Monday, June 27, 2016

तू यूँही मुझे छोड़ के

तू, यूं ही मुझे छोड़ के, तो जा नहीं सकती !
ज़िंदगी, तुझसे सवालात का, रिश्ता हैं मेरा !!

ताम्बई सी मुस्कान

ताम्बई सी मुस्कान पे, मासूमी की अदा ! 
खवाबों की चम्पई सी ज़रदोज़ी लगता हैं !!
जाने क्या था ऐसा, उसकी कंजई आँखों में !
मुझको शहर का चांद, फिरोजी लगता हैं !!
उसकी "नज़रें" खुद ही,, ना लग जाएं मुझे !
ये सोच के "माँ", मेरा चेहरा बिगाड़ देती थी !!
धूप हो बारिश हो, या आज़माइश खुदा की !
छुपा के सीने में, "आँचल" की आड़ देती थी !!
वो ये कह के, रस्म-ए-मोहब्बत निभा गई अपनी !!
चल छोड़, कि तुझको तो मनाना भी नहीं आता !!!

Sunday, June 12, 2016

"कोई फूल बन के खिलो कभी,कभी तितलियों सी उड़ो ज़रा "



दोस्तों बेखयाली का एक गीत आपकी नज़र हैं ...अगर पसंद आये तो जताइयेगा जरूर........
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कोई शाम यूं भी तो हो जरा, मेरा हाथ थामे चलो जरा !
जो मैं हसूं तो,, हसों जरा,, जो मैं रुकूं तो,,रुको जरा !!


मैं पहर.. पहर,,, रहा देखता !
तू नज़र में थी किसी और की !!
मेरी हसरते,,, तेरे नाम थी !
तेरी शोखियाँ किसी और की !!
जैसे सबसे मिलते हो शौक से मेरे साथ भी तो खुलो जरा !
कोई शाम यूं भी तो हो जरा,,, मेरा हाथ थामे चलो जरा !!

मैं भंवर.. भंवर,, रहा डूबता !
तू लहर लहर में समायी थी !!
मुझे साहिलों की तलाश थी !
तूने मौजों से ही निभाई थी !!
तेरा रास्ता हैं अलग मगर,किसी मोड़ पर तो मुड़ो जरा !
कोई शाम यूं भी तो हो जरा, मेरा हाथ थामे चलो जरा !!

तुम दूर हो के भी,,, पास हो !
कभी तो मिलोगी ये आस हो !!
तुम्हें पाया मैंने,, यकीन मैं !
मेरी उम्र भर की,, तलाश हो !!
यूं ही तुमसे कहना हैं कुछ मुझे मेरे पास आ के सुनो जरा !
कोई शाम यूं भी तो हो जरा,,, मेरा हाथ थामे चलो जरा !!

तू ग़जल में हैं, तू ही गीत में !
मेरी हार में,,, मेरी जीत में !!
कभी वेदना, किसी नज़्म की !
कभी पहली पहली सी प्रीत में !!
कोई फूल बन के खिलो कभी कभी तितलियों सी उड़ों जरा !
कोई शाम यूं भी तो हो जरा,,,,, मेरा हाथ थामे चलो जरा !!
जो मैं हसूं तो,,, हसों ज़रा ,,,, जो मैं रुकूं,,, तो रुको जरा !!
.............हरीश............

Friday, April 22, 2016


वो पिछले मोड़ पे, बेसाख्ता रुका क्यों हैं !
कोई वजह ही नहीं हैं, तो फिर खफा क्यों हैं !!
तमाम उम्र गुजारी हैं,,,, खुदपरस्ती में  !
अगर वो टूटा नहीं हैं, तो फिर झुका क्यों हैं !!

फिर मिल के जुदाई कि, कोई रीत न रखना !
हम हार भले ही जाएँ मगर, जीत न रखना !!

तुम भूल तो जाओ चलो,,,, मर्जी हैं तुम्हारी !
मुझसे मगर ऐसी कोई,,, उम्मीद न रखना !!