहा उठती हैं

सुनो 
हो सके 
तो ये सुर्ख गुलाब 
खिलाये रखना 
सदा ही 
इन मेहराबों पर 
सदा के लिए 
☺️☺️
तो आप भी मुस्कुराते रहिये ...😊😊💐💐
हरीश भट्ट 
--

चॉकलेट्स

चॉकलेट्स ..

चॉकलेट्स
बहुत पसंद थी उसे 
मुझे भी 
मुझे क्यों ​?​
पता नही ...शायद
क्योंकि उसे पसंद थी 
हालांकि 
कभी खाई नही मैंने

मजा आता था 
उसे खाने में ​
और मुझे 
उसे खाते देखने में
बात शुरू करने का 
शायद 
तरीका ही ये हो गया था  
सुनो 
चाकलेट खाओगी 
....लाये हो 
......आज भी 
वो मासूमियत से 
खिल जाती थी
याद नहीं 
कभी मना  किया हो उसने 
​मुझे तो ​..कभी नहीं  
पिघले हुए 
कोको का स्वाद 
ऐसे भी सर चढ़ के 
बोलता होगा 
सोचा नही था 

कहा न 
चॉकलेट्स 
बहुत पसंद थी उसे 
इसीलिए शायद 
उसकी बातें भी 
चाकलेट जैसी ही थी 
मन में घुल सी जाती थी 
मिठास के साथ 
ऊपर से सख्त 
पर
प्रणय की उष्णता 
जिसे पिघला ही देती हैं 
और वो दहक उठती थी
लावे की तरह

जाने क्यों वो
सभी चाकलेटस के रैपर  
संभाल लेती थी 
अपने पर्स में
अजीब था न
रैपर्स से भला 
क्या लगाव होगा उसे 
उसने लिक्खा था 
हर एक रैपर पर 
उस दिन की तारीख
और उस दिन का नाम 
तोहफों की तरह 
पागलपन था शायद
या की मुहब्बत
तब मुझे लगता था 
कि वो एक चाकलेट हैं 
और मैं... उसका रैपर
तब
मेरे पास होती थी 
बहुत सी  चाकलेट​
मेरे कबर्ड में 
स्टडी टेबल की ड्रा में
जैकेट की जेब में  
कॉलेज के बैग की 
साइड वाली पॉकेट में 
स्कूटर की डिक्की में 
स्वप्नीले से रैपर वाली 
चॉकलेट्स
पता नहीं क्यों 

वो 
उन दिनों की बात थी 

चाकलेट खरीदे
जमाना हो गया अब 
ये इन दिनों की बात हैं 

हरीश भट्ट

मोगरे की खुशबू ....

ओपिडी में आज भीड़ कुछ जियादा ही थी 
अपनी बारी के इन्तजार में विजिटर बेंच पर बैठे बैठे मैंने सोचा और टाइम पास के लिए मोबाइल खोल कर मैसेज  देखने लगा 
"क्या में यहाँ बैठ सकती हूँ"  
"जी" मैंने उसे बिना देखे ही जरा सा सरक कर कहा
मोबाइल  से नजर तब भटकी जब भीनी सी मोगरे की ख़ुशबू के झोंके ने ध्यान अपनी तरफ खीचा...  मोटे तल्ले वाली चप्पल करीने से तराशे हुए पैर के नाखूनों पर चम्पई सा नेलपेंट पतली सी पाजेब मेचिंग बिछुओं के साथफिरोजी रंग के सूट पर छींट का दुपट्टा अमलताश की फलियों सी उँगलियों के पोर... और  भरी भरी कंपकपाती हथेलियाँ, हथेलियों में पकड़ा हुआ डा. मीनाक्षी अग्रवाल का परचा... तिरछी  निगाह से बस इतना ही देख पाया था तब..
लगा ....कहीं तो देखा हैं... पर कहाँ.. मन में कई चित्र चित्र से तैर गए  

सीने का दर्द कुछ हल्का होता महसूस हुआ, मेरा नंबर पुकारा जा रहा था इसलिए मैं  उठा और सीधा डाक्टर के केबिन में घुस गया सामान्य चेकअप के बाद पांच दिन की दवा और फिर दिखाने की एहतियात लिए बाहर निकला 
वापसी पर निगाह बेंच की तरफ डाली  पर शायद उसका  भी नंबर आ चुका था 
पूरे हफ्ते फिर ये बेजा ख्याल दबे क़दमों ज़हन में  आता रहा की जाने क्या हुआ होगा उसे 
शनिवार शाम को ही ऑफिस में नेहा  का फोन आ गया याद दिलाने के लिए की आज डाक्टर को दिखाते हुए आ जाना तबियत ठीक थी पर फिर भी कदम क्लिनिक तक पहुच ही गए हर तरफ वही ज़र्द बीमार चेहरे हाथों में परचा लिए पेथोलोजी और एक्सरे पकडे हुए ......नेहा ... बताना ही भूल गया मेरी धर्मपत्नी
खाली बेंच की तरफ नज़र दौड़ते हुए मैंने भी परचा जमा करवा कर खुद को एक सीट के सुपुर्द कर दिया 
अचानक याद आया की हर मरीज आज रिपीट हुआ होगा हर एक को पांच दिन के बाद दिखाना होता होगा तो क्या ....तभी एक पहचानी सी आवाज सुनाई  दी ..."एक्सकिउज  मी क्या यहाँ कोई बैठा हैं" ...जी नहीं... इतना ही कहा था मैंने और तभी  मोंगरे की भीनी खुशबू ने अपना तार्रुफ़ दे दिया था ...उस दिन फिरोजी था और आज सलेटी सा कलर का सूट.... बदरंग सा वार्डरोब रहा होगा शायद उसका 

उसके मोबाइल के वाल पेपर पे गहराती शाम का मंजर शायद उसके चेहरे पे भी उतर आया था ....हाँ इस बार देख पाया था मैं वो चेहरा तीसरे दिन के गुलाब के मानिंद कुम्हलाया सा चेहरा सुतवा नाक कोरे कोरे से होंठ.... ये बड़ी बड़ी सूनी सूनी सी ऑंखें छोटी पर सपाट बिंदी कानों में लापरवाह से झुमके करीने से संवरे बाल कानों के पास कुछ एक पक चुकी सुनहली सी बालियाँ  क्लचर में कसमसा के जकड़े हुए बाल  कुछ छूट गए थे  तो कानों के पास से निकल गालों को सहला से रहे थे ...कहीं तो देखा हैं....सोचा पूछ लूं क्या हुआ हैं पर उसकी ऑंखें फर्श की टाइल को कुरेदती हुई सी स्थिर थी बस  कोई मौका नहीं था सिलसिला होने का... कुछ तो रोक रहा था उसे
इसे आप दूसरी मुलाकात कह सकते हैं 
अचानक खांसी  का धसका उठा और वो बैचैन हो उठी मैंने अपने ऑफिस बैग  से पानी की बोतल उसकी तरफ बढ़ाते हुए कहा ....”पी लीजिये”...एक बारगी मना  किया था उसने पर शायद जरूरत थी तो दो घूँट उड़ेल लिए अब कुछ ठीक था शुक्रिया कह के बाटल वापस की थी उसने 
""आपके साथ कोई हैं नहीं"" सांसों को संयत होते देख पूछा था मैंने
इनकार में गर्दन  हिली और फिर एक ख़ामोशी सी छा  गई 
“क्या प्रोब्लम हैं आपको” ...बातों का सिलसिला बढ़ाते हुए पूछा था मैंने ...”अस्थमा ..” अपनी तरफ से कम से कम शब्दों में जवाब देने की कोशिश थी उसकी ...इससे पहले की मैं कुछ और कहता उसका नंबर आ चूका था और कुछ देर बाद मेरा भी 
क्लिनिक से निकलते हुए सोच रहा था की इतने मरीज थे वहां फिर उसके विषय में इतनी जिज्ञासा क्यों ... कहीं तो देखा हैं... पर कहाँ 
अगला हफ्ता भी धीरे से सरक गया पर ज़हन से मोगरे की खुशबू निकल ही नहीं पाई 
शनिवार को जल्दी आफिस  से निकल गया था कोई काम नहीं था न डॉक्टर का अपोइन्टमेंट 
बस एक जिज्ञासा हास्पिटल का पूरा  कारीडोर भरा था खाचा खच पर वो नहीं थी वहां मोगरे की महक भी नहीं सिर्फ दवाइयों की गंध थी हर जगह 
शायद अब डॉक्टर की जरूरत न हो चलो अच्छा ही हुआ सोचता हुआ में बाहर निकल ही रहा था की किशोर ...हाँ किशोर ही तो था ...”अरे किशोर पहचाना में अमित” ...अचकचा कर देखा था उसने पहचानने की जद्दोजहद में 
“अरे अमित कैसे हो यार इतने दिन बाद कहाँ हो आजकल” .....किशोर और में स्कूल में एक साथ थे कभी इंटर साथ  किया था हमने ...”हाँ में ठीक हूँ ,मैं तो हरिद्वार ही हूँ तबसे तुम बेंगलोर  थे न” 
 हाँ... किशोर ने कहा अभी पिछली कंपनी में रिजाइन किया हैं तो कुछ दिन के वेकेशन पर हूँ अगले महीने दुबई जा रहा हूँ एक नया जॉब देखा हैं और सुनाओ तुम यहाँ हॉस्पिटल में कैसे 
“बस यार ऐसे ही डाक्टर से मिलने आया था बीपी ठीक नहीं रहता तो कंसल्टेशन के लिए आ जाता हूँ तू बता तू यहाँ कैसे सब ठीक तो हैं” 
“बस ऐसे ही यार सब ठीक हैं अच्छा मिलता हूँ” ..किशोर जल्दबाजी में था 
“हाँ ओके घर आना मैं अब भी वही रहता हूँ याद हैं स्कूल के दिनों में कितना आते थे  तुम लोग” 
“अब तो सब बिखर गए ...ओके ये मेरा मोबाइल नंबर हैं मुझे मिस्काल मार देना में सेव कर लूँगा” ...“ओके बाय”
“अमित” ....पीछे से आवाज लगाईं थी किश्जोर ने “अरे तुझे मिनल याद हैं” ....”कौन मिनल” ....
“वो फिरोजी स्कार्फ वाली 10थ बी तेरा झगडा हुआ था जिससे  .....
“हाँ हाँ वो साइंस ले ली थी न जिसने...क्यों क्या हुआ” 
“उसी को देखने आया हूँ चार  दिन से एडमिट हैं यहाँ” 
“अरे क्या हुआ उसे” अचकचा कर पूछा था मैंने ...”लंग केंसर वो भी आखरी स्टेज पे हैं”  
“ओहो ..अरे कैसे” ....आँखें फ़ैल सी गई थी मेरी और आवाज कपकपाने  लगी थी ....”अच्छी लड़की थी यार ...पर वो यहीं रहती थी  क्या ...”
“नहीं उसकी  शादी तो  पालमपुर हुई थी पर उसके हज्बेंड  ने डिवोर्स दे दिया था तब से यही हैं कई साल से”...बताया किशोर ने 
“अच्छा  कमाल  हैं कभी मुलाकात नहीं हुई चल ठीक हैं तू  मिल मैं निकलता हूँ” ...सीने में कुछ भारीपन सा महसूस होने लगा था 
“तू नहीं मिलेगा “..किशोर ने कहा ...
“मैं ...मैं अब क्या मिलु उससे मैं तो उसे पहचानता भी नहीं ..और कुछ काम भी हैं” 
“झूठ ...झूठ  मत बोल यार मुझे पता हैं  तुम्हारे बारे में मीनल  ने मुझे बताया था बस मुझे ही बता पायी वो आज तक “..किशोर की आवाज में तेजी थी 
“क्या बताया ...ऐसा कुछ नहीं हैं..मैं तो मिला भी नहीं उससे...” सीने का भारीपन बढ़ने लगा था अब  
“बकवास मत कर यार ...तू बुजदिल हैं तेरी वजह से ...क्या कहूं कुछ कह भी नहीं सकता ....... वो मर रही हैं अमित एक बार बस आखरी बार तो मिल ले उससे .सकून से जी नहीं पायी कम से कम सकून से मर तो पाएगी ....मुझे तो लगा था तू उसे ही मिलने आया होगा ...”
“बकवास में कर रहा हूँ या तुम ...प्लीज़ ऐसा मत बोल यार ...” पास ही पड़ी  बेंच पर खुद को रख लिया था मैंने 
“झूठ तो उसने बोला मुझे... की अस्थमा हैं उसे वो अन्दर ही अन्दर घुट रही थी और मैं बुजदिल नहीं था ..कभी नहीं ....पूछ उससे ...एक वादे की जंजीर से जकड़ा  हुआ हैं उसने” "की जब भी मिलेंगे तो अजनबियों की तरह " “वरना क्या बेगानों  की तरह यहाँ हॉस्पिटल आता उसे बस एक नजर भर देखने के लिए ...” बड़ी मुश्किल से कह पाया था मैं
“था तू बुजदिल ...आई थी न वो तेरे पास जब उसकी शादी तय हुई थी कहा था न उसने एक अलग दुनिया बसाने  के लिए” ..किशोर की बातों में गुस्सा दिखने लगा था .
“हाँ कहा था पर.... कैसे ...अपने और उसके परिवारों की खुशियों को रोंद कर न ...और ...छोड़ यार चलता हूँ ...नहीं मिलना हैं मुझे” 
“प्लीज अमित तू नहीं मिलता आज यहाँ तो कोई बात न थी पर अब जब तू यहाँ आ ही गया हैं तो एक बार मिल ले मेरी खातिर” 
“ठीक हैं चल” ..और मैं  उठ कर किशोर के पीछे पीछे हो गया ..आगे जाने की लालसा तो थी पर हिम्मत नहीं थी मन एक अजीब सी आशंका में घिर गया था
रूम नंबर १४ अन्दर घुसते ही मोगरे की खुशबू सांसों में भर गयी थी वो सो रही थी शायद करवट लिए हुए पास ही उसकी बेटी हाँ बेटी ही रही होगी नक्श तो यही कहते थे ...”नमस्ते”  कह के उसने धीरे से आवाज दी "मम्मी  " 
“रहने दो मत जगाओ सोई होगी” किशोर ने कहा 
“नहीं ...जग रही हैं ..मम्मी   देखो किशोर अंकल आये हैं...मम्मा...मम्मा” 
आँखें शायद बंद थी ...नहीं खुली न  जागने वाली नींद में खोयी हुई मीनल ने अपना वादा निभा दिया था जानते हुए भी अनजान बने रहने का मिल के भी कभी न  मिलने का किशोर पागलों की तरह उसे झकझोर रहा था 
मैं रूम से बाहर निकल आया था बैचैन सा सीना लिए... कुछ वादे क्या कोई ऐसे भी निभा पायेगा ....और इस हद तक 

हरीश  भट्ट 

Tuesday, October 8, 2019

वेदना के स्वर - गीत

वेदना के स्वर  जब अपने ही देश को धिक्कारते हैं लोग

आभावों मैं जीने वालों ....क्यों इतना पछताते हों ।
क्यों ओरों की चकाचौध में, अपनी रात छुपाते हो ।।
आभावों मैं कौन नही हैं,, कौन यहाँ परिपूर्ण कहों ।
मानव हो ओर मानवता का, ह्रास हुआ बतलाते हों ।।

जिस धरती पर जन्म लिया, जिस माटी में तुम खेले ।
जिस भूमि पर लगते हैं, हर बरस चिताओं पर मेले ।।
उस मिट्टी को गाली दो ये हरगिज भी स्वीकार्य नही ।
सम्मान नही दे पाये तो अपमान काभी अधिकार नही ।

कुछ तो सीमा पर हरदम ही, बस आग लगाये बैठे हैं ।
कुछ अपने हैं अंदरखाने, जाने किस बात पे रूठे हैं ।।
जिसको देखो बात बात पर, हमको आँख दिखता हैं ।
और विदेशी मंचों पर वो,, व्यर्थ ही गाल बजाता हैं ।।

पर कितने भी प्रतिबंध लगालो, टीका चंदन रोली पर ।
जितने चाहे बम फोड़ो तुम,, ईद दीवाली होली पर ।।
फर्क नही पड़ता हैं लेकिन, चाहे जान लड़ा लो तुम ।
गद्दारों का नाम लिखा हैं हर देशभक्त की गोली पर ।।

इस देश को जिंदा रखने को जो, रक्त के आंसू रोया हैं ।
इस गुलाम के लांछन को,, जिसने मस्तक से धोया हैं ।।
वो तो शहीद हो गया वतन पर, अबकी तुम्हारी बारी हैं ।
तुमने तो सबकुछ पाया हैं उसने सब कुछ ही खोया हैं ।।

माना की देश के माथे पर,, अभी चंद लकीरे हैं गहरी ।
माना कि भ्रष्ट हैं तंत्र और, सरकार भी हैं गूंगी बहरी ।।
पुरुषार्थ मगर मंगल हेतु, सब को करना पड़ जायेगा ।
देश का मंगल करने को,, कोई मंगल से नही आयेगा ।।

जय भारत जय भारती..
हरीश भट्ट

नजरिया -

नमस्कार दोस्तों ...शुभरात्रि
सोचता हूँ
कुछ नजरिये
तह कर के रख दूं
अंदर वाले
संदूक में
चलन से
बाहर हो चुके
कपड़ों के साथ
दृष्टिकोण के कोंण
मिटा कर
पाट दूं
सार्वजनिक
स्वीकार्यताओं से
वैचारिकता को
थोप लूँ
खुद पर
तुम्हारे स्वयं के
आंकलित
पूर्वाभासों को
और कुछ आग्रहों  को
जिन्हें तुम
पूर्वाग्रह कहते हो
मुझे आंकलित करते हुए
तिलांजलि दे दूं
छोड़ दूं
खुद को
किस्मत के हवाले
रफ्ता रफ्ता
आदत पड़ जाने तक
भीड़ का चेहरा होना ही
भीड़ का हिस्सा होना हैं
मान कर
सोचता हूँ संकल्प ले
तर्पण कर दूं
आज ही
तथाकथित
अपने प्रति
तुम्हारे दुराग्रहों का
तिलांजलि दे दूं
हृदयगत संबंधों को
सीख लूं चलन
समायोजनाओं में
जीने का
तलाश लूं
बीच के रास्ते
कुछ पगडंडियां
कुछ रिश्ते
कुछ वास्ते
तुम कहो तो
संवेदनाएं टांक दूं
व्यस्तताओं की खूंटी पर
वेदनाएं ओढ़ लूं
मेटीरियलिस्टिक सी
प्रेक्टिकल अप्प्रोच
मुखोटों की तरह
सहज न हो भले
तो क्या
आकर्षण तो होगा न
विकर्षण भी
क्यों न
ढूंढ लू
तुम्हारे वाला शब्दकोश
जिसमें
भाव-समभाव
वेदना-संवेदना
आवेश-भावावेश
प्रेम-स्नेह और विवेक
जैसे शब्द न हो
और जो हों
उनके कई कई
अर्थ निकल जाते हों
सहूलियत के हिसाब से
पारिस्थितिक और
मान्यता के हिजाब में
सोचता हूँ
अपेक्षाएं जमा कर दूं
पीछे के स्टोररूम में
उपेक्षाओं की
और कांटेदार
जिल्त चड़ा लूं
चेहरे पर
भरपूर
नाटकीयता के लिए
चेहरे पे चेहरों का होना
शायद
जरूरत बन गई हैं
एकमात्र शक्लें
संदेहग्रस्त हो जाती हैं
अमान्य भी
मित्र जब तुम
ऐसा सोचते हो
तो अगर मैं भी
तत्सम ही
सोचता हूँ
तो
कहो जरा
क्या गलत सोचता हूँ ??
हरीश भट्ट

समर्पण - एक लघु कथा

देहरादून के गढ़वाल विकास निगम का वह कांफ्रेंस हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज रहा था मंच पर राज्य के सांस्कृतिक विकास मंत्री श्री परमार जी ने अपना उद्बोधन देना शुरू किया ...."मुझे ख़ुशी हैं और गर्व भी,.. इस साल का संस्कृति रत्न पुरुस्कार श्री अनिरुद्ध डबराल जी को देते हुए ...आज  इनके काव्य संग्रह "अंतस " का विमोचन करते हुए मुझे अत्यंत हर्ष हो रहा हैं...इतनी कम उम्र में ऐसा प्रखर सृजन......... ""
....और हाल एक बार फिर तालियों की गड़गड़ाहट से भर गया....
अनिरुद्ध की आंखे स्टेज पर खड़े खड़े डबडबा आई थी ....आज उसका सपना जो साकार हो रहा था ...चिर प्रतीक्षित सपना ...उसकी पिता जी कि आँखों में चमक बड़ गई थी... बढ़ा आयोजन था...सब दोस्तों कि नजरें  आज अनिरुद्ध पर ही थी ...और जब अनिरुद्ध ने अपनी पुस्तक से कविता के  कुछ अंश पढने शुरू किये...
अंतस तक प्यासी हैं धरती
आओ अम्बर को बतलाये ....
तब..तब वहीँ तो थी कादम्बिनी  हॉल के दूसरे दरवाजे कि ओट  में ....हजारों बार सुनी थी उसने यह कविता अनु के मुह से ...तब उसे लगता था जैसे धरती कि नहीं यह उसकी स्वयं कि बात हो...."अंतस तक प्यासी हैं धरती.....(हाँ वह प्यार से अनिरुद्ध को अनु ही कहती थी)
कुछ दिन पहले  कि ही तो बात हैं .....
""अनिरुद्ध ""....बहुत दिन से तुमने कुछ नया नहीं लिखा...... पूछा था कादम्बनी ने...एक सकून भरी मुस्कराहट के साथ कहा था अनिरुद्ध ने...नहीं कादम्बनी कुछ नया लिखने का मन नहीं ...मेरे अन्दर से तब कुछ उत्सर्जित होता   हैं  ..जब में अकेला  होता हूँ ...दर्द और बेचैनी निकल ही आती हैं वर्कों पर ...लेकिन ...तुमसे मिलने के बाद सब कुछ पा लिया लगता हैं मेरी तलाश ख़त्म हुई...
"लेकिन अनिरुद्ध तुम्हारे सपने...तुम चाहते थे न कि तुम्हारा काव्यसंग्रह....."" ...
"ओहो....कादम्बिनी ...तुम हो ना मेरा काव्य संग्रह...आओ कहीं काफी पीते हैं"
"पर अनिरुद्ध तुम्हारा सपना मेरा भी तो हैं ..में तुम्हे आगे बढ़ते देखना चाहती हूँ जरूरी तो नहीं केवल मिलन और विछोह के ही गीत लिखे जाये...खुशियों के पल भी तो हैं सामाजिकता ..संस्कृति..."
"प्लीज़ कादम्बनी ...सुबह सुबह ..क्यों मूड ख़राब कर रही हो ..तुम्हारी दोस्ती मुझसे हैं या मेरी रचनाओं से.".कसक कर कहा अनिरुद्ध ने
"" नहीं अनु ..तुमसे तो हैं पर ..तुम्हारी रचनाओं  में  मेरा जीवन बसता  हैं....  तुम्हारी रचनाओं कि नायिकाओं में मैं खुद को तलाशती हूँ ...रख के देखती हूँ खुद को ...""
""हहहहहः ....क्या कादम्बनी ...तुम भी न...अरे कल्पनाओं कि नायिका और तुममे बहुत फर्क हैं " ... हँसते हुए कहा था अनिरुद्ध ने
"वो तो अतीत हो जाती हैं ...पल में ओझल ..पर..पर तुम तो मेरा वर्तमान हो...तुम से तो मैंने जीना सीखा हैं ....अच्छा  ..सुनो...प्लाजा में नई फिल्म लगी हैं ... शाम को चलते हैं ...वहीँ रेस्तरां  में कुछ खा लेंगे.." और हाँ तुमने वादा किया हैं कि कल तुम अपने घरवालों से बात भी करोगी "
"नहीं अनु...आज मुझे कुछ काम हैं में चलती हूँ . बाय " अनमने ही उठ खड़ी हुई थी कादम्बिनी
घर लौटते हुए कादम्बिनी  के चेहरे पे उदासी थी ...वह सोच रही थी ...कि कैसे अनिरुद्ध को बताये कि उसकी बातों में उसकी रचनाओं में एक अलग बात हैं ...वह अच्छा लिख सकता हैं ...इतना कि दुनिया उसे पढ़े ... और उसे सर आँखों पे बिठाये
कादम्बिनी अनिरुद्ध को बचपन से जानती थी दोनों  एक दूसरे कि चाहत थे पर कादम्बनी कि नज़रों में प्यार के मायने अलग थे वो जब अनिरुद्ध कि आँखों में आगे बढ़ने का सपना देखती थी..जब उसके चेहरे पर भविष्य कि ख़ुशी कि झलक महसूस करती थी तो उसे लगता था कि शायद यही चाहत हैं उस खुशी उस सपने को पूरा करने में ही उसके प्यार का हक अदा हो जाये शायद
शाम गहरा गई थी आसपास भी और मन के अन्दर भी ...सोचते  सोचते ...घर भी नजदीक ही था...कुछ तो निश्चय कर ही लिया था उसने ..आखिर क्या ?
अल सुबह ही अनिरुद्ध का फोन आ गया ....
"हाय कादम्बिनी कैसी हो" ....."ठीक हूँ कहो कैसे फोन किया"
"कादम्बिनी याद हैं ना तुम्हे आज तुम आपने घरवालों से मेरे बारे में बात करोगी " आवाज में चमक थी अनुरुद्ध की
"..क्या मतलब ..कैसी बात .." कादम्बिनी सपाट थी
"अरे ...हमारे रिश्ते की बात  ...." चहका था अनिरुद्ध
""क्या बकवास कर रहे हो अनिरुद्ध ..एक दो बार तुम्हारे साथ घूम क्या लीया  तुमने मुझसे रिश्ता जोड़ लिया ...तुमने सोच भी कैसे लिया कि में तुमसे शादी करूंगी ....तुम सिर्फ दोस्त हो मेरे पर शादी ...में तुमसे शादी कभी नही करना चाहती थी "
मजाक कर रही हो ... अनिरुद्ध अभी भी बेअसर था किसी भी अनहोनी से
"तुम्हें मेरी बातें हमेशा मजाक ही लगती हैं न अनु कभी तुमने अपने आगे कुछ समझ भी हैं मुझे ....बस अपनी कविताओं की कपोल कल्पना हूँ न में तो आगे से कभी मुझे फ़ोन मत करना""
और...फोन काट दिया कादम्बनी ने ....उसकी आँखों में खारापन बड़ गया था और सीने में भारीपन भी ....
हाँ यही तो सोचा था उसने कल शाम घर वापस आते हुए गहराते अंधियारे में.. और कोई रास्ता नही था .......
और अनिरुद्ध जड़ होगया था ..सुन कर...उसने कादम्बिनी को मिलने की बहुत कोशिश की तो पता चला वह आपने मामा के यहाँ चली गई हैं ..हल्द्वानी ..किसी कोर्स के लिए...
छः माह बीत गए शायद....
कांफ्रेंस हाल से निकलते हुए बुक स्टाल से कादम्बिनी ने  अनिरुद्ध की कविताओं का संकलन खरीदा ..प्रथम पेज पर ही "दो शब्द .."पढ़ कर उसकी आंखे फिर से नम हो गई वह दौड़ रही थी पूरे वेग से घर की ओर...लिखा था ..
""एक स्नेहिल मित्र के अंतस को समर्पित.... ""
कौन जान सकेगा की ..क्यों उमड़ घुमड़ कर आये मेघ कभी कभी धरती को प्यासा छोड़ कर रुख बदल लेते हैं जबकि उनकी तृप्ति भी धरती को अंतस  तक भिगोने की ही हैं ...
कौन जान सकेगा...??
--
हरीश भट्ट

दुमदार दोहे ....

शुभ दुपहरिया दोस्तों
दुमदार दोहे ....

शाम सुहानी हैं मगर, विचलित हैं आकाश!!
नदियों में कलरव नहीं, मन में नहीं उजास!!
निपट एकांत का मारा ! 

वृक्ष नही वन में कहीं, जल विहीन हैं ताल!
सूनी सूनी गोद हैं, .........धरती हैं बेहाल!!
घटायें कब बरसेंगी !

तुझको क्या मैं नाम दूं ,राम कहूं रहमान !
घट घट तेरा वास हैं, ..पग पग तेरी शान!!
दरश को तरसे हैं मन ! 

हरि बिन पार न पावही, लाख करे तू टाल!
कर्म बिना पर गति नहीं, यह कैसा जंजाल  !!
वही अब पार लगाये !

कबहु प्रीत ना कीजिये, कठिन प्रीत की रीत !
ठेस लगे से गिर पड़े, ..ज्यों माटी की भीत !!
प्रीत की रीत बुरी हैं !    

देख सखी सुन ले जरा,.....बात जरा गंभीर !
प्रेम रोग सबसे बड़ा,  विकट बड़ी यह पीर !!
सखी री पछताओगी !

हो विमर्श हर बात पर, आपा काहे खोय !
मत का चाहे भेद हो, मन का भेद न होय!!
न तलवारे तुम खीचों !

मेरा दुख सब से बड़ा, सोचे ये दिन रात !
क्यों तू खुद को दोष दे, घर घर की हैं बात!!
यही हैं दुनियादारी !

बेटी ब्याह न दीजिये, .......देकर दान दहेज़!
जीवन भर सुख ना मिले, ज्यों काँटों की सेज़ !!
जेल जाओगे सुन लो !

हरीश भट्ट....

संस्मरण/विषय- शिक्षक दिवस


विधा -संस्मरण/विषय- शिक्षक दिवस
******************
सभी सदस्यों को शिक्षक दिवस की शुभकामनायें
एक प्रसंग याद आता हैं मुझे भी मैं उस समय १०वी कक्षा का छात्र था विज्ञान के विषय में जरा कमजोर भी ऊपर से बोर्ड की परीक्षा की तलवार भी थी लटकी हुई
केन्द्रीय विद्यालय संगठन ने उस वर्ष ये निर्णय लिया की छात्रों की त्रैमासिक परीक्षा इस बार इस तरह से हो की बोर्ड की परीक्षा का पैटर्न पता चल सके तथा कमजोर छात्रों को प्रेरित किया जा सके..
एक तो सभी छात्र बोर्ड, प्रीबोर्ड के नाम से पहले ही इतना खौफजदा थे उस पर त्रैमासिक परीक्षा का अजब अंदाज लिहाजा विज्ञान विषय में मेरी क्लास के तकरीबन सभी छात्र छात्राएं अनुतीर्ण रह गए ... 
वर्मा सर जो केमेस्ट्री पढाया करते थे एक तो वो पहले ही इतने स्ट्रिक्ट थे  रिजल्ट वाले दिन आते ही उन्होंने पहले तो पूरी क्लास की क्लास ली .. उसके बाद रही सही कसर अगले दिन सुबह असेम्बली में प्रिंसिपल सर ने पूरी कर दी जब पूरे स्कूल के सामने त्रैमासिक परीक्षा में पास न हो पाने वाले बच्चों को अलग से लाइन लगा कर खड़ा कर दिया गया 
जब मेरी कक्षा के कुछ बच्चों ने नया पैटर्न और स्ट्रिक्ट मार्किंग का हवाला दिया तो बांकी बच्चों को तो क्लास में जाने को कह दिया गया पर मेरी पूरी क्रातिकारी क्लास को सजा के तौर पर दिन भर अगस्त की चिलचिलाती धूप में खड़े रहने का फरमान अनुशाशन समिति की तरफ से सुना दिया गया
अब पूरी क्लास धूप में सुबह ७:३० से १० बज गए गर्मी से बेहाल अब गिरे की तब गिरे कभी वर्मा सर को कोसते कभी प्रिंसिपल सर को तो कभी परीक्षा पैटर्न को ..तभी वर्मा सर आते हुए दिखाई दिए हमें लगा फिर कोई आफत आ गई लगता हैं ...पर ये क्या ...वर्मा सर आये और सबसे आगे आ कर खड़े हो गए ..फिर उन्होंने पूछना शुरू किया क्या हुआ क्यों हुआ ..हमने बताया ..सर इस परीक्षा को ले कर इतना डर था की आये हुए जवाब भी नहीं लिख पाए क्योंकि सवाल घुमा फिर के पूछे गए थे ...
एक घंटा उसी तरह बीता ....वर्मा सर रिटायर्मेंट की एज पर थे पसीने से लथपथ वो भी धूप में खड़े रहे हमारे साथ ....प्रिंसिपल सर का अर्दली इस बीच आ के वर्मा सर से बात करके चला गया ..पर हमें कुछ समझ नहीं आया की माजरा क्या हैं सर यहाँ क्यों हैं ??
जब ११:३० पर प्रिंसिपल सर खुद आये और वर्मा सर को कहा की आप स्टाफ रूम जाइये दूसरी क्लास को भी पढ़ाना हैं ...तब वर्मा सर ने मजबूती और आत्मविश्वास से जो कहा मुझे आज भी अक्षरश याद हैं उन्होंने कहा ...

"सर इन बच्चों की सफलता या असफलता मेरी जिम्मेदारी हैं यदि ये पास नहीं हो पाए तो मैं भी फेल हो गया ...सो जो सजा इन्हें मिल रही हैं मैं भी उसमें बराबर का भागिदार हूँ इसलिए जब तक ये धूप में खड़े हैं मैं भी रहूँगा ...

आज याद करता हूँ तो आँख में आसूं आ जाते हैं ...एक स्ट्रिक्ट और कर्कश शिक्षक जीवन में ऐसे भी शिक्षा दे सकता हैं उस दिन पता चला ....प्रिंसिपल सर ने उसी समय सबकी सजा माफ़ की और सबको द्वीतीय तिमाही मैं मेहनत करने की सलाह दे क्लास में भेजा उन्होंने कहा जिन छात्रों का ऐसा डेडिकेटेड शिक्षक हो वो बोर्ड क्या जीवन  की किसी परीक्षा में फेल नहीं हो सकते  ...
ऊपर से कठोर दिखने वाला नारियल समान अंतर्मन से कितना संवेदनशील हो सकता हैं उस दिन पता चला ..नतीजा बोर्ड परीक्षा में हम सब पास थे 

ऐसे थे हमारे शिक्षक ..आज भी बहुत सी बातें हैं स्कूल के समय की जो हमेशा याद आती हैं

हरीश भट्ट

विधा गजल ........विषय- बह्र (2)


विधा गजल ........विषय-  बह्र (2)
गजल में मात्रा गणना (तक्तीय )

पिछले अंक में हमने गजल की तक्तीय के लिए कुछ बुनियादी बातों पर चर्चा की थी  आज हम इसी विषय पर आगे चर्चा करेंगे
बा-बह्र ग़ज़ल लिखने के लिए तक्तीअ (मात्रा गणना) ही एक मात्र उपाय है, यदि शेर की तक्तीअ (मात्रा गणना) करनी आ जाय  तो देर सबेर बह्र में लिखना भी आ जाएगा क्योकि जब किसी शायर को पता हो कि मेरा लिखा शेर बेबह्र है तभी उसे सही करने का प्रयास करेगा और तब तक करेगा जब तक वह शेर बाबह्र न हो जाए
मात्राओं को गिनने का सही नियम न पता होने के कारण ग़ज़लकार अक्सर बह्र निकालने में या तक्तीअ करने में दिक्कत महसूस करते हैं छंद में मात्रा गणना और गज़ल में तक्तीय करते समय कुछ छोटे  छोटे अंतर आ जाते हैं उन पर भी चर्चा करेंगे
ग़ज़ल में सबसे छोटी इकाई 'मात्रा' होती है अतः  तक्तीअ प्रणाली को समझने के लिए सबसे पहले मात्रा से परिचित होना होगा -
ये तो आपको पता ही हैं की मात्रा दो प्रकार की होती है
१- ‘एक मात्रिक’ इसे हम एक अक्षरीय व एक हर्फी व लघु भी  कहते हैं और १ से दर्शाते हैं  
२= ‘दो मात्रिक’ इसे हम दो अक्षरीय व दो हरूफी व दीर्घ भी कहते हैं और २ से  दर्शाते हैं
एक मात्रिक स्वर अथवा व्यंजन के उच्चारण में जितना वक्त और बल लगता है दो मात्रिक के उच्चारण में उसका दोगुना वक्त और बल लगता है
ग़ज़ल में मात्रा गणना का एक स्पष्ट, सरल और सीधा नियम है कि इसमें शब्दों को जैसा बोला जाता है (शुद्ध उच्चारण)  मात्रा भी उस हिसाब से ही गिनाते हैं
जैसे - हिन्दी में कमल = क/म/ल = १११ होता है मगर ग़ज़ल विधा में इस तरह मात्रा गणना नहीं करते बल्कि उच्चारण के अनुसार गणना करते हैं | उच्चारण करते समय हम "क" उच्चारण के बाद "मल" बोलते हैं इसलिए ग़ज़ल में ‘कमल’ = १२ होता है यहाँ पर ध्यान देने की बात यह है कि “कमल” का ‘“मल’” शाश्वत दीर्घ है अर्थात जरूरत के अनुसार गज़ल में ‘कमल’ शब्द की मात्रा को १११ नहीं माना जा सकता यह हमेशा १२ ही रहेगा
‘उधर’- उच्च्चरण के अनुसार उधर बोलते समय पहले "उ" बोलते हैं फिर "धर" बोलने से पहले पल भर रुकते हैं और फिर 'धर' कहते हैं इसलिए इसकी मात्रा गिनाते समय भी ऐसे ही गिनेंगे
अर्थात – उ+धर = उ १ धर २ = १२
मात्रा गणना करते समय ध्यान रखे कि -
१ - सभी व्यंजन (बिना स्वर के) एक मात्रिक होते हैं
जैसे – क, ख, ग, घ, च, छ, ज, झ, ट आदि १ मात्रिक हैं
  २ - अ, इ, उ स्वर व अनुस्वर चन्द्रबिंदी तथा इनके साथ प्रयुक्त व्यंजन एक मात्रिक होते हैं
जैसे = अ, इ, उ, कि, सि, पु, सु हँ  आदि एक मात्रिक हैं
  ३ - आ, ई, ऊ ए ऐ ओ औ अं स्वर तथा इनके साथ प्रयुक्त व्यंजन दो मात्रिक होते हैं
जैसे = आ, सो, पा, जू, सी, ने, पै, सौ, सं आदि २ मात्रिक हैं
  ४. (१) - यदि किसी शब्द में दो 'एक मात्रिक' व्यंजन हैं तो उच्चारण अनुसार दोनों जुड कर शाश्वत दो मात्रिक अर्थात दीर्घ बन जाते हैं जैसे ह१+म१ = हम = २  ऐसे दो मात्रिक शाश्वत दीर्घ होते हैं जिनको जरूरत के अनुसार ११ अथवा १ नहीं किया जा सकता है
जैसे – सम, दम, चल, घर, पल, कल आदि शाश्वत दो मात्रिक हैं
४. (२) परन्तु जिस शब्द के उच्चारण में दोनो अक्षर अलग अलग उच्चरित होंगे वहाँ ऐसा मात्रा योग नहीं बनेगा और वहाँ दोनों लघु हमेशा अलग अलग अर्थात ११ गिना जायेगा
जैसे –असमय = अ/स/मय = अ१ स१ मय२ =११२     
असमय का उच्चारण करते समय 'अ' उच्चारण के बाद रुकते हैं और 'स' अलग अलग बोलते हैं और 'मय' का उच्चारण एक साथ करते हैं इसलिए 'अ' और 'स' को दीर्घ नहीं किया जा सकता है और मय मिल कर दीर्घ हो जा रहे हैं इसलिए असमय का वज्न अ१ स१ मय२ = ११२  होगा इसे २२ नहीं किया जा सकता है क्योकि यदि इसे २२ किया गया तो उच्चारण अस्मय हो जायेगा और शब्द उच्चारण दोषपूर्ण हो जायेगा ।
 
  ५ (१) – जब क्रमांक २ अनुसार किसी लघु मात्रिक के पहले या बाद में कोई शुद्ध व्यंजन(१ मात्रिक क्रमांक १ के अनुसार) हो तो उच्चारण अनुसार दोनों लघु मिल कर शाश्वत दो मात्रिक हो जाता है
उदाहरण – “तुम” शब्द में “'त'” '“उ'” के साथ जुड कर '“तु'” होता है(क्रमांक २ अनुसार), “तु” एक मात्रिक है और “तुम” शब्द में “म” भी एक मात्रिक है (क्रमांक १ के अनुसार)  और बोलते समय “तु+म” को एक साथ बोलते हैं तो ये दोनों जुड कर शाश्वत दीर्घ बन जाते हैं इसे ११ नहीं गिना जा सकता इसके और उदाहरण देखें = यदि, कपि, कुछ, रुक आदि शाश्वत दो मात्रिक हैं
 
५ (१) परन्तु जहाँ किसी शब्द के उच्चारण में दोनो हर्फ़ अलग अलग उच्चरित होंगे वहाँ ऐसा मात्रा योग नहीं बनेगा और वहाँ अलग अलग ही अर्थात ११ गिना जायेगा
जैसे –  सुमधुर = सु/ म /धुर = सु१ म१ धुर२ = ११२   
६ (१) - यदि किसी शब्द में अगल बगल के दोनो व्यंजन किन्हीं स्वर के साथ जुड कर लघु ही रहते हैं (क्रमांक २ अनुसार) तो उच्चारण अनुसार दोनों जुड कर शाश्वत दो मात्रिक हो जाता है इसे ११ नहीं गिना जा सकता
जैसे = पुरु = प+उ / र+उ = पुरु = २,   
६ (२) परन्तु जहाँ किसी शब्द के उच्चारण में दो हर्फ़ अलग अलग उच्चरित होंगे वहाँ ऐसा मात्रा योग नहीं बनेगा और वहाँ अलग अलग ही गिना जायेगा
जैसे –  सुविचार = सु/ वि / चा / र = सु१ व+इ१ चा२ र१ = ११२१
७ (१) - ग़ज़ल के मात्रा गणना में अर्ध व्यंजन को १ मात्रा माना गया है तथा यदि शब्द में उच्चारण अनुसार पहले अथवा बाद के व्यंजन के साथ जुड जाता है और जिससे जुड़ता है वो व्यंजन यदि १ मात्रिक है तो वह २ मात्रिक हो जाता है और यदि दो मात्रिक है तो जुडने के बाद भी २ मात्रिक ही रहता है ऐसे २ मात्रिक को ११ नहीं गिना जा सकता है उदाहरण -
सच्चा = स१+च्१ / च१+आ१  = सच् २ चा २ =  २२,
(अतः सच्चा को ११२ नहीं गिना जा सकता है)
आनन्द = आ / न+न् / द = आ२ नन्२ द१ = २२१,
कार्य = का+र् / य = कार् २  य १ = २१ 
तुम्हारा = तु/ म्हा/ रा = तु१ म्हा२ रा२ = १२२,
तुम्हें = तु / म्हें = तु१ म्हें२ = १२...
उन्हें = उ / न्हें = उ१ न्हें२ = १२
७ (२) अपवाद स्वरूप अर्ध व्यंजन के इस नियम में अर्ध स व्यंजन के साथ एक अपवाद यह है कि यदि अर्ध स के पहले या बाद में कोई एक मात्रिक अक्षर होता है तब तो यह उच्चारण के अनुसार बगल के शब्द के साथ जुड जाता है परन्तु यदि अर्ध स के दोनों ओर पहले से दीर्घ मात्रिक अक्षर होते हैं तो कुछ शब्दों में अर्ध स को स्वतंत्र एक मात्रिक भी माना लिया जाता है
जैसे = रस्ता = र+स् / ता २२ होता है
मगर रास्ता = रा/स्/ता = २१२ होता है
दोस्त = दो+स् /त= २१ होता है मगर
दोस्ती = दो/स्/ती = २१२ होता है
इस प्रकार और शब्द देखें 
बस्ती, सस्ती, मस्ती, बस्ता, सस्ता = २२
दोस्तों = २१२, मस्ताना = २२२, मुस्कान =२२१,
संस्कार= २१२१    
८. (१) - संयुक्ताक्षर जैसे = क्ष, त्र, ज्ञ द्ध द्व आदि दो व्यंजन के योग से बने होने के कारण दीर्घ मात्रिक हैं परन्तु मात्र गणना में खुद लघु हो कर अपने पहले के लघु व्यंजन को दीर्घ कर देते है अथवा पहले का व्यंजन स्वयं दीर्घ हो तो भी स्वयं लघु हो जाते हैं   
उदाहरण = पत्र= २१, वक्र = २१, यक्ष = २१, कक्ष - २१, यज्ञ = २१, शुद्ध =२१ क्रुद्ध =२१
गोत्र = २१, मूत्र = २१,
८. (२) यदि संयुक्ताक्षर से शब्द प्रारंभ हो तो संयुक्ताक्षर लघु हो जाते हैं
उदाहरण = त्रिशूल = १२१,
क्रमांक = १२१, क्षितिज = १२ 
८. (३) संयुक्ताक्षर जब दीर्घ स्वर युक्त होते हैं तो अपने पहले के व्यंजन को दीर्घ करते हुए स्वयं भी दीर्घ रहते हैं अथवा पहले का व्यंजन स्वयं दीर्घ हो तो भी दीर्घ स्वर युक्त संयुक्ताक्षर दीर्घ मात्रिक गिने जाते हैं 
उदाहरण = प्रज्ञा = २२  राजाज्ञा = २२२, 
८ (४) उच्चारण अनुसार मात्रा गणना के कारण कुछ शब्द इस नियम के अपवाद भी है -
उदाहरण = अनुक्रमांक = अनु/क्र/मां/क = २१२१ ('नु' अक्षर लघु होते हुए भी 'क्र' के योग से दीर्घ नहीं हुआ और उच्चारण अनुसार अ के साथ जुड कर दीर्घ हो गया और क्र लघु हो गया)      
९ - विसर्ग युक्त व्यंजन दीर्ध मात्रिक होते हैं ऐसे व्यंजन को १ मात्रिक नहीं गिना जा सकता
उदाहरण = दुःख = २१ होता है इसे दीर्घ (२) नहीं गिन सकते यदि हमें २ मात्रा में इसका प्रयोग करना है तो इसके तद्भव रूप में 'दुख' लिखना चाहिए इस प्रकार यह दीर्घ मात्रिक हो जायेगा
हरीश भट्ट
​(साभार गूगल)

लधु कथा-अनकहा सा कुछ

लधु कथा-अनकहा सा कुछ
☆☆☆☆☆☆☆☆☆☆☆☆☆☆☆☆
रोहन ने मोबाइल को ऐसे देखा जैसे कोई दुश्मन हो... हद हैं सुबह से उसकी प्रोफ़ाइल पर लगातार नोटिफिकेशन आ रहे थे पर ...पर जिसका इन्तजार था उसका अभी तक भी नहीं परसो शाम से न तो शीतल ने उसे कोई मेस्सेज किया था न उसकी प्रोफ़ाइल पर ही आई थी
रोहन ने शीतल की प्रोफाइल चेक की ...नहीं अभी तक तो हैं प्रोफाइल में अनफ़्रेंड भी नहीं किया फिर उसका मैसेज क्यों नहीं...परसो से अब तक एक भी नही.... ऐसा तो कभी नही हुआ
तीन साल हो गए थे रोहन और शीतल को इस आभासी दुनिया में बिना इक दुसरे को जाने बिना देखें इक ऐसा अनकहा अनबूझा रिश्ता हो गया था दोनों के बीच की जब तक एक दुसरे को मेस्सेज न कर लें सांस नहीं आती थी... सुबह की गुड मोर्निंग हो... या रात की गुड नाईट दिन भर क्या खाया.. क्या पिया ...क्या पहना... कहाँ हो ...कैसी लग रही हूँ ...मिस कर रही हूँ कब मिलोगे ...इन्हीं सब में बीत जाता था
फिर ऐसा क्या हुआ की कल शाम से कोई तवज्जो ही नहीं
परसो शाम तो मेसेज किया था उसे ...रोहन ने मेसेजर ओन किया आखरी मेसेज शीतल का ही था....."ओके जब घर आ जाओ मेसेज कर देना बाय टेक केयर स्वीट ड्रीम्स लव यु डियर ""
रोहन परसो दोपहर से हॉस्पिटल में ही था डेंगू हुआ था उसे लगातार बिगड़ती हालत ने उसे भर्ती करवा ही दिया ...कमजोरी इतनी की टॉयलेट तक जाना मुश्किल शायद बैड पर ही करवाया था रीमा ने ..ओह रीमा से तो मिलवाना ही भूल गया ...रीमा उसकी पत्नी थी
पूरी रात रीमा उसके सरहाने बैठी रही रात अपने हाथ से खाना खिलाया दो बार तो कपड़े भी उसी ने बदले उल्टी के कारण ....रात पता नही कब तक तो सर पर ठंडी पट्टियां रखने में बीती याद नही उसे... हाँ परसो शाम जब रीमा दो मिनट के लिए दवाई लेने नीचे मेडिकल स्टोर पर गई तब मेसेज किया था उसने शीतल को की वह हॉस्पिटल में हैं प्लेटलेट्स 30000 आ चुके हैं कमजोरी बहुत हैं पता नही क्या होगा
साथ ही यह भी लिख दिया था की रीमा मेरे साथ ही हैं मेसेज देख के करना जरा
और फिर डेटा कनेक्शन आफ कर दिया था मेसेज डिलीट करके तब से कल का दिन तो उसे होश ही नही था और आज अभी तक तो कोई मेसेज नही शीतल का
तभी रीमा आ गई शायद चाय नाश्ता लाने गई थी
"उठ गए आप लीजिये चाय पी लीजिये"
"और सुनो आज की रिपोर्ट ठीक हैं प्लेटलेट्स बढ़ रहे हैं ठीक हो जाओगे आप मैने माँ भगवती से मन्नत मांगी थी जब आप ठीक हो जाओगे तो हम चलेंगे चुन्नी चढ़ाने"
मुस्कुरा दिया था रोहन
लाइये मोबाइल मुझे दीजिये में पढ़ के सुना देती हूँ आपके मेसेज अरे ...आप तो सारा दिन मोबाइल पे रहते थे किसी ने पूछा नही मेसेज में की कैसी तबियत हैं कहाँ गई आपकी वो गर्ल फ्रेंड्स जो रोज मेसेज करती थी सुबह शाम.... रीमा ने विजयी भाव से मुस्कुरा कर रोहन की तरफ देखा था
और रोहन को उसकी आँखों में बहुत कुछ दिखा था कहा अनकहा सा ....उसे शीतल का मैसेज याद आ गया ओके मेसेज कर देना जब घर आ जाओ टेक केयर लव यू .....
उसने रीमा का हाथ कस के पकड़ लिया और भर्राये गले से कहा ....नही रीमा मेरी सच्ची गर्लफ्रेंड तो तुम हो
सिर्फ तुम
रिश्तों की परिभाषा समझ गया था वह शायद
हरीश भट्ट

एक प्रतिक्रिया आपकी रचनाओं पर

शुभ संध्या दोस्तों ..
एक प्रतिक्रिया आपकी रचनाओं पर

सुनो
रोज ही गुज़रता हूँ
तुम्हारी ग़ज़लों से
तुम्हारी नज़्मों
तुम्हारी कविताओं से
कितनी शिद्दत से
हर्फ़ दर हर्फ़
उकेर लेते हो तुम
उमस भरे दिन हों
या सीली सीली सी रातें
अतृप्त सा आक्रोश
या सुरमई सी बातें
एक शब्द या एक पंक्ति
बस
अपूर्णता में भी
संपूर्णता का हासिल

और उस कहन से
गुज़रते हुए
सोचता हूँ
की बाकमाल
कैसे लिख लेते हो तुम
कोई प्रतिक्रिया
सूझती ही नही पढ़ कर !
सोचता हूँ
कैसे महसूसते हो
अंतस का सूनापन
खारे पानी की लकीर
नब्ज़ नब्ज
धधकती पीर

मौन में छुपा क्रंदन
सहमे से जज्बात
रेंगती हुई सी रात
दूर तक पसरा
भुतहा आकाश
गुलमोहर की कसक
अनमना सा पलाश
पलकों का उनींदापन
नयनों की आद्रता
जब्त-धड़कन धड़कन
इकलौता इकतरफा प्यार
एक पल की आज़माइश
बरसों का इंतज़ार

अच्छा
ये तो बताओ
ये महसूसने का हुनर
सीखा कहाँ से तुमने
हद हैं
कितने बेहद हो तुम !

हैरां हूँ कि
कैसे उद्धृत कर लेते हो तुम न
असह्य होती
पर्वत सी पीर
लरजा हुआ आँचल
उड़ता वासंती चीर
झील सी शीतलता
सूरज का तेग
बारिश की छींटाकशी
पहाड़ी नदी का उद्वेग
भावों का आलंबन
कभी नर्म कभी सख्त
अबाबील का एकाकीपन
चनार का सूना दरख़्त

रोज़ ही देखता हूँ
खुलते  हुए
ग़ज़लों के खुले छज्जे
पंक्ति दर पंक्ति
नज़्म दर नज़्म हिज्जे
मखमली से लहज़े
सलीके से बुना रदीफ़
काफिये- उलझे उलझे
और उन सब में उलझा
नुक्ते सा
ठहरा ठिठका हुआ मैं
हर विसर्ग हर विभक्ति पर
हर उपमा हर उक्ति पर
अर्धविराम से पूर्णविराम तक
आते आते
तुम मुझमें
आकार लेने लगते हो
ये जुड़ाव
संयोग मात्र तो न होगा न !

और ये भी की
सभी रस भाव तो हैं तुममें
रति सी शृंगारिकता
शोक की करुणा भी
क्रोध की रौद्रता
उत्साहित वीरांगना सी
और आश्चर्य अद्भुत भी
जल के समान शांत निर्वेद भी
भय सी भयानक,
और घृणा सी विभत्स भी
और इन सब के मध्य
हास्य का तत्व भी
तभी तो
पंक्ति पंक्ति
पढ़ता हूँ बार बार
छू लेने को तुम्हें
हर भाव में !

हतप्रभ हूँ
तुम्हारी रचनाएं हैं
की तिलिस्मी अय्यारियाँ
झरने सी निष्कलंक
चंचलता
कब दरियाह की
गंभीरता ओढ़ लेती हैं
पता ही नही चलता
भावों का उद्वेग
सीधा विवेक की
चट्टान से टकरा कर
मन मष्तिष्क पर
छितरा जाता हैं
अपने सम्पूर्ण
व्यक्तित्व के साथ
तिरोहित होते हो तुम
तब मेरी वैचारिकता पर
ऐसा लगता हैं
कविता नही कोई वशीकरण हैं
मंत्र बद्ध
जो रचा हैं तुमने !

आश्चर्य
तुम जब भी
उठाते हो कलम
छन्द छन्द
नाच उठते हैं
पहन पदबंधों के घुंघरू
लयात्मक हो उठती हैं
साँवरी बयार भी
शब्द शब्द मुखरित हो
चित्र चित्र गढ़ने लगता हैं
परावर्तित होते हो जब
मन वचन प्राण से
अपनी ही कविताओं में 
तब तुम
त्वमेव नही रहते
कवितामय हो जाते हो !

जितना तुम्हें पढ़ता हूँ
उतना ही
तुम में उतर जाता हूँ
एकाकार होने लगता हूँ
तुमसे और तुम्हारी कविता से
तब कुछ और
पढ़ने सुनने का
मन नही होता
सोचता हूँ
की तुम मेरे हृदय के
मटमैले पृष्ठ पर लिखी
वो अंतहीन कविता हो
जिसे
गुनगुना सकता हूँ में
ताउम्र ताज़िन्दगी !

सुनो तो
तुमने ही लिखा हैं न
ये गीत
गुनगुना रहा हूँ
जिसे में
अभी अभी
धड़कनों के साज़ पर !
सुना !!??

हरीश भट्ट

एक नज़्म ....बत्तियां गुल हो चुकी,, सड़कें पुरानी हो गईं!

शुभ दिवस दोस्तों
एक नज़्म ....

बत्तियां गुल हो चुकी,, सड़कें पुरानी हो गईं! 
रातें अब तो इस शहर की, ज़ाफ़रानी हो गईं !!

सोचता था ख़त लिखूं पर, सामने वो मिल गए !
आंखों से आंखें मिली दिलकश कहानी हो गईं !!

यूं तो मुझको टोकता रहता था, ये मेरा ज़मीर !
ख़्वाहिशों  को पर लगे तो, आसमानी हो गईं !!

कल तलक जो उंगलियों चलती थी मेरे साथ साथ !  
बेटीयाँ वो देखिये कब की,...सयानी हो गईं  !!

इश्क़ की पेचीदगी  मैं, क्या सिखाता रात भर !
आँखों से ही  बातों की सब  तर्ज़ुमानी हो गईं !!

उनकी आँखों में अजब बेगानियत थी आज तक !
जब पुराने ख़त खुले तो,, पानी पानी हो गईं !!

हरीश भट्ट

चंद अशआर - वो जख्म दिल के, दिखा रहा था !

शुभ संध्या दोस्तों ...चंद अशआर

वो जख्म दिल के, दिखा रहा था !
ग़ज़ल कोई ....गुन गुना रहा था !!

छुपाता कैसे ....मैं अश्क अपने !
वो सामने से .....ही आ रहा था !!

तू अब भी मुझमें, कहीं हैं बांकी !
न जाने क्या, सिलसिला रहा था !!

जला रहा था वो, शम्म-ए-उल्फत !
मैं शाम अपनी..... बुझा रहा था !!

थी इक ख़लिश सी, लबों पे मेरी !
वो पलकें अपनी ..झुका रहा था !!

चलो की तुम ......बेवफा नहीं थे !
मेरा ही कुछ ....मसलहा रहा था !!

जहाँ पे हद तुमने ....खींच दी थी !
मैं भी वहीँ पर ......रुका रहा था !!

...हरीश भट्ट ....

"उम्र की दहलीज के पार..." कविता

शुभ संध्या दोस्तों
"उम्र की दहलीज के पार..."

सुनो
कितने दिन बाद
दिखी हो 
चलन तो रक्खो
मिलने न सही
दिखने का ही सही
आदते बदल गई हैं न
याददाश्त भी

याद हैं
नुक्कड़  का वो
काफी हाउस
बड़ा सा ताला
मुह चिढ़ाता हैं अब तो
पार्क की वो आंखरी बेंच
अकेले
कब तक बैठेगा कोई,

और हाँ...
पहाड़ी का वो देवदार भी
पिछली बरसात में
गिर  चुका हैं
जिसपे उकेरा था
तुम्हारा नाम
तुम्हारे ही हेयर पिन से।

इस अंतराल में
तुम बदल रही हो
या ये मौसम
समझ नहीं पाया मैं
तुम्हारे
बालों पर  मेहँदी का रंग
गहराने लगा हैं अब 
कानों के ऊपर
झांकने लगी हैं
उम्र की
पक चुकी बालियाँ
चश्मा ...?
चश्मा लगाने लगी हो
तुम न
ये ..ओवल शेप
बदल लो.. फबता नहीं हैं
तुम्हारी
सुतवा नाक पर
याद हैं
मक्खी भी
बैठने नहीं देती थी तुम
और आज
आज ये चश्मा
अच्छा हैं लेकिन...
देखो
में भी लगाता हूँ
कुछ तो  हैं कॉमन
हमारे दरमियाँ
आज भी !!!

अपनी साड़ी के पल्लू को
भींच के रखने लगी हो तुम 
छोड़ो ..
गिरा के रक्खा करो
लहराने दो
हवाओं के रुख पर
कभी
तुम्हारी बासंती चूनर का
यही लहराव
हवाओं का रुख
तय करता था
और ये आँखों के
जर्द घेरे
कब से पाल लिए तुमने
कहाँ गया वो
सागर सी आँखों का
ज्वार भाटा
और वो
वो महकता पर्फियूम
और फिरोजी स्कार्फ
रुखसत  हो गया क्या ?
तुम्हारे गले से

पूरे बाजू का ब्लाउज
और ग्रे शेड्स
बढ़ते जा रहे हैं
तुम्हारे वार्डरोब में
हाई हील्स
फ्लैट होती जा रही हैं
और चेहरे की
मुस्कराहट भी,
रातें अब
कजरारी नहीं रही
ग़ज़ाल सी आँखों में
काजल लगाना
छोड़ जो दिया​  हैं तुमने
गज़लें आज भी
जिन्दा हैं मगर
तुम्हारे मोबाइल में

तुम्हारी आवाज की खनक 
अभी भी
वैसी ही हैं न
मंदिर के मंजीरों सी
छनकती थी
घुप्प खामोशियों में भी ​
या की
माहौल  का भारीपन
उतर आया हैं उसमें भी
बैचेनियों की उकताहट
क्या होती हैं
भूली तो नहीं न
छत के गमलों को पानी
देती तो होगी
आज भी
तकती भी होगी
अधजले चांद को
छत पे आने को
बहाने बनाना
कोई तुम से सीखे

सुनो..
उम्र की दहलीज के पार
तुम अकेले नही गई
मैं भी वही खड़ा हूँ
कभी मिल लिया करो
अचानक सी
बारिश की तरह
या किसी
टूटते तारे की तरह
गुजर जाया करो
ऐसे ही खामोश
कभी बाजू से
तुम्हें भी पता रहे
की तुम बिन
कोई ऐसे भी
जी रहा होगा ।।

हरीश भट्ट